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डीयू कॉलेजों / विभागों में प्रवेश प्रक्रिया शुरू करने से पहले, कॉलेजों से पिछले 5 वर्षों के आंकड़े मंगवाने की फोरम ने वीसी से की मांग

नई दिल्ली : फोरम ऑफ एकेडेमिक्स फ़ॉर सोशल जस्टिस (शिक्षक संगठन) के चेयरमैन व पूर्व डीयू एडमिशन कमेटी के सदस्य प्रोफेसर हंसराज सुमन ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रोफेसर योगेश सिंह को पत्र लिखकर मांग की है कि शैक्षिक सत्र 2026-27 में दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों / विभागों में यूजी, पीजी, पीएचडी, बीएड, एमएड, बी.लिब, एम.लिब, बीएलएड, एमबीए, जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन, डिप्लोमा कोर्स, सर्टिफिकेट कोर्स आदि पाठ्यक्रमों में एससी, एसटी, ओबीसी, पीडब्ल्यूडी, ईडब्ल्यूएस व अनरिजर्व सीटों पर प्रवेश प्रक्रिया शुरू करने से पहले विश्वविद्यालय प्रशासन डीयू के विभागों व कॉलेजों के प्रिंसिपल / संस्थानों के निदेशकों को सर्कुलर जारी करके उनसे पिछले पांच वर्षों के आंकड़े मंगवाकर उनकी जाँच करवाएँ, पता चलेगा कि गत वर्षों में कॉलेजों ने अपने यहाँ स्वीकृत सीटों से ज्यादा एडमिशन दिया लेकिन उन्होंने सामान्य सीटों की एवज में एससी/एसटी, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस व पीडब्ल्यूडी कोटे की सीटों को नहीं भरा। बता दें कि गत वर्ष भी नार्थ कैम्पस व साउथ कैम्पस के बेहतर कॉलेजों में विभिन्न पाठ्यक्रमों में सीटें खाली रह गई थीं, बावजूद इसके इन्हें नहीं भरा गया। उन्होंने पत्र में यह भी लिखा है कि कुछ कॉलेज यूजीसी व शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आरक्षण संबंधी दिशा निर्देशों का पालन नहीं करते हैं। उन्होंने यूजीसी से आरक्षित श्रेणी के छात्रों की कॉलेजों द्वारा स्वीकृत सीटों पर प्रवेश न देने पर संबंधित कॉलेज का अनुदान बंद करने की मांग की है।

प्रोफेसर सुमन ने पत्र से अवगत कराया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग 85 विभाग ऐसे हैं जहाँ स्नातकोत्तर डिग्री, पीएचडी, एमबीए, बीएड, एलएलबी, एलएलएम, बीएलएड, सर्टिफिकेट कोर्स, डिप्लोमा कोर्स, डिग्री कोर्स आदि कराए जाते हैं। इसी तरह से दिल्ली विश्वविद्यालय में तकरीबन 79 कॉलेज है ऐसे हैं जिनमे स्नातक, स्नातकोत्तर की पढ़ाई होती है। इन कॉलेजों व विभागों में हर साल स्नातक व स्नातकोत्तर स्तर पर ईडब्ल्यूएस कोटा बढ़ने के बाद लगभग 72 हजार से अधिक छात्र-छात्राओं के प्रवेश होते हैं। प्रोफेसर सुमन ने बताया है कि डीयू कॉलेजों में हर साल स्वीकृत सीटों से 10 फीसदी ज्यादा एडमिशन होते है। उन्होंने यह भी बताया है कि कॉलेज अपने स्तर पर 10 फीसदी सीटें बढ़ा लेते हैं। बढ़ी हुई सीटों की एवज में अधिकांश कॉलेज आरक्षित वर्गों की सीटें नहीं भरते। उन्होंने बताया है कि पिछले पाँच साल से सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए 10 फीसदी आरक्षण दिया गया है। जो अब बढ़कर 25 फीसदी सीटों का इजाफा हो चुका है। इन वर्गों के छात्रों की सीटें भी खाली रह जाती हैं। इस तरह से विश्वविद्यालय के आंकड़ों की माने तो 72 हजार से ज्यादा सीटों पर हर साल एडमिशन होता है फिर भी एससी /एसटी, ओबीसी,पीडब्ल्यूडी व ईडब्ल्यूएस कोटे के छात्रों की सीटें खाली रह जाती हैं। बता दें कि आरक्षित सीटों को भरने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन के पास छात्र होते हैं लेकिन परसेंटेज कम नहीं की जाती, जिसके कारण सीटें खाली रह जाती है। उन्होंने बताया है कि आरक्षित श्रेणी की सीटों को भरने के लिए परसेंटेज कम की जा सकती है लेकिन विश्वविद्यालय /कॉलेज ऐसा करते नहीं। जिसके कारण हर साल आरक्षित श्रेणी की हजारों सीटें खाली रह जाती है।

प्रोफेसर सुमन ने यह भी बताया है कि डीन स्टूडेंट्स वेलफेयर आरक्षित सीटों को भरने के लिए कई स्पेशल स्पॉट राउंड चलाते हैं लेकिन उसमें भी जो कट ऑफ जारी की जाती है उस पर मामूली छूट दी जाती है, जिससे एससी, एसटी, ओबीसी कोटे की सीटें कभी पूरी नहीं भरी जाती। ये सीटें हर साल खाली रह जाती है। गत वर्ष भी फोरम के लिखने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा आरक्षित सीटों को भरने के लिए कई स्पेशल स्पॉट राउंड चलाये गए लेकिन कट ऑफ कम नहीं किए जाने के कारण आरक्षित वर्गों के विद्यार्थियों की सीटें खाली रह गई। उनका कहना है कि कॉलेज प्रशासन व डीन स्टूडेंट्स वेलफेयर यदि चाहते तो कट ऑफ कम करके सीटों को भरा जा सकता था। उनका कहना है कि इस बार यदि विश्वविद्यालय प्रशासन प्रवेश परीक्षा / सीयूईटी परीक्षा परिणाम से पूर्व कॉलेजों से स्वीकृत सीटों के आंकड़े मंगवा ले और हर लिस्ट के बाद सीटों का ब्यौरा रखें तो काफी हद तक समस्या का समाधान हो सकता है। यदि उसके बाद भी कॉलेज आरक्षित कोटा पूरा नहीं करते है तो उनका अनुदान बंद कर देना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि एडमिशन लेने वाले तमाम छात्रों की सूची कॉलेज व विश्वविद्यालय प्रशासन अपनी वेबसाइट पर अपलोड करें। उन्होंने यह भी बताया है कि एससी/एसटी व ओबीसी के बहुत से छात्र कॉलेज छोड़कर चले जाते है या बीच में (ड्रॉप आउट) छोड़कर चले जाते है उसके भी आंकड़े कॉलेज नहीं देते। प्रोफेसर सुमन ने कॉलेजों से छात्रों की सीटों का बैकलॉग, शॉर्टफाल व ड्रॉप आउट स्टूडेंट्स का डाटा मंगवाने की भी मांग की है जिससे प्रवेश की प्रक्रिया आसान हो जाएगी।

कॉलेजों में बने सेल—प्रोफेसर सुमन ने यह भी बताया है कि यूजीसी गाइडलाइन 2006 के सख्त निर्देश है कि हर कॉलेज में एससी, एसटी और ओबीसी सेल की स्थापना की जाये। एडमिशन की प्रक्रिया को देखने के लिए मोनेटरिंग कमेटी बनाई जाए, इसके अलावा छात्रों, कर्मचारियों व शिक्षकों की समस्याओं के समाधान करने हेतु ग्रीवेंस कमेटी बने। उन्होंने बताया है कि कुछ कॉलेजों ने पहल करते हुए कमेटियाँ / सेल की स्थापना की है। इनको चलाने के लिए आरक्षित वर्ग से शिक्षकों की नियुक्ति भी की है, लेकिन ये सेल कोई काम नहीं करते, सेल के लिए नियुक्त शिक्षकों के लिए कॉलेज प्राचार्यों ने कोई सुविधा नहीं दी है न ही स्टाफ दिया है और न ही ऑफिस दिया है। इसलिए ये सेल केवल कागजों में कार्य कर रहे हैं। सेल में नियुक्त किए गए शिक्षकों का कहना है कि उन्हें किसी तरह की कोई पावर नहीं दी गई जिसके आधार पर विश्वविद्यालय प्रशासन को लिखा जाए। साथ ही सेल में प्रिंसिपलों द्वारा ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति की जाती है जो उनके खास होते हैं और प्रिसिंपल का हित साधने में लगे होते हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि प्रत्येक कॉलेज में आरक्षित वर्गो के शिक्षकों/ कर्मचारियों/छात्रों के लिए ग्रीवेंस सेल बनाया गया है। इस सेल का कार्य आरक्षित वर्गों के व्यक्तियों के साथ होने वाले जातीय भेदभाव, नियुक्ति, पदोन्नति व प्रवेश आदि समस्याओं का समाधान समय-समय पर करना है। आरक्षित श्रेणी के शिक्षकों/ कर्मचारियों/ छात्रों की रिपोर्ट तैयार कर यूजीसी, शिक्षा मंत्रालय, संसदीय समिति व नेशनल एससी/एसटी कमीशन, नेशनल ओबीसी कमीशन को उनके आंकड़े भेजना आदि है। उनका कहना है कि यदि ग्रीवेंस सेल सही ढंग से अपनी भूमिका का निर्वाह करे तो कॉलेजों में होने वाले एडमिशन, अपॉइंटमेंट और प्रमोशन संबंधी कोई समस्या न हो, लेकिन ये सेल प्रिंसिपलों के इशारों पर कार्य करते हैं।

फोरम ने वीसी को लिखे पत्र में यह भी मांग की है कि शैक्षिक सत्र 2026-27 की एडमिशन प्रक्रिया शुरु करने से पूर्व छात्रों के कॉलेजों/ विभागों से आंकड़े मंगवाये। प्रोफेसर सुमन का कहना है कि यदि संभव हो तो दिल्ली यूनिवर्सिटी अपने स्तर पर कॉलेजों के लिए अलग से एक मॉनिटरिंग कमेटी गठित करे। इस कमेटी में आरक्षित वर्गों के शिक्षकों को ही रखा जाए। कमेटी इन कॉलेजों का दौरा कर शिक्षकों/कर्मचारियों/छात्रों से उनकी समस्याओं पर बातचीत करे। उन्होंने बताया है कि इन कॉलेजों में सबसे ज्यादा समस्या शिक्षकों का रोस्टर, स्थायी नियुक्ति, पदोन्नति के अलावा कर्मचारियों की नियुक्ति, पदोन्नति, पेंशन के अतिरिक्त छात्रों के प्रवेश संबंधी समस्या, छात्रवृत्ति का समय पर ना मिलना, रिमेडियल क्लासेज न लगना, सर्विस के लिए स्पेशल क्लासिज, स्पेशल कोचिंग एससी, एसटी व ओबीसी के छात्रों के सामने आती है। इनके सामने आने वाली समस्याओं पर उन छात्रों से बातचीत करे साथ ही कॉलेजों में जिन सुविधाओं का अभाव है उस पर एक रिपोर्ट तैयार करे। कमेटी इस रिपोर्ट को यूजीसी, शिक्षा मंत्रालय, नेशनल एससी, एसटी कमीशन, नेशनल ओबीसी कमीशन व एससी/एसटी के कल्याणार्थ संसदीय समिति को भेजे। इसके अलावा इस रिपोर्ट को मीडिया में सार्वजनिक करे ताकि आम आदमी को पता चल सके कि विश्वविद्यालयों/कॉलेजों में किस तरह से भेदभाव की नीति अपनाई जाती है।

फोरम ने वीसी से यह भी मांग है कि यूजीसी / शिक्षा मंत्रालय द्वारा समय-समय पर केंद्र सरकार की आरक्षण नीति संबंधी सर्कुलर जारी करती है ताकि इन सुविधाओं का लाभ आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थियों को मिले इसके लिए उसे विश्वविद्यालय/कॉलेज/संस्था को अपनी वेबसाइट पर अपलोड करना होता है लेकिन कोई भी कॉलेज शिक्षकों का रोस्टर, छात्रों के प्रवेश संबंधी आंकड़े, शिक्षकों के खाली पदों की संख्या, कर्मचारियों के पदों की जानकारी आदि को वेबसाइट पर नहीं अपलोड करते जबकि यूजीसी हर साल आरक्षण संबंधी जानकारी को वेबसाइट पर अपलोड़ करने संबंधी सर्कुलर जारी करता है। इस संदर्भ में भी कॉलेज प्रिंसिपलों को सर्कुलर जारी किया जाये और उनसे कॉलेज का एडमिशन बुलेटिन व प्रोस्पेक्टस की कॉपी मंगवाई जाए ताकि कितने छात्रों का इस वर्ष एडमिशन होगा। उन्होंने यह भी मांग की है कि कॉलेज यह भी बताएं कि ओबीसी सेकेंड ट्रांच के पदों पर शिक्षकों व कर्मचारियों की नियुक्ति पूरी कर ली गई है या नहीं ? अगर नियुक्ति नहीं की है तो रोस्टर रजिस्टर तैयार कर पदों को विज्ञापित करके इन पदों को तुरंत भरे और वेबसाइट पर डाला जाए ।

 

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