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‘बस्ती में इक बुज़ुर्ग की मय्यत को देख कर मैं अपने बूढ़े बाप से जाकर लिपट गया’

जश्न ए वासिफ़ फारूक़ी मुशायरा और सम्मान समारोह का आयोजन

लखनऊ : साहित्यिक संस्था कबीरा बाई वेद चंद्रा के तत्वावधान में लखनऊ के मशहूर वरिष्ठ शायर और मंच संचालक वासिफ़ फारूक़ी की साहित्यिक सेवाओं के सम्मान में जश्न ए वासिफ़ फारूक़ी मुशायरा और सम्मान समारोह का आयोजन किया गया.

उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी सभागार विभूति खण्ड गोमती नगर लखनऊ में आयोजित इस कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि पूर्व कार्यकारी मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश डॉ अम्मार रिज़वी ने दीप जला कर शायरों के सम्मान से किया.

मुशायरे अध्यक्षता उर्दू विभागाध्यक्ष लखनऊ यूनिवर्सिटी प्रोफेसर अब्बास रज़ा नैयर और संचालन दिल्ली से आये शायर मोईन शादाब ने किया
मैं दिया हूँ मुझे बुझायेगी
ऐ हवा सांस फूल जायेगी
अब्बास राज़ नय्यर
ग़ालिब ओ मीर शहंशाह ए सुखन हैं लेकिन
अपने खित्ते में ज़मींदार ए ग़ज़ल हम भी हैं
वासिफ़ फारूक़ी
हमें रोज़ी तो हिन्दी और अंग्रेज़ी ने दी बेशक
मगर आदाब जीने के हमें उर्दू से आये हैं
राम प्रकाश बेख़ुद
अमीर ए शहर ए सुखन हैं सो कुल जहान के लोग
हमारे सामने अपनी ज़बाँ संभालते हैं
डॉ संजय शौक़
ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा कि आके बैठो हो पहली सफ़ में
अभी से उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है
शबीना अदीब
बस्ती में इक बुज़ुर्ग की मय्यत को देख कर
मैं अपने बूढ़े बाप से जाकर लिपट गया
जौहर कानपुरी
हुनर ये शायरी कुछ भी नहीं, लिखता हूं ज़ख्मों को
मगर महफ़िल को लगता है हमें ग़ज़लें सुनानी है
कबीर हालाती
۔۔
अफ़लाक तो क्या मिलते ज़मीं का न रहूँगा
मैं तेरे भरोसे पे कहीं का न रहूँगा
मोईन शादाब
अगर है जीतना मक़सद तो फिर बताये कोई
वो जान बूझ कर बाज़ी को हारता क्यों है
मोहम्मद अली साहिल
किसी की रूह का बेदार होना
इसे कहते हैं शायद प्यार होना
सुधीर बेकस
तरसेंगे वही लोग मुहब्बत की हवा को
जो लोग मुहब्बत का शजर काट रहे हैं
शाहबाज तालिब
सब अपने हादसों पे शेर कहना चाहते हैं
मैं शेर कहता था और हादसा बनाता था
अभिश्रेष्ठ तिवारी
जीतने वाले ने बस जीत लिया है मुझको,
मैं हूँ उस शख़्स का जिस शख़्स ने हारा है मुझे.
सलमान ज़फ़र
दुश्मन कभी बिके तो कभी यार बिक गये
क़ीमत मेरी लगा के खरीदार बिक गये
खालिद हाशमी
इश्क़ में महबूब को हासिल वो आला मक़ाम
जो कहे वो हुक्म है तामील होनी चाहिये
रुबीना अयाज़
हमने जो बोया उसी को काटते हैं सुब्हो शाम
अब किसे कहिए दुआ और बददुआ क्या चीज़ है
मलिक रिज़वान सागर त्रिपाठी (मुंबई) आदि शायरों ने अपना कलाम पेश किया और श्रोताओं की तालियां हासिल की
कार्यक्रम के अंत में संयोजक युवा शायर कबीर हालाती सभी शायरों अतिथियों और श्रोताओं को धन्यवाद ज्ञापित किया.
कार्यक्रम में मुख्य रूप से वेद चंद्रा के संस्थापक एवम् वेदपाल गहलोत एडवोकेट, रवि गहलोत, राखी गहलोत, दीपक चंदेल, आशीष ठाकुर,वरुण ठाकुर, डॉ. शकील क़िदवई, डॉ. सुहैल फारूक़ी फर्रुख, जमाल अख्तर उस्मानी, वसीम हैदर, अरशद आज़मी, डॉ. रईस मस्कती, डॉ. रेशमा परवीन, अमीर हैदर, मेराज हैदर, अफज़ल सिद्दीकी, डॉ. शहज़ादा सिद्दीक़ी, डॉ.सुधा मिश्रा, शहला हक़, शाज़िया फारूक़ी, सगीर नूरी आदि मुख्य रूप से उपस्थित रहे.

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