नृत्य और साहित्य का संगम, जब कथक के पैरों ने पढ़ी अमृता की नज़्में
साज़, आवाज़ और अहसास, लखनऊ के मंच पर जीवंत हुई अमृता

लखनऊ : लखनऊ की शाम उस वक्त ठहर गई जब गोमती नगर स्थित संत गाडगे जी महाराज प्रेक्षागृह में शब्दों और पदचापों का एक अनूठा संगम हुआ। अवसर था सुप्रसिद्ध लेखिका अमृता प्रीतम के जीवन पर आधारित नृत्य-नाटिका आजाद रूह के भव्य मंचन का। कथक गुरु सुरभि सिंह के निर्देशन और अभिनय में सजी इस प्रस्तुति ने न केवल एक विदुषी के संघर्ष को दर्शाया, बल्कि कला प्रेमियों को भावुकता के एक अलग धरातल पर ले गई।
लेखन से लेकर वॉयस ओवर तक, सुरभि सिंह ने अमृता के किरदार को मंच पर आत्मसात कर लिया। नृत्य-नाटिका में अमृता के बचपन से लेकर विभाजन की विभीषिका और उनकी स्त्री चेतना को कथक की जटिल लय और भाव-भंगिमाओं के माध्यम से जीवंत किया गया। जब मंच पर अज्ज आखां वारिस शाह नूँ की दर्दभरी पुकार गूँजी, तो दर्शकों की आँखें नम हो गईं। तबले की थाप और घुंघरुओं की गूँज ने साहिर लुधियानवी के त्याग और इमरोज़ के मौन प्रेम की पराकाष्ठा को बखूबी बयान किया।
इस सांस्कृतिक संध्या में केवल नृत्य ही नहीं, बल्कि साहित्य का भी अभिनंदन हुआ। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक और अन्य गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति में लेखक संजय मल्होत्रा की कृति रांझा मेरा का लोकार्पण हुआ। साथ ही, साहित्य जगत की 11 विभूतियों को अमृता प्रीतम सम्मान से नवाजा जाना, कला के प्रति समाज की कृतज्ञता का प्रतीक बना।

प्रस्तुति की सफलता के पीछे 25 कलाकारों का समर्पण और नेपथ्य के दिग्गजों का हाथ था। पं. धर्मनाथ मिश्र का गायन, दीपेंद्र कुँवर की बाँसुरी और गोविन्द की जादुई प्रकाश सज्जा ने पूरे वातावरण को साहित्यानुरागी बना दिया। शकील के सेट और मनोज-शहीर की मुख सज्जा ने कलाकारों के अभिनय में चार चाँद लगा दिए।
कल्चरल क्वैस्ट संस्था द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अनुष्ठान था। यह इस बात का प्रमाण है कि जब नृत्य और साहित्य हाथ मिलाते हैं, तो इतिहास जीवंत हो उठता है।



