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रावण दहन, पुतले जलते हैं, पर बुराई का क्या?

रामराज्य क्यों नहीं आता? क्योंकि राम तो सिर्फ कहानियों में रह गए

मोहम्मद सैफ

लखनऊ। हर साल की तरह इस बार भी दशहरा आया। लखनऊ की गलियों से लेकर देश के कोने-कोने तक, रावण के विशालकाय पुतलों ने आसमान को लाल रंग से रंग दिया। पटाखों की गूँज, मेलों की चहल-पहल, और राम-रावण के नाटकीय युद्ध ने हर मोहल्ले को रामायण की रंगत में डुबो दिया। बच्चे तालियाँ बजाते, बूढ़े मुस्कुराते, और जवान सेल्फी लेते, सब एकजुट होकर उस पल के गवाह बने, जब तीर ने रावण के अहंकार को भेदा और आग ने उसके पुतले को निगल लिया। मगर धुआँ छँटने के बाद, जब भीड़ अपने घरों को लौटी, एक सवाल हवा में तैरता रह गया, पुतला तो जल गया, लेकिन समाज में पल रहे रावणत्व का क्या?

रामायण की कहानी हमें सिखाती है कि सत्य की जीत तय है, चाहे वह कितना ही अकेला क्यों न हो। रावण, वह दस सिरों वाला महाज्ञानी, जिसके पास देवताओं का वरदान और बुद्धि का खजाना था, अपने अहंकार और अधर्म के कारण धूल में मिल गया। दशहरा हमें यही सबक देता है, ताकत का सही इस्तेमाल करो, वरना वक्त तुम्हें घुटनों पर ला देगा।

लेकिन विडंबना देखिए, हम पुतले जलाते हैं और असली रावण को सलाम करते हैं। हाय रे हमारी समझ! जरा गौर कीजिए! जब रावण का पुतला जल रहा था, तब मंच पर तालियाँ बजा रहे लोग क्या वाकई सत्य के सिपाही थे? या यह बस एक सालाना तमाशा था, जिसे निभाकर हमने अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान ली? क्योंकि अगर हम सचमुच सत्य के साथ खड़े होते, तो शायद हमारे समाज में रावणत्व को इतनी खुली छूट न मिलती। आज का रावण कोई दस सिर वाला राक्षस नहीं, जो लंका में बैठकर साजिश रच रहा हो। वह तो हमारे बीच घूम रहा है, कभी सत्ता के गलियारों में, कभी चमचमाती गाड़ियों में, और हाँ, कभी-कभी तो हमारे अपने मन के अंधेरे कोनों में।

वह भ्रष्ट लोग है, जिसे हम चुनते हैं, क्योंकि काम तो करवाता है। वह लोग जो कारोबारी है, जिसके काले धन को हम सफलता का ताज पहनाते हैं। और सबसे बढ़कर, वह हमारा वह छोटा-सा स्वार्थ है, जो हमें गलत को देखकर चुप रहने को मजबूर करता है। कितने शानदार लोग हैं हम! रावण को जलाते हैं और रावणत्व को सींचते हैं। पहले के ज़माने में, अगर कोई भ्रष्टाचारी या अपराधी किसी समारोह में आता, तो लोग उससे दूरी बनाते थे। और आज? अगर वही शख्स आपके घर दावत में आ जाए, तो आप गर्व से इंस्टाग्राम पर पोस्ट करते हैं, देखो, मेरे यहाँ कितना बड़ा बलवान आया! बलवान, जो समाज को डराने-धमकाने का ठेका ले रखा है। और हमने बुराई को बुराई कहना बंद कर दिया, अब वह हमारे लिए पावर और प्रभाव का पर्याय बन चुकी है। वाह रे, हमारी नैतिकता!

और तो और, पुतला दहन की यह पवित्र रस्म निभाने अक्सर वही लोग जाते हैं, जिनके ऊपर आपराधिक मुकदमों की फेहरिस्त लंबी होती है। राम तो किताबों में सिमट गए, पुतले जलाने का ठेका तो अब रावणत्व से ग्रस्त लोगों ने ले लिया है! दशहरा सिर्फ मेलों और पटाखों का त्योहार नहीं, बल्कि एक मौका है, खुद से सवाल करने का, अपने समाज को आँकने का। इस बार, जब हम रावण का पुतला जलाएँ, तो अपने भीतर की उस छोटी-सी लंका को भी जलाने का संकल्प लें, जो डर, लालच, और अहंकार की ईंटों से बनी है।

आइए, इस दशहरे पर राम की सीख को किताबों से निकालकर जिंदगी में उतारें। अगली बार जब कोई भ्रष्ट या अनैतिक शख्स हमारे सामने आए, तो उसे पावरफुल समझने की बजाय, उसके रावणत्व को पहचानें। क्योंकि अगर हम ऐसा नहीं करते, तो हर साल पुतले तो जलते रहेंगे, मगर समाज में रावणत्व यूं ही फलता-फूलता रहेगा। और तब यह दशहरा बस एक खोखला तमाशा बनकर रह जाएगा, एक ऐसा उत्सव, जहाँ हम सत्य की जीत का जश्न तो मनाते हैं, मगर उसे जीने की हिम्मत नहीं जुटाते।

तो सवाल यह है, बाहरी पुतले जलाने से क्या हासिल, जब हमारे दिल में बुराई का परमिट अब भी जेब में पड़ा है? रावण को जलाना आसान है, मगर रावणत्व को जलाने का साहस कौन दिखाएगा? शायद वक्त है कि हम अपने भीतर के राम को जगाएँ, नहीं तो यह पुतला-दहन बस एक सालाना रस्म बनकर रह जाएगी!

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