चंदा चोरी, आस्था के साथ धोखा : आराधना मिश्रा ‘मोना ‘

चंदा चोरी, आस्था के साथ धोखा
लखनऊ । उ.प्र. कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष आराधना मिश्रा‘मोना’ विधायक ने जारी बयान में कहा है कि पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं अ.भा. कांग्रेस कमेटी के महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने आज राम मंदिर चन्दा, चढ़ावा चोरी पर तीन गंभीर सवाल भारतीय जनता पार्टी सरकार से पूछे हैं। उन्होने कहा कि चन्दा-चढ़ावा चोरी पर पर्दा डालने की कोशिश में सरकार के अपने ही बयान अब उससे सवाल पूछ रहे हैं। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी ही कहानी के ऐसे तथ्य रख दिए हैं, जिनसे सवाल और गहरे हो गए हैं।*
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि देश की जनता के मन में सवाल है कि प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ मौन साधकर चोरों को मूक समर्थन क्यों दे रहे हैं? पहले दिन से चंदा-चढ़ावा चोरी के पाप पर पर्दा डालने की कोशिश क्यों हो रही है?
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पहली SIT राज्य सरकार ने खुद बनाई थी, वह भी ट्रस्ट के अनुरोध पर।
13 जून 2026 को उत्तर प्रदेश सरकार ने ट्रस्ट के अनुरोध पर तीन सदस्यीय SIT गठित की। इसकी प्रारम्भिक रिपोर्ट 23 जून को तत्कालीन अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद को सौंपी गई, जिनके ट्रस्ट से पदेन सदस्य के रूप में जुड़े होने की बात भी सामने आई है।
6 जुलाई 2026 को ट्रस्ट की बैठक में इस रिपोर्ट पर चर्चा हुई। इसके बाद कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि ट्रस्ट के लोगों ने कोई विश्वासघात नहीं किया। उन्होंने चम्पत राय के चरित्र पर भरोसा जताते हुए उनकी “सेवाओं का अभिनंदन” किया। यानी जाँच में गंभीर सवाल उठने के बावजूद ट्रस्ट नेतृत्व ने भाजपा-आरएसएस-विहिप से जुड़े अपने लोगों का सार्वजनिक बचाव किया।
दूसरी SIT – सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बनी
27 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद IG किरण एस के नेतृत्व में दूसरी SIT की जाँच में फॉरेंसिक ऑडिटर को शामिल किया गया।
17 अगस्त 2026 को इस SIT की प्रगति रिपोर्ट राज्य सरकार ने “Confidential Report” के रूप में सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की। अदालत के निर्देश के अनुसार, जाँच जारी होने के कारण रिपोर्ट गोपनीय रखी गई और याचिकाकर्ताओं को नहीं दिखाई गई।
तीन सीधे सवाल हैं-
1. जब दूसरीSIT की रिपोर्ट जाँच जारी होने के कारण गोपनीय रखी गई, तो पहली SIT की रिपोर्ट ट्रस्ट की बैठक में कैसे पहुँची और उस पर चर्चा कैसे हुई? क्या यह वही ट्रस्ट नहीं था जिसके पदाधिकारियों की भूमिका और बयान जाँच के दायरे में थे? जाँच की रिपोर्ट उन लोगों तक पहुँचाने का आधार और उद्देश्य क्या था?
2. पहलीSIT की रिपोर्ट तत्कालीन अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद को सौंपी गई, जिनके ट्रस्ट से पदेन सदस्य के रूप में जुड़े होने की बात सामने आई है। क्या यह हितों के टकराव का गंभीर सवाल नहीं है? और क्या उसी रिपोर्ट पर ट्रस्ट नेतृत्व द्वारा चम्पत राय का सार्वजनिक बचाव करना जाँच की निष्पक्षता और साक्ष्यों की सुरक्षा पर सवाल नहीं खड़े करता? सरकार ने इस स्थिति में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए?
3. जब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद दूसरी SIT और फॉरेंसिक ऑडिटर की जरूरत पड़ी, तो अब उत्तर प्रदेश सरकार अपनी SITकी जाँच पूरी बताकर पूरे मामले को समाप्त मानने की कोशिश क्यों कर रही है? क्या आठ लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होना ही पर्याप्त है? वरिष्ठ पदाधिकारियों की भूमिका, निगरानी में हुई विफलताओं और पूरे ट्रस्ट के वित्तीय प्रबंधन की स्वतंत्र जाँच क्यों नहीं होनी चाहिए? सरकार सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में आगे की पड़ताल और जवाबदेही तय करने से क्यों पीछे हट रही है?
चंदा और चढ़ावा देश की आस्था है, किसी की निजी जागीर नहीं। करोड़ों श्रद्धालुओं की अमानत का हिसाब देना ही होगा। चंदा और चढ़ावा चोरी का पूरा सच देश के सामने आना चाहिए और दोषियों को कानून के अनुसार दंड मिलना चाहिए।



