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गैंग लीडर बरी, अदालत ने पुलिस को क़ानून पढ़ाया

मोहम्मद सैफ

लखनऊ की फिज़ाओं में आज कल एक अलग ही धुन गूँज रही है। यह वह तराना है, जिसमें पुलिस की बनाई हुई गैंगस्टर की भारी-भरकम स्क्रिप्ट को अदालत ने बड़े इत्मीनान से क़ानून की कैंची से काटकर, सच का आईना दिखा दिया।

मामला था राज्य बनाम प्रदीप कुमार सिंह व अन्य एक ऐसा ब्लॉकबस्टर केस, जहाँ हमारी कर्तव्यनिष्ठ पुलिस ने अपनी चार्जशीट में प्रदीप सिंह को गैंग लीडर और विवेक कश्यप को उसका साइडकिक बनाकर, बड़ी शान से गैंगस्टर एक्ट की धाराएँ ठोंक दी थीं। अंदाज़ ऐसा था, जैसे किसी बच्चे ने अपने ड्राइंग पेपर पर बिना सोचे-समझे रंगों की बौछार कर दी हो, और उसे मास्टरपीस समझकर, अपनी पीठ थपथपा ली हो!

पुलिस की कलम और गैंगस्टर का तमगा, वाह री जल्दबाज़ी! पुलिस ने तो कॉकटेल बनाने में कमाल ही कर दिया था। 376 बलात्कार पॉक्सो एक्ट, और ऊपर से गैंगस्टर का ताज! ऐसा मिश्रण तैयार किया कि देखने वाले दंग रह जाएँ। लेकिन फिल्म को क्लाइमेक्स तक पहुँचने से पहले ही ब्रेक लग गया।

जैसे ही यह स्क्रिप्ट क़ानून की अदालत में पहुँची, बचाव पक्ष के अधिवक्ता डॉ. शमशेर यादव जगराना ने उस पर सवालों की ऐसी बौछार की कि पुलिस की मास्टरपीस का रंग उड़ गया। बड़े ही मासूम अंदाज़ में उन्होंने पूछा, हज़ूर, ये गैंगस्टर एक्ट किस बला का नाम है? क्या हर उस शख्स को, जिसका नाम पुलिस की कॉपी में चमक जाए, उसे गैंगस्टर कह देना ही काफ़ी है? क्या अब क़ानून को पुलिस के मूड के हिसाब से थोपा जाएगा?

डॉ. जगराना हवा में तीर चलाने वालों में से नहीं थे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा फैसलों का हवाला दिया, ख़ासकर 2025 का विनोद बिहारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य जो पुलिस की उस महान आदत पर तमाचा था, जहाँ वह हर छोटे-मोटे विवाद में गैंगस्टर का ठप्पा लगाकर, अपनी उपलब्धि की लिस्ट लंबी करती है। सुप्रीम कोर्ट तो बार-बार चेता चुका है कि गैंगस्टर एक्ट कोई खिलौना नहीं है, लेकिन पुलिस की जल्दबाज़ी को कौन समझाए? शायद वह सोचती हो कि चार्जशीट जितनी मोटी होगी, प्रमोशन उतना ही बड़ा!

न्याय का तराना और पुलिस का कड़वा सबक, अदालत ने डॉ. जगराना के तर्कों को सुना, तौला, और फिर फ़ैसला सुनाया, प्रदीप सिंह और विवेक कश्यप को बाइज्जत बरी कर दिया गया। यह जीत सिर्फ़ दो लोगों की नहीं, बल्कि क़ानून के उस स्वयं-सम्मान की थी। यह उस सिस्टम पर लगाम थी, जहाँ पुलिस की कलम अक्सर न्याय से ज़्यादा सुर्खियाँ बटोरने में लगी रहती है। मानो अदालत ने कह दिया हो, बस करो! अब क़ानून की किताब को थोड़ा पढ़ भी लिया करो!

यह फ़ैसला एक कहानी नहीं, एक कड़वा सबक है। यह एक मज़ेदार तंज है उस सिस्टम पर, जो बिना सबूत के गैंगस्टर का तमगा बाँटता फिरता है। डॉ. शमशेर यादव जगराना ने न सिर्फ़ अपने मुवक्किलों को इंसाफ दिलाया, बल्कि क़ानून के तराजू को और चमकदार बना दिया। अब शायद पुलिस अपनी अगली चार्जशीट लिखने से पहले दो बार सोचेगी, और शायद बस शायद क़ानून की किताब को थोड़ा ध्यान से पढ़ेगी।

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