‘ज़िन्दगी की मुश्किलों से दोस्तों बेकल न हो’
गजलों की एक शाम पुस्तक मेले के नाम

लखनऊ : लखनऊ पुस्तक मेले के सांस्कृतिक पंडाल में आज शाम नमन प्रकाशन लखनऊ एवं साहित्यकार संसद लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में गजलों की एक शाम पुस्तक मेले के नाम का समारोह सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता रामप्रकाश बेखुद ने की। मुख्य अतिथि डॉ. फ़िदा हुसैन एवं विशिष्ट अतिथि कृपाशंकर विश्वास थे।
कार्यक्रम की शुरूआत डॉ.शोभा दीक्षित भावना जी की वाणी वन्दना से हुई। जिसके बाद अभिषेक सहज ने अपनी इन पंक्तियों से कार्यक्रम को आगे बढ़ाया ‘कुछ नए सवेरे हमारे इख़्तियार में हैं, बहारों के मौसम अब कतार में है’। संजय मल्होत्रा हमनवा ने पढ़ा ‘मेरी गज़लों को पढ़ के तू भी कभी, कितनी अच्छी है ये किताब कहे’ जब पढ़ा तो सभी ने तारीफ की। अरविन्द झा ने अपनी गज़ल का जब यह शेर ‘होंठ पर है तिल मेरे और उनके बायें गाल पर, बात कुछ ऐसी हुई हम तिलमिला कर आ गये’ पढ़ा तो सभी खिलखिला उठे। हर्षित मिश्रा ने अपनी गजल ‘हम उसकी बस्ती में हैं, पांचों उंगलियां घी में हैं। उससे शादी करनी थी, हम जिसकी शादी में हैं’ जब पढ़ी तो सभी वाह वाह कर उठे। डॉ.श्वेता श्रीवास्तव’ अजल’ जी ने अपनी गजल ‘रोज मरना नसीब थोड़ी है, जिंदगी है सलीब थोड़ी है’ पढ़ी तो सभी ने खूब तालियां बजाई। डॉ. शोभा दीक्षित ‘भावना’ जी ने जब अपना मुक्तक ‘तुझे खुश देखकर जलता तबाही देख सकता है, जमाना रोशनी में भी सियाही देख सकता हैं, तु किस भगवान के कदमों में जाकर सर झुकाता है- तुझे खुद से बड़ा केवल पिता ही देख सकता है। पढ़ा तो सभी ने जमकर उनके मुक्तक पर तालियां बजाई। कार्यक्रम के संचालक नवीन शुक्ल ने अपनी एक हास्य गजल के जब शेर ‘सावधानी से दूर दूर रहे, बहते पानी से दूर दूर रहे, था सियासत से प्यार इस कारण, हम किसानी से दूर दूर रहे’ पढ़ा तो पांडाल में हर कोई मुस्कुरा दिया और उन्हें तालियों से नवाजा। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि कृपाशंकर विश्वास ने अपनी गज़ल ‘ज़िन्दगी की मुश्किलों से दोस्तों बेकल न हो, है न ऐसा, उलझनें हों सिर्फ, उनका हल न हो’ पढ़ी तो सभी ने जम कर तालियां बजाई। मुख्य अतिथि डॉ. फिदा हुसैन साहब ने अपनी ग़ज़ल ‘हिज ऐसा कोई सबब तो नहीं, अश्क इतने भी बेअदब तो नहीं, हर तरफ है जो नफरतों का निज़ाम, कोई शैतान अपना रब तो नहीं’ पढ़ी तो सभी ने खड़े होकर उनका इस्तकबाल किया और खूब तालियां बजाई। कार्यक्रम के अध्यक्ष रामप्रकाश बेखुद ने सभी शायरों की तारीफ की और अपनी गज़ल ‘लबो रुखसार से मैं कत्ल नहीं होने का, तेरे दीदार से मैं कत्ल नहीं होने का, मेरे सीने पे कई बार चलाओ खंजर, एक ही वार में मैं कुल्ल नहीं होने का’ पढ़ी तो हर कोई वाह वाह करता सुनाई दिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य व गजल प्रेमी मौजूद रहें। संस्था के अध्यक्ष मुनेन्द्र शुक्ल और उपाध्यक्ष आवारा नवीन ने सभी का धन्यवाद किया।



