उत्तर-प्रदेशनई दिल्लीबड़ी खबरलखनऊ

गठबंधन की गाँठे ढीली रहीं तो ? दिल्ली का सिंहासन दूर रहेगा !

के. विक्रम राव

नए बने गठबंधन की कर्णधार बनी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी अभी-अभी मुंबई, बेंगलुरु और पटना से सत्ता का सपना देखकर निकली थी। केरल और पश्चिम बंगाल के कल के उपचुनाव में उसके प्रत्याशी बेचारे हो गए। बुरी तरह हार गए। उन्हें शिकस्त देने वाले रहे सोनिया-कांग्रेस और ममता-कांग्रेस (तृणमूल)। हालांकि गत सप्ताह (1 सितंबर) को मुंबई के पांच सितारा हयात होटल में इन दोनों महिलाओं के साथी माकपा महासचिव येचूरी सीताराम ने सौगंध ली थी कि नरेंद्र मोदी को गाँव भेज देंगे। विरमगाम जहां वे चाय कभी बेचते थे। येचूरी तो प्रकाश करात द्वितीय बनने के ख्वाब संजो रहे थे। करात ने माकपा महासचिव स्व. सरदार हरकिशन सिंह सुरजीत के दौर में दो प्रधानमत्रियों एचडी देवगौड़ा और इंदर गुजराल (1 जून 1996 से 19 मार्च 1998 तक) को कठपुतली जैसे नचाया था। भारत की बागडोर पकड़े रखी थी। कल वाले केरल और पश्चिम बंगाल के उपचुनाव में करारी पराजय का गठबंधन पर अवश्य प्रभाव पड़ेगा। केरल से 20 लोकसभा सदस्य हैं और पश्चिम बंगाल से 42 हैं। इनमें भाजपा के केरल से एक भी सांसद नहीं है मगर पश्चिम बंगाल से 18 हैं।
इस बार उपचुनाव इन दोनों राज्यों में वे सब आपस में ही जंग लड़े थे। केरल में तो राजनीतिक महत्व काफी था। कारण यही कि इस 26-दलीय गठबंधन में सोनिया गांधी के विशेष सचिव केसी वेणुगोपाल इसी राज्य के हैं। पार्टी में उनकी वही भूमिका है जो कभी स्व. अहमद पटेल और यशपाल कपूर की हुआ करती थी। सोनिया-कांग्रेस के नुमायांदें भी वेणुगोपाल हैं। उनके जिम्मे था कि वे केरल की सत्तारूढ़ माकपा सरकार और विधानसभा में विपक्ष कांग्रेस पार्टी स्तर पर तालमेल बिठाएंगे। वेणुगोपाल विफल रहे। सोनिया-कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में इस सीधी और विषाक्त टक्कर के अंजाम में अब केरल में इस गठबंधन के दोनों घटकों (माकपा और सोनिया-कांग्रेस) में छतीस का आंकड़ा विकराल हो गया। केरल में एक गमनीय बात यह भी है कि राहुल गांधी यहीं के मुस्लिम-बहुल वायनाड से लोकसभा में पहुंचे थे। अमेठी में पराजित होकर। वायनाड में उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशी को ही शिकस्त दी थी। अर्थात वाम मोर्चा से सोनिया-कांग्रेस का तालमेल यहां बैठना मुमकिन नहीं है। खास कारण है ताजा उपचुनाव के बाद से राजनीतिक समीकरण कमजोर हो गए। विजयी कांग्रेसी प्रत्याशी चांडी ओमान जिसने माकपा के जायक सी. थॉमस को हराया दिवंगत कांग्रेसी ओमन चांडी के पुत्र हैं। पिता कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे। उन्हीं के निधन होने से यह उपचुनाव हुआ था। पुत्र ने माकपा को 37000 वोटो से हराया। गत 53 वर्षों से यह पुत्थुपल्ली विधान सभा क्षेत्र चांडी परिवार जीत रहा है। जब मतगणना हो रही थी तो पुत्र चांडी अपने पिता की मजार संत जॉर्ज ओर्थोड्क्स चर्च पर गए थे। अश्रुपूरित नेत्रों से आभार जताया था। तब बहन अच्छु ओमन ने कहा : “पिता की आस्था ने विजयी विधायक पुत्र चांडी से अवश्य कहा होगा कि : “चुनाव क्षेत्र की सेवा दिल से करना।” अब ऐसी भावनात्मकता पर आधारित माकपा-विरोधी के रहते क्या सोनिया-कांग्रेस का माकपा से गठबंधन में संभव होगा ?
उधर पश्चिम बंगाल में जलपाईगुड़ी जिले के धूपगुड़ी विधानसभा क्षेत्र में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के निर्मल चंद्र राय ने भाजपा की तापसी राय को तो केवल चार हजार वोटो से हराया। परंतु तीसरे नंबर पर यहां कांग्रेस-समर्थित माकपा के ईश्वर चंद्र राय रहे। उनकी जमानत खतरे में पड़ी थी। संसदीय कांग्रेसी विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी यहां अभियान के मुखिया थे। तो प्रश्न यही है कि इन सागरतटीय राज्यों में गठबंधन को समुद्र में डूबने से कौन बचा पाएगा ?
अब नजर डालें पूर्वी उत्तर प्रदेश पर। यहां भाजपा ने अवसरवादी, दलबदलू, पार्टियों पर छलांग लगाकर आने-जानेवाले दारा सिंह चौहान को नामित किया। उनकी पराजय सुखद रही। समाजवादी पार्टी के सुधाकर सिंह की विजय एक नैतिक सिद्धांत की जीत है। मेरा आकलन है कि अगर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से मशविरा किया होता तो दारा सिंह चौहान भाजपायी प्रत्याशी नहीं होते। यदि अमित शाह यूपी पर अपनी राय थोपेंगे तो घोसी जैसे परिणाम ही होते रहेंगे। अब देखें जरा कौन और कैसे हैं ये दारा सिंह जो चारों खाने चित गिरे ? वे भारतीय जनता पार्टी के सदस्य के रूप में उत्तर प्रदेश में मधुबन (विधानसभा क्षेत्र) के प्रतिनिधि थे। योगी आदित्यनाथ पूर्व कैबिनेट मंत्री थे। उन्होंने 15वीं लोकसभा में घोसी का भी प्रतिनिधित्व किया, मगर तब वे बहुजन समाज पार्टी में थे। नई दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की उपस्थिति में 2 फरवरी 2015 को भारतीय जनता पार्टी में वे भर्ती हो गए। उन्हें स्व. मुलायम सिंह यादव ने राज्यसभा में भेजा। मगर समाजवादी सरकार के गिरते ही वे (2007) में बसपा में भर्ती हो गये। फिर भाजपा में (2015) में शामिल हुए। पार्टी टिकट न मिला तो भाजपा छोड़कर सपा में आ गए। और फिर उससे भी दूर हो गए। इस प्रमाणित दल-बदलू को नामांकित कर भाजपा ने अपने चाल, चरित्र और चेहरे पर कालिख पोत ली। नतीजा सामने है।


तुलनात्मक रूप से सुधाकर सिंह की छवि भली है। यूं उन्हें समाजवादी पार्टी से नाराजगी होनी चाहिए थी। इस पार्टी ने उनका टिकट कई बार काटा था। वे दो बार विधायक रह चुके हैं। इसके बाद 2012 में नत्थूपुर विधानसभा का नाम बदलकर घोसी कर दिया गया। यहां फिर चुनाव हुआ। सुधाकर सिंह ही विजयी रहे। इस परिवेश में घोसी में सपा के विजय का श्रेय बड़ी यात्रा में चाचा शिवपाल सिंह यादव को जाता है। भाजपा जरूर गमजदा होगी कि शिवपाल सिंह यादव जैसे मित्र को खो दिया। उन्हीं के सतत अभियान का नतीजा है कि सपा ने घोसी में अपना लाल झंडा फहराया। कभी कामरेड झारखण्डे राय यहां के एकछत्र नेता होते थे। घोसी चुनाव परिणाम दोनों पार्टियों को एक संदेश, एक चेतावनी देता है। पार्टी कार्यकर्ता का सम्मान करें। ईमानदारी को सम्मान दें। पार्टी नेतृत्व दारा सिंह और सुधाकर सिंह जैसे नेताओं के गुण पहचानें। तभी घोसी जैसे नतीजे नहीं भुगतने पड़ेंगे।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button