“कांशीराम ही थे। ये भी कहा जा सकता है कि कांशीराम की वजह से ही अंबेडकर पर ज़्यादा चर्चा हुई है”

पुस्तक समीक्षा
कांशीराम जी का जीवन प्रेरक और उत्तेजित करने वाला रहा है। अंबेडकर के बाद दलित राजनीति में सबसे ज़्यादा किसी पर चर्चा हुई तो वो कांशीराम ही थे। ये भी कहा जा सकता है कि कांशीराम की वजह से ही अंबेडकर पर ज़्यादा चर्चा हुई है। बद्री नारायण की ‘कांशीराम: बहुजनों के नायक’ इस लिहाज से एक महत्वपूर्ण किताब है जो 2019 में आई थी।
अंबेडकर के समकालीन नेताओं जैसे नेहरू, गाँधी, आज़ाद, कृपलानी के बाद ऐसा कोई नहीं आया जिन्हें इन नेताओं के विचारों को मूर्त रूप देने या आगे बढ़ाने वाली अगली कड़ी के बतौर देखा जाए। यह भी शर्फ सिर्फ़ कांशीराम जी को ही हासिल है जिन्हें व्यापक तौर पर यह स्वीकृति मिली कि उन्होंने अंबेडकर के मिशन को आगे बढ़ाया। इस तरह हम कह सकते हैं कि कांशीराम भले 80 के दशक में राजनीति के पटल पर उभरे लेकिन उनकी जड़ें सीधे अंबेडकर से जुड़ती हैं। यानी वे एक निरंतर चलने वाली राजनीतिक प्रक्रिया की अगली कड़ी थे। इसीलिए जब वो कहते थे कि ‘अंबेडकर ने किताबें इकट्ठी कीं और मैंने लोग’ तो वो सीधे अपनी राजनीति को एक बड़े तबके के 3 दशक पीछे रह गयी अधूरी आकांक्षाओं से जोड़ देते थे. लेकिन अम्बेडकर की अवधारणाओं के बिल्कुल उलट अपनी समझ और व्यवहारिकता के साथ।
इसीलिए कांशीराम, अंबेडकर के अनुयायी होते हुए भी कभी उनकी फोटो कॉपी नहीं हुए। बिल्कुल मौलिक रहे और इसीलिए उनका योगदान भी बिल्कुल मौलिक रहा। जैसे- अंबेडकर ने वर्ण व्यवस्था के सबसे निचले तबकों को ‘दलित’ कहा, कांग्रेस की शब्दावली में वो ‘हरिजन’ कहे जाते रहे। इनसे विपरीत कांशीराम ने उन्हें ‘बहुजन’ नाम दिया। जो दलित सम्बोधन से निकलने वाली नकारात्मक और दीनहीन बोध से उलट एक सकारात्मक और संख्या बल से विरोधियों पर भारी पड़ने का बोध कराता है। कांशीराम कहते थे कि “मैं दलितों की दयनीय दशा से ज़्यादा दुख, दलितों की ‘दलितपन’ की भावना से महसूस करता हूँ। यह एक भीख का कटोरा है और जैसे कोई भिखमंगा बिना अपने भीख के कटोरे से मुक्त हुए, शासक नहीं बन सकता, उसी तरह कोई समुदाय तब तक शासक समुदाय नहीं बन सकता, जब तक कि वो दलितपन से खुद को छुटकारा नहीं दिला लेता। ( पेज 138)।
आप गौर करिए, 7 दशकों के अपने लोकतंत्र में किसी एक नेता द्वारा दिया गया सियासी नारा अभिवादन बन पाया है? सिवाए ‘जय भीम’ के। यह सिर्फ़ किसी एक व्यक्ति के प्रति सम्मान नहीं था। यह उस व्यक्ति के संघर्ष को सम्मान था. इसका अर्थ था समता को सलाम, स्वतंत्रता को सलाम, भाईचारे और इंसाफ़ को सलाम। ( पेज 118).
कांशीराम जी के साथ समस्या यह थी कि ‘सत्ता की कुंजी’ पाने के लिए उन्होंने अल्पकालिक बताकर जो समझौते किए उसने बसपा और स्वयं उनकी भी सीमाओं को उजागर कर दिया। जिसका असर दीर्घकालिक तौर पर इतना बुरा पड़ा कि आज बसपा सब से कम विश्वसनीय पार्टी की छवि रखती है।
अवसरवाद और वैचारिक दिशाहीनता जिसे कांशीराम ‘व्यावहारिक राजनीति’ बताते थे, ने बहुजनों की साझी उम्मीदों को गहरा झटका झटका दिया। खासकर मुसलमानों को। गुजरात 2002 के राज्य प्रायोजित मुस्लिम विरोधी हिंसा पर वे चुप रहे। अपनी चुप्पी को जायज़ ठहराते हुए उन्होंने कहा था कि ‘उनकी गुजरात में कोई रुचि नहीं है, क्योंकि वहाँ की जनसंख्या में केवल सात प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग हैं और वहाँ वह अपना आधार बनाने की कोई संभावना नहीं देखते।’ कथित तौर पर बहुजन समाज का एक हिस्सा होने के बावजूद कांशीराम मुसलमानों के खिलाफ़ होने वाले अन्यायों के प्रति चुप रहे। (पेज 150)
कांशीराम जी की एक और राजनीतिक सीमा यह रही कि उन्होंने बसपा को दलितों की सिर्फ़ चमार और उसकी उपजाति जाटव समुदाय की पार्टी बना कर रख दिया। जिसके चलते दलित समाज की अन्य जातियों ने उससे दूरी बना ली। आज भाजपा की असल ताक़त यही जातियाँ हैं। यही गलती सपा ने भी की और उसके एक जाति की पार्टी बन जाने के कारण ही अन्य पिछड़ी जातियाँ उनके रियेक्शन में भाजपा के साथ चली गयीं। आज बसपा और सपा से ठगी गयी जातियाँ ही भाजपा की असल ताक़त बनी हुई हैं।
बद्री नारायण की इस किताब को राजनीतिक कार्यकर्ताओं को ज़रूर पढ़ना चाहिए। खासकर कांशीराम द्वारा कमज़ोर कही जाने वाली जातियों में पहचान की राजनीति विकसित करने के लिए महापुरुष और मिथक गढ़ने के उनके प्रयोग को समझने के लिए।
किताब का कमज़ोर पक्ष यह है कि अगर आपने कांशीराम जी पर कई किताबें लिख चुके उनके सहयोगी एआर अकेला जी को पढ़ा हो तो इसमें आपको बहुत ज़्यादा कुछ नया नहीं मिलेगा। खासकर, उनकी ‘कांशीराम के साक्षात्कार’। वहीं मायावती से जुड़े प्रसंगों पर पत्रकार अजय बोस की किताब ‘बहन जी’ पर निर्भरता कुछ ज़्यादा ही है। तथ्यों और संदर्भों के लिए लेखक को और मेहनत करना और नये स्रोतों तक जाना चाहिए था।
वहीं यह सवाल भी उठना स्वभाविक है कि सबसे बड़े प्रदेश की राजनीति को पूरी तरह बदल देने वाले अंबेडकर के बाद दूसरे सबसे प्रभावशाली नेता पर किसी बड़े और प्रतिष्ठित प्रकाशन द्वारा पुस्तक छापने में इतना लेट क्यों हुआ? क्या इसकी वजह कथित प्रतिष्ठित प्रकाशनों पर मनुवादी नियंत्रण है? यह सवाल अगर कांशीराम जी से पूछा जाता तो वो अपने पंजाबी टोन में कलम हाथ में लेकर ज़रूर समझाते कि ऐसा मनुवादीयों की साज़िश के कारण हुआ और इसके मुकाबले के लिए हमें अपना बहुजन प्रकाशन खड़ा करना होगा। हर स्थिति में अपने और अपने लोगों के लिए संभावनाएं तलाशने वाले कांशीराम की ‘नेक कमाई’ के सकारात्मक तत्वों का बचे रहना भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत उपयोगी होगा।
शाहनवाज़ आलम
(लेखक उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक कांग्रेस के अध्यक्ष हैं)



