उत्तर-प्रदेशबड़ी खबरलखनऊ
प्रसंग एक राजनैतिक हैरत का है !!


कन्नडभाषी न्यायमूर्ति श्रीपति रवीन्द्र भट्ट (अमेरिका में शिक्षित), और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया थे। धूलियाजी उत्तराखण्ड हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति थे तथा गुवाहाटी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे। उनके पिता न्यायमूर्ति केशवचन्द धूलिया इलाहाबाद हाईकोर्ट में थे। उनके पितामह गांधीवादी श्री भैरवदत्त धूलिया 1942 के”भारत छोड़ो” आन्दोलन में तीन वर्ष जेल में रहे थे। इस खण्डपीठ का यह प्रश्न था कि सिख—बहुल पंजाब में खालसा कॉलेज को अल्पसंख्यक संस्था नामित करना न्याय को विकृत करना होगा। मसलन स्वामी दयानंद के नामवाले डीएवी कॉलेज को सम्पूर्ण राष्ट्र में अल्पसंख्यक नहीं करार दिया जा सकता है। पर पंजाब आदि हिन्दू अल्पसंख्यक राज्यों में अवश्य। याचिका में निगदित था कि हिन्दुओं को नौ राज्यों में अल्पसंख्यक क्यों नहीं घोषित किया गया? हिन्दुओं की आबादी इनमें केवल चार प्रतिशत कश्मीर में, 38.5 प्रतिशत पंजाब में, एक प्रतिशत लद्दाख में, 2.8 प्रतिशत मिजोरम में, 8.7 प्रतिशत नागालैंड में, 11.5 प्रतिशत मेघालय में, और 29 प्रतिशत अरुणाचल में है। सर्वोच्च न्यायालय के 2002 में दिया गया (टीएमए पई वाले मुकदमें में) एक निर्णय था। इसी संदर्भ में कहा गया कि हिन्दू—बहुल महाराष्ट्र सरकार ने यहूदियों को अल्पसंख्यक करार दिया है। कर्नाटक में उर्दू, तेलुगु, तमिल, मलयालम तथा मराठी को अल्पसंख्यकों की भाषा करार दिया गया हे। बौद्ध, जैन, मुस्लिम, ईसाई, सिख, पारसी को धार्मिक अल्पसंख्यक घोषित किया गया है। इस बीच केरल में हिन्दू आबादी घटकर 54.73 प्रतिशत पर आ गयी। मुसलमान बढ़े हैं। पश्चिम बंगाल में हिन्दू आबादी 1951 में 78.45 प्रतिशत थी। अब 70.54 है।