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किस्सा सास—बहू का दोबारा !

के. विक्रम राव
राष्ट्रीय विपक्ष के राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति पदों हेतु प्रत्याशी को मानों संग्रहालय (म्यूजियम) से खोजकर (बल्कि खोदकर) पेश किया गया है। जैसे बड़े दुर्लभ !! ऐसी लोकप्रतीति हो रही है। स्वनामधन्य पंडित अटल बिहारी वाजपेयी ने संप्रग से ऐसी ही कुछ कमतर हरकत की थी। उस वर्ष कल्याण सिंह की जगह 76—वर्षीय राम प्रकाश गुप्त को (12 नवम्बर 1999) यूपी का मुख्यमंत्री उन्होंने नामित कर दिया था। तभी पदच्युत हुयी मुख्यमंत्री बहन कुमारी सुश्री मायावती ने चुटकी ली थी : ”म्यूजियम से निकालकर राम प्रकाश को अटलजी सीएम पद पर लाये हैं।” आज विपक्ष पर यही कथन पूर्णतया सार्थक होता है। गमनीय बात एक और। यशवंत सिन्हा, 85—वर्षीय, विपक्ष की चौथी पसंद हैं। गनीमत है मार्गरेट निरंजन अल्वा, 80 वर्षीया, तो तीसरी हैं। सर्वप्रथम मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव येचूरी सीताराम ने पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त शाहबुद्दीन याकूब कुरैशी का नाम सुझाया था। कुरैशी साहब है जो पचास वर्षों तक आईएएस के आलाअफसर रहे और मुसलमानों की आबादी की बढ़त को नकारते है। अब रिटायर होकर वे बताते है कि भारतीय मुसलमान पर अस्तित्व का संकट आसन्न है। ठीक रिटायर्ड उपराष्ट्रपति मियां मोहम्मद हामिद अंसारी की भांति। येचूरी के प्रस्ताव को कुरैशी ने नकार दिया। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस की बंगाल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने महबूबा मुफ्ती का नाम सुझाया। स्वीकार नहीं हो पाया। हार तय है। तो दावे का साहस कौन करे? अत: बिसरायी, खोई (कांग्रेसी) मार्गरेट का उत्खन्न किया गया।




