दीन, साइंस और वतनपरस्ती, साम्राज्यवाद के सामने तने हुए इरादों की दास्तान

लखनऊ। तंज़ीमुल मकातिब के मंच से उठी यह आवाज़ महज़ एक जलसे की तक़रीर नहीं, बल्कि वैश्विक सियासत के दोहरे मानदंडों पर किया गया एक बेहद तीखा और साहसिक प्रहार है। इस दो दिवसीय सेमिनार में जब देश-दुनिया के दानिशवर और बुद्धिजीवी जुटे, तो बहस का दायरा मज़हब की सीमाओं को लांघकर वतनपरस्ती और संप्रभुता के फलसफे तक जा पहुंचा। वरिष्ठ पत्रकार अशोक पाण्डेय ने अपने बेबाक और संजीदा लफ़्ज़ों में कहा कि साम्राज्यवाद का अपना कोई मज़हब नहीं होता, उसका इतिहास महज़ लूट, खसोट और इंसानी ख़ून से लिखा गया है। लोकतंत्र की आड़ में दुनिया भर में दहशत और नफ़रत का बाज़ार सजाकर जो ख़ुद को वैश्विक ठेकेदार समझते हैं, उन्हें इतिहास के पन्ने पलटकर देख लेने चाहिए। अगर अमेरिकी हुक्मरान दसवीं सदी के अजीम शायर फिरदौसी का लिखा शाहनामा पढ़ लेते, तो उन्हें अंदाज़ा हो जाता कि परशियनों की मिट्टी का मिजाज क्या है और वे उसे डराने की भूल कभी न करते। मौजूदा वैश्विक तनावों और अमेरिकी दखलंदाजी पर गहरा विश्लेषण रखते हुए उन्होंने कहा कि आज जो जंग हमें दिखाई दे रही है, वह किसी एक मज़हब, मुल्क या तबके की नहीं है, बल्कि यह टकराव इस बात का फैसला करेगा कि आने वाले वक्त में दुनिया के मुल्क अपनी संप्रभुता से जिएंगे या महाशक्तियों की गुंडागर्दी के साए में। पश्चिमी ताकतों के दोहरे रवैये पर तंज कसते हुए उन्होंने एक बेहद मौजूं सवाल उठाया कि अगर महाशक्तियों को ईरान के सीमित लोकतंत्र की इतनी ही फ़िक्र है, तो उन्हें अरब मुल्कों की सुल्तानी व्यवस्थाएं क्यों नहीं चुभतीं, जहाँ लोकतंत्र का अलिफ़ भी मौजूद नहीं है।
ईरानी अवाम के जज़्बे को सलाम करते हुए वक्ताओं ने कहा कि यह कोई मामूली बात नहीं है कि सिर पर बमों के गिरने का खौफ हो, और लोग खुली सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हों। इस अटूट हौसले की वजह को साफ़ करते हुए श्री पाण्डेय ने कहा कि ईरान ने प्रतिबंधों और मुश्किलों के बाद भी अगर ख़ुद को टिकाए रखा है, तो उसके पीछे एक ही राज़ है कि उसने अपनी अवाम को दीन के साथ साइंस का इल्म भी दिया है। मज़हब कोई भी हो, चाहे यहूदी हो, ईसाई हो, सुन्नी हो या शिया, वहां पहली पहचान ईरानी होने की है, ठीक उसी तरह जैसे हम सब मज़हब से पहले हिन्दुस्तानी हैं। इस दौरान उन्होंने रज़ा शाह पहलवी के दौर पर भी कटाक्ष किया कि सीआईए और मोसाद के दम पर दो पीढ़ियों तक हुकूमत करने वाले आज फिर पिछले दरवाजे से मुल्क पर मुसल्लत होने का ख्वाब देख रहे हैं। सेमिनार में मध्य प्रदेश से आए प्रख्यात समाजवादी नेता और पूर्व विधायक डॉ. सुनीलम सिंह ने अमेरिकी नीतियों की धज्जियां उड़ाते हुए कहा कि हर मुल्क को अपना गुलाम बनाकर रखने की यह साम्राज्यवादी सोच अब ढहने की कगार पर है, वहीं पंडित विजय शर्मा ने जांबाजी की तारीफ़ करते हुए कहा कि जो कौमें व्यापार के लिए दुनिया में नफ़रत फैलाती हैं, उनके सामने घुटने न टेकने का हौसला ही असल इंसानी बहादुरी है।
इस दो दिवसीय संगोष्ठी में देश भर से आए विख्यात उलेमा, चिंतक और बुद्धिजीवियों ने अपनी वैचारिक आहुति दी। कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्थान के सचिव सय्यद सफी हैदर साहब ने की, जिन्होंने शिक्षा और स्वाभिमान के महत्व पर रौशनी डाली। मंच का सफल संचालन महफ़िल की नब्ज पर पकड़ रखने वाले अनीस जाएसी ने अपने ख़ूबसूरत अंदाज़ में किया। इस गरिमामयी अवसर पर मौलाना सय्यद साबिउल हसन, मौलाना सय्यद रज़ा हुसैन, और मौलाना सफ़दर जौनपुरी जैसे अजीम उलेमा-ए-किराम मंच की शोभा रहे। जलसे में तशरीफ़ लाए सभी मेहमानों का इस्तकबाल मौलाना मुमताज़ जाफ़री, मौलाना सय्यद तहज़ीबुल हसन, निहाल ज़ैदी, मौलाना नावेद साहब और आमिर साबरी ने बेहद अक़ीदत और मोहब्बत के साथ किया। यह सेमिनार महज़ एक तकरीर बनकर नहीं रहा, बल्कि यह इस बात का पैगाम दे गया कि जब इल्म और वतनपरस्ती का संगम होता है, तो दुनिया की कोई भी बड़ी ताकत आपके इरादों को डिगा नहीं सकती।



