शिवरात्रि पर विकारों एवं बुराइयों से व्रत रखें: स्वर्णलता बहन
बेतवा में शिवजयंती समारोह

लखनऊ : गोमती नगर एक्सटेंशन में स्थित बेतवा अपार्टमेंट वेलफेयर सोसाइटी द्वारा एक आध्यात्मिक संध्या का आयोजन किया गया. इस संध्या में ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ श्रंखला के अंतर्गत ब्रम्हाकुमारीज की स्वर्णलता बहन मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहीं.

उन्होंने शिवरात्रि का आध्यात्मिक रहस्य विस्तार से स्पष्ट करते हुए बताया कि आज यदि हम वर्तमान सांसारिक परिदृश्य का अवलोकन करें तो चारों ओर व्याप्त काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, भ्रष्टाचार में डूबा समाज अधर्म और धर्मग्लानि का ही समय है। जिस समाज में भ्रष्टाचार, जीवन में शिष्टाचार बन गया हो, उसे धर्मग्लानि का काल नहीं तो और क्या सम्बोधित कर सकते हैं? तो शिव के साथ रात्रि का जो सम्बन्ध है, वह परमात्मा शिव के घोर पापाचार और वर्तमान तमोप्रधान कलियुग में अवतरण की यादगार है। वैसे भी भारतीय दर्शन में ‘रात्रि’ शब्द ‘अज्ञानता’ और ‘विनाशकाल’ का सूचक है । ऐसे ही समय में जब ईश्वरीय ज्ञान प्राय:लोप हो जाता है, तब ज्योतिर्बिंन्दु स्वरूप परमात्मा शिव अधर्म का विनाश करके सत्य धर्म की स्थापना करने के लिए अवतरित होते हैं।

परमात्मा शिव पर यथार्थ रूप से क्या चढ़ाना चाहिए और किस प्रकार से व्रत का पालन करना चाहिए? इसके आध्यात्मिक रहस्य को समझने की आवश्यकता है. सभी विकार मनुष्य के तन, मन, संबंध और संसार को कड़वेपन से भर देते हैं। ये विकार ज़हर समान हैं। भगवान ने इस ज़हर को अपने ऊपर अर्पित करवाया था लेकिन भोले भक्तों ने भीतर के ज़हर को तो अर्पित किया नहीं और प्रकृति के एक ज़हर जैसे कड़वे पौधे आक को शिवलिंग पर अर्पित करने लगे। इसी प्रकार भगवान ने कहा था कि जाति, कुल, धर्म, भाषा, पद, प्रतिष्ठा, रूप, धन, जवानी, विद्या आदि के सभी नशे अथवा अहंकार मेरे पर चढा देना, यहाँ भी हम मनुष्य मात खा गये। भीतर के नशों को अर्पित करने की बजाय हमने प्रकृति की नशीली चीज़ें जैसे- भांग, धतूरे आदि को अर्पित करना शुरू कर दिया। धतूरा – विकार का, बेर- नफरत घृणा का और बेलपत्र – बुराइयों का प्रतीक है। अतः हमें परमात्मा शिव पर विकारों, विषय- वासना एवं बुरी आदतों को चढ़ाना चाहिए अर्थात् त्याग करना चाहिए। वास्तव में, शिवरात्रि वर्तमान कलियुग के अन्त और सतयुग के प्रारम्भ में बीच के समय ‘संगमयुग’ का नाम है, जब स्वयं निराकार परमपिता शिव, साकार मानव-तन प्रजापिता ब्रह्मा (पौराणिक नाम नन्दीगण ) के तन में अवतरित होकर मनुष्यात्माओं से विकारों और बुराइयों का, ईश्वरीय ज्ञान और राजयोग की शिक्षा देकर त्याग कराते हैं । यह नन्दीगण बूढ़े बैल तो मात्र प्रतीक है परन्तु इसका अर्थ यह है कि परमात्मा, प्रजापिता ब्रह्मा के बूढ़े तन का उपयोग सृष्टि को नया बनाने में करते हैं इसलिए शास्त्रों में वर्णित है कि परमात्मा बूढ़े बैल अर्थात् नन्दी की सवारी करते हैं। परमात्मा की इस सवारी को ‘भागीरथ’ भी कहते हैं। भागीरथ अर्थात् ‘ भाग्यशाली रथ’ जिसका उपयोग स्वयं परमात्मा के अवतरण के लिए होता है।

अतः शिवरात्रि पर विकारों एवं बुराइयों से व्रत रखें। रात्रि जागरण का आध्यात्मिक रहस्य यह है कि परमात्मा शिव के वर्तमान समय के अवतरण के काल में हम अपनी आत्मा की ज्योति को जगायें, अज्ञान – निद्रा में सो न जायें। शिव की बारात का आध्यात्मिक रहस्य यह है परमात्मा शिव मनुष्य आत्माओं को सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त, सृष्टि चक्र, कर्मों की यथार्थ समझ एवं गहन गति का ज्ञान देकर अपने निवास स्थान परमधाम ले जाते हैं । वास्तव में बहुरूपी बाराती मनुष्य के विकृत सूक्ष्म संस्कारों का शास्त्रीय रूपक चित्रण हैं । अतः शिवरात्रि के महात्म्य और आध्यात्मिक रहस्य को यथार्थ रीति से समझकर मनाने से ही सर्व मनुष्यात्माओं और संसार का कल्याण हो सकता है।
इस आध्यात्मिक संध्या में, वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष संजय कुमार श्रीवास्त, कोषाध्यक्ष मिराज अहमद विशिष्ट जनों सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे. कार्यक्रम का समापन ‘शिव परमात्मा झंडारोहण’ के साथ हुआ और अंत में सभी को प्रसाद दिया गया.



