हिन्दी का भविष्य युवाओं के हाथ में है और उन्हें हिन्दी में सृजन, शोध तथा नवाचार को अपनाना चाहिए : प्रसून जोशी
हिन्दी भवन में पद्मभूषण रजत शर्मा ने प्रसून जोशी को प्रदान किया 'हिन्दी रत्न सम्मान-2026'

नई दिल्ली । राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन की जयंती के अवसर पर श्री पुरुषोत्तम हिन्दी भवन, नई दिल्ली में आयोजित समारोह में प्रख्यात साहित्यकार, गीतकार, चिंतक एवं प्रसार भारती के अध्यक्ष पद्मश्री प्रसून जोशी को ‘हिन्दी रत्न सम्मान-2026’ से अलंकृत किया गया। हिन्दी भाषा, साहित्य, भारतीय संस्कृति और जनसंचार के क्षेत्र में उनके बहुआयामी योगदान के लिए यह सम्मान प्रदान किया गया।

समारोह की अध्यक्षता हिन्दी भवन के संरक्षक प्रभात कुमार ने की तथा पद्मभूषण रजत शर्मा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। विशिष्ट वक्ता के रूप में प्रख्यात साहित्यकार डॉ. अशोक चक्रधर ने प्रसून जोशी के साहित्यिक और रचनात्मक व्यक्तित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।
इसके पश्चात हिन्दी भवन की गौरवशाली यात्रा तथा प्रसून जोशी एवं रजत शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित विशेष दृश्य-श्रव्य प्रस्तुति प्रदर्शित की गई।
सम्मान की औपचारिक शुरुआत हिन्दी भवन की सह मंत्री डॉ. रत्नावली कौशिक द्वारा प्रसून जोशी को तिलक लगाकर रजत श्रीफल भेंट करने से हुई। इसके उपरांत हिन्दी भवन के न्यासी, वरिष्ठ पत्रकार राजीव रंजन ने उन्हें शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। अंततः मुख्य अतिथि पद्मभूषण रजत शर्मा ने प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान निधि प्रदान करते हुए ‘हिन्दी रत्न सम्मान 2026’ से अलंकृत किया। इस अवसर पर सभागार देर तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा।
अपने स्वीकृति भाषण में प्रसून जोशी ने कहा कि हिन्दी किसी कृत्रिम संरक्षण की नहीं बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े स्वाभाविक विकास की भाषा है। उन्होंने कहा कि ‘हिन्दी को केमिकल और स्टेरॉयड्स की आवश्यकता नहीं है, उसे उसकी जड़ों तक जल, प्रकाश और स्वाभाविक प्रवाह पहुँचाने की आवश्यकता है।’ उन्होंने कहा कि अंग्रेजी एक कौशल हो सकती है, लेकिन भाषा हमारी पहचान और हमारी माँ होती है। हिन्दी का भविष्य युवाओं के हाथ में है और उन्हें हिन्दी में सृजन, शोध तथा नवाचार को अपनाना चाहिए।

उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) पर भी गंभीर विचार रखते हुए कहा कि तकनीक मानव की सहायता कर सकती है, लेकिन संवेदना, नैतिकता और मूल्यबोध का स्थान कभी नहीं ले सकती। उन्होंने अपनी चर्चित कविताओं का पाठ भी किया, जिसे उपस्थित साहित्यकारों और श्रोताओं ने लंबे समय तक तालियों से सराहा।
मुख्य अतिथि पद्मभूषण रजत शर्मा ने कहा कि प्रसून जोशी ने हिन्दी को साहित्य, विज्ञापन, सिनेमा और जनसंचार के माध्यम से वैश्विक पहचान दिलाई है। उन्होंने कहा कि हिन्दी आज विश्व मंच पर पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली भाषा के रूप में स्थापित हो रही है और प्रसून जोशी का योगदान इस यात्रा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने हिन्दी भवन से अपने आत्मीय संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि कैसे जीवन में हिन्दी भवन के पुस्तकालय ने उनके व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अपने विशिष्ट वक्तव्य में डॉ. अशोक चक्रधर ने कहा कि प्रसून जोशी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी मौलिकता और जीवनानुभव है। उन्होंने कहा कि उन्होंने रचनात्मकता और व्यावसायिकता के बीच एक सशक्त सेतु का निर्माण किया है। उनकी लेखनी भारतीय संस्कृति, संवेदना और आधुनिक सोच का अद्भुत संगम है।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रभात कुमार ने कहा कि हिन्दी भवन केवल एक संस्था नहीं, बल्कि हिन्दी भाषा, साहित्य और भारतीय सांस्कृतिक चेतना का जीवंत आंदोलन है। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता तथ्यों और विवेकपूर्ण संवाद की है तथा हिन्दी भवन आने वाली पीढ़ियों को भाषा और साहित्य से जोड़ने का कार्य निरंतर करता रहेगा।
समारोह के अवसर पर सुप्रसिद्ध लोकगायिका मालिनी अवस्थी, जो व्यक्तिगत कारणों से उपस्थित नहीं हो सकीं, ने प्रसून जोशी के नाम अपना विशेष शुभकामना संदेश भेजा। अपने संदेश में उन्होंने प्रसून जोशी को हिन्दी और भारतीय लोक-संस्कृति का सशक्त प्रतिनिधि बताते हुए ‘हिन्दी रत्न सम्मान 2026’ के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ प्रेषित कीं।
इस अवसर पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी प्रसून जोशी के नाम अपना लिखित संदेश भेजा। अपने संदेश में उन्होंने कहा कि प्रसून जोशी ने हिन्दी भाषा, भारतीय संस्कृति और उत्तराखंड की सृजनशील परंपरा को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई है। उन्होंने हिन्दी रत्न सम्मान प्राप्त करने पर उन्हें हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए उनके दीर्घायु एवं निरंतर सृजनशील जीवन की कामना की।
कार्यक्रम का कुशल संचालन रिद्धि भारद्वाज ने किया. देशभर से आए साहित्यकारों, पत्रकारों, शिक्षाविदों, कलाकारों, विद्यार्थियों एवं हिन्दी प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति ने समारोह को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। हिन्दी भाषा, साहित्य, मीडिया, संस्कृति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में भाषा की भूमिका पर हुए गंभीर विमर्श ने इस आयोजन को एक ऐतिहासिक साहित्यिक आयोजन का स्वरूप दिया।
अंत में हिन्दी भवन की ट्रस्टी डॉ. इन्दिरा मोहन ने सभी अतिथियों, मीडिया प्रतिनिधियों एवं उपस्थित जनसमुदाय का आभार व्यक्त किया।



