700 वाली गली की 25 साल पुरानी सबील, अक़ीदत और ख़िदमत की मिसाल

लखनऊ। शोहदा-ए-कर्बला की याद में मोहर्रम के दौरान ख़िदमत और अक़ीदत के कई बेमिसाल नज़ारे देखने को मिलते हैं। ऐसा ही एक रूहानी मंज़र ग्यारह मोहर्रम को फातमान से दरगाह हज़रत अब्बास अ.स. तक जाने वाले ऐतिहासिक जुलूस के दौरान नज़र आता है। इस जुलूस के रास्ते में अज़ादारों और ज़ायरीन की सहूलियत के लिए जगह-जगह सबीले लगाई जाती हैं, जिनमें से कुछ सबीले अपने लंबे इतिहास और सेवा भाव के लिए ख़ास पहचान रखती हैं।
इन्हीं में से एक बेहद ख़ास और ऐतिहासिक सबील सात सौ वाली गली में ज़ैदी लॉन्ड्री के पास लगाई जाती है। इस सबील का इतिहास बेहद गौरवशाली है और यह पिछले पच्चीस सालों से लगातार अज़ादारों की सेवा में समर्पित है। पच्चीस वर्षों की यह अटूट रिवायत आज भी उसी शिद्दत और अक़ीदत के साथ कायम है। इस सबील की एक बड़ी ख़ासियत यह भी है कि यह केवल ग्यारह मोहर्रम के जुलूस तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सात मोहर्रम से लेकर बारह मोहर्रम तक पूरे छह दिन यहाँ लगातार पानी, शरबत और तबर् रुक का मुकम्मल इंतज़ाम रहता है ताकि यहाँ से गुज़रने वाला कोई भी ज़ायरीन प्यासा न लौटे।
इस सबील को सुचारू रूप से चलाने और अज़ादारों की ख़िदमत को मुमकिन बनाने में यहाँ के बानियों और स्थानीय निवासियों का बहुत बड़ा योगदान है। इस पुनीत कार्य की देखरेख मुख्य रूप से यूनुस हैदर, सरताज आलम, हसन रज़ा उर्फ बबलू और मुश्ताक़ हुसैन उर्फ भैय्या द्वारा की जाती है। इन बानियों के साथ-साथ सात सौ वाली गली के तमाम लोग इस सबील को कामयाब बनाने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं। गली के सभी लोग इस सेवा कार्य में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और अपनी कड़ी मेहनत से इमाम हुसैन अ.स. और हज़रत अब्बास अ.स. के प्रति अपनी सच्ची मोहब्बत का इज़हार करते हैं। दरगाह हज़रत अब्बास अ.स. की तरफ बढ़ने वाले अज़ादारों के लिए यह सबील महज़ एक पानी पीने की जगह नहीं, बल्कि अक़ीदत, भाईचारे और इंसानियत की जीती-जागती मिसाल बन चुकी है।



