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वाह री व्यवस्था ! नक्शा पास करे एलडीए, चाभी दें सीएम  व अवैध बताकर नोटिस चस्पा कर जाए जिलेदार

लखनऊ। डिजिटल इंडिया, सिंगल विंडो क्लीयरेंस और अद्भुत अंतर-विभागीय समन्वय के इस स्वर्णिम काल में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सुशासन की एक ऐसी दिव्य झांकी प्रकट हुई है, जिसे देखकर बड़े-बड़े कूटनीतिज्ञ भी बगलें झांकने लगें। मामला गोमती के पावन तट पर बसे डालीबाग का है, जहाँ लखनऊ विकास प्राधिकरण, एलडीए और सिंचाई विभाग ने मिलकर अंधेर नगरी, चौपट राजा के मुहावरे को आधुनिक प्रशासनिक अमलीजामा पहना दिया है।

कहानी की शुरुआत बड़ी दिलचस्प थी। पूर्व विधायक मुख्तार अंसारी के चंगुल से 2314 वर्गमीटर जमीन को कब्जामुक्त कराया गया। जनता ने तालियां बजाईं। फिर हमारी कर्मठ एलडीए ने उस पर 10.70 लाख रुपये प्रति फ्लैट की दर से 72 फ्लैटों वाली चमचमाती सरदार पटेल आवासीय योजना खड़ी कर दी। योजना इतनी लोक-लुभावन थी कि 72 घरों के लिए करीब 8000 लाचार जनता ने लाइन लगा दी। पिछले साल 4 नवंबर को स्वयं सूबे के मुखिया मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने कर-कमलों से पात्रों को चाबियां सौंपीं। जनता की आँखों में अपने घर के आंसू थे, और एलडीए के अफसरों के सीने पर गर्व के तमगे।

सोचिए, जिस फाइल पर मुख्यमंत्री के दस्तखत की स्याही अभी सूखी भी नहीं होगी, उस पर कैनाल एक्ट 1873 की धूल झाड़कर जिलेदार साहब ने अपना वीटो लगा दिया। सुशासन का इससे सजीव उदाहरण भला दुनिया के किस कोने में मिलेगा?

मगर सरकारी फाइलों की अपनी एक समानांतर दुनिया होती है, जहाँ दायां हाथ बाएं हाथ से अपरिचित रहने की कसम खाए बैठा है। अभी आवंटियों को गृह-प्रवेश की ठीक से बधाई भी नहीं मिली थी कि अचानक सिंचाई विभाग कुंभकर्णी नींद से जागा। उसने अपनी आँखें मलीं, नक्शा देखा और पाया कि अरे! एलडीए ने तो उनके बंधे की जमीन पर ही महल खड़ा कर दिया है। फिर क्या था? विभाग के जांबाज जिलेदार साहब दौड़ते हुए आए और आखिरी छोर के एक फ्लैट पर कैनाल एक्ट 1873 की धारा 70 का पीला परचा नोटिस चस्पा कर दिया।

नोटिस की भाषा इतनी शालीन है कि पढ़ते ही सरकारी संवेदनशीलता पर रोना आ जाए। 7 दिन का अल्टीमेटम दिया गया है। कब्जा हटाओ, वरना हम उजाड़ेंगे। इतना ही नहीं, यदि उजाड़ने में विभाग को मेहनत लगी, तो उसका हर्जा-खर्चा और शमन शुल्क भी उन्हीं गरीब आवंटियों से वसूला जाएगा, जिन्होंने अपनी जीवनभर की पूंजी एलडीए की रसीद पर भरोसा करके फूंक दी थी।

 

अब जरा क्रोनोलॉजी समझिए। जब इस जमीन पर नक्शा पास हो रहा था, जब ईंटें रखी जा रही थीं, जब सीमेंट का गारा साना जा रहा था, तब सिंचाई विभाग के इंजीनियर और अमीन किस दिव्य समाधि में लीन थे? क्या वे इस ताक में बैठे थे कि पहले एलडीए गरीबों के करोड़ों रुपये लगवाकर पूरी बिल्डिंग खड़ी कर ले, मुख्यमंत्री आकर खुद उसकी ब्रांडिंग कर दें, और तब वे 1873 का कानून लेकर सिंघम की तरह एंट्री मारेंगे?

यह तंज सिर्फ एक विभाग पर नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर है जहाँ दो बड़े सरकारी महकमे एक-दूसरे से इस तरह अछूते हैं जैसे एक ही दफ्तर के दो बाबू जो आपस में कट्टी हों और रिटायरमेंट तक एक-दूसरे का चेहरा न देखने की कसम खाए बैठे हों। एलडीए को नहीं पता कि जमीन सिंचाई विभाग की है, और सिंचाई विभाग को तब तक भनक नहीं लगती जब तक बहुमंजिला इमारत बनकर तैयार न हो जाए। बीच में फंसा है वह आम आदमी, जो अब मुख्यमंत्री की दी हुई वैध चाबी हाथ में लेकर सिंचाई विभाग के अवैध के बोर्ड को निहार रहा है।

अब देखना यह है कि इस सरकारी बनाम सरकारी की नूराकुश्ती में जीत किसकी होती है। क्या एलडीए अपने ही भाई-बंधु सिंचाई विभाग को कोई शमन शुल्क देकर मामले को रफा-दफा करेगी, या फिर हमेशा की तरह आम जनता की पीठ पर इस प्रशासनिक नालायकी का कोड़ा बरसेगा? फिलहाल, डालीबाग के ये 72 फ्लैट इस बात का जीता-जागता स्मारक हैं कि सरकार के भीतर कितनी सरकारें चलती हैं!

 

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