शहीद अब्दुल रफ़ीक खान की याद में उमड़ा व्यापारियों का सैलाब

लखनऊ। राजधानी के ऐतिहासिक नक्खास बाजार में आयोजित शहीद अब्दुल रफ़ीक खान की 21वीं पुण्यतिथि मात्र एक शोक सभा नहीं, बल्कि व्यापारियों के स्वाभिमान और एकजुटता का एक बुलंद उद्घोष बनकर उभरी। कार्यक्रम में मौजूद मुख्य वक्ताओं ने अपने ओजस्वी विचारों से शहीद की विरासत को नई ऊंचाई दी।
साम्प्रदायिक एकता का रूहानी संदेश, साहब एक्शन कमेटी के अध्यक्ष और प्रमुख समाजसेवी अब्दुल वहीद फ़ारुक़ी ने अपने संबोधन में समाज की बुनावट और भाईचारे पर गहरा ज़ोर दिया। उन्होंने कहा, शहीद अब्दुल रफ़ीक खान की शहादत किसी एक धर्म या वर्ग के लिए नहीं थी, बल्कि उन्होंने इंसानियत और हक की खातिर अपनी जान का नज़राना पेश किया था। यह बाज़ार उस साझी विरासत का गवाह है जहाँ हिंदू-मुस्लिम की दीवारें ढह जाती हैं और सिर्फ इंसानियत का रिश्ता बचता है। हमें इस गुलदस्ते जैसी एकता को महफूज़ रखना है, क्योंकि यही हमारे मुल्क की असली रूह है। बाज़ार की रौनक तभी तक है, जब तक हमारा आपसी प्रेम सलामत है।
वही भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं व्यापारी संगठन के संरक्षक अजय त्रिपाठी मुन्ना ने एक अभिभावक के रूप में व्यापारियों में आत्मविश्वास जगाते हुए कहा की इतिहास गवाह है कि जब-जब दबे-कुचले लोगों की आवाज़ दबाई गई, तब-तब शहीद अब्दुल रफ़ीक खान जैसे नायकों ने अपने रक्त से न्याय की इबारत लिखी। शहीद रफ़ीक साहब ने व्यापारियों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए खुद को अग्नि के हवाले कर दिया था। आज मैं आप सबको यह विश्वास दिलाने आया हूँ कि व्यापारी समाज अब अकेला नहीं है। संगठन आपकी ढाल है। हम शासन और प्रशासन के बीच सेतु बनकर खड़े हैं, ताकि किसी भी छोटे या बड़े दुकानदार का उत्पीड़न न हो सके। शहीद के परिवार की खुशहाली और व्यापारियों का सम्मान ही हमारी प्राथमिकता है।
साप्ताहिक बाज़ार दुकानदार कल्याण समिति के अध्यक्ष नदीम सिद्दीकी ने शहीद के संघर्षों को वर्तमान चुनौतियों से जोड़ते हुए बेहद प्रभावशाली बयान दिया, आज हम जिस खुली हवा में व्यापार कर रहे हैं, उसके पीछे 39 दिनों का वह कठिन अनशन और हमारे रहबर का वह आत्मबलिदान है। शहीद रफ़ीक साहब ने हमें सिखाया कि हक़ मांगा नहीं, छीना जाता है। आज कुछ ताकतें हमें गुमराह करने और संगठन को बांटने की कोशिश करेंगी, लेकिन याद रखिएगा कि 1800 दुकानदारों का यह परिवार तभी तक सुरक्षित है जब तक हम एक मुट्ठी की तरह बंद हैं। हम माननीय राजनाथ सिंह जी और ब्रजेश पाठक जी के मार्गदर्शन में बाजारों को आधुनिक और व्यवस्थित बना रहे हैं, लेकिन हमारी असली ताकत हमारा अनुशासन और आपसी विश्वास है। शहीद का खून बेकार नहीं जाएगा, हम उनके स्वाभिमान के झंडे को झुकने नहीं देंगे।
इन तीनों दिग्गजों के बयानों ने यह स्पष्ट कर दिया कि शहीद अब्दुल रफ़ीक खान की विरासत आज भी लखनऊ के व्यापारियों के दिलों में धड़क रही है। जहाँ एक ओर अब्दुल वहीद ने इसे मोहब्बत का मिशन बताया, वहीं अजय त्रिपाठी ने इसे न्याय का कवच और नदीम सिद्दीकी ने इसे एकता का संकल्प करार दिया। श्रद्धांजलि सभा का अंत इस सामूहिक प्रतिज्ञा के साथ हुआ कि व्यापारियों के हितों की रक्षा के लिए संघर्ष की यह मशाल कभी बुझने नहीं दी जाएगी।



