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एक रूपये प्रति लीटर में दूध!

नागरिक परिक्रमा

संजय पराते की राजनैतिक टिप्पणियां

है न चौंकाने वाली बात! लेकिन है सही। जी हां, कर्नाटक में फ्लिपकार्ट अपने प्रचारात्मक बिक्री अभियान के तहत एक रूपये प्रति लीटर की दर पर दूध बेच रहा है। इस ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का स्वामित्व अमेरिकी खुदरा दिग्गज वॉलमार्ट के पास है। प्रचार अवधि के दौरान लाखों लीटर दूध मिट्टी के भाव में फ्लिपकार्ट ने बेचा है, जिससे बेंगलुरु मिल्क यूनियन लिमिटेड जैसे सहकारी संघों की बिक्री में लगभग 50,000 लीटर प्रतिदिन की कमी दर्ज की गई है। इसका सीधा असर पशुपालक और दूध उत्पादक किसानों की आजीविका पर पड़ा है। ऐसा ही चलता रहा, तो कुछ दिनों में ही कर्नाटक की सहकारी समितियों के ठप्प होने का खतरा पैदा हो गया है।

यह तो केवल झांकी है। जब अमेरिका और विभिन्न विकसित देशों के साथ केंद्र की भाजपा सरकार ने जो मुक्त व्यापार समझौते किए हैं, उन पर अमल के कृषि क्षेत्र में जो परिणाम सामने आएंगे, वे हमारे किसानों और खेती-किसानी के लिए कितने विनाशकारी होंगे, कर्नाटक के दूध बाजार पर कब्जे के लिए वॉलमार्ट द्वारा की जा रही इस आक्रामक नीति से समझा जा सकता है। फ्लिपकार्ट द्वारा एक रूपये की कीमत पर दूध की बिक्री कोई साधारण मार्केटिंग अभ्यास नहीं है, बल्कि वैश्विक पूंजी से समर्थित बड़ी प्लेटफ़ॉर्म कंपनियों द्वारा अपनाई जाने वाली शिकारी मूल्य निर्धारण की एक क्लासिक मिसाल है, जिसका शिकार भारत और तीसरी दुनिया के गरीब देशों को बनाया जा रहा है। ऐसी रणनीतियाँ बाजार पर कब्ज़ा करने, मौजूदा सहकारी संस्थाओं को कमजोर करने और घरेलू उत्पादन प्रणाली को नष्ट करने और अंततः खरीद व वितरण पर कॉरपोरेट नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से अपनाई जाती हैं। तीसरी दुनिया का शोषण करने की यह साम्राज्यवादी रणनीति है।

वालमार्ट-फ्लिपकार्ट की इस शिकारी रणनीति से पूरे कर्नाटक डेयरी किसानों में गुस्सा पैदा हुआ है, लेकिन अमित शाह के नेतृत्व वाला सहकारिता मंत्रालय अभी तक सोया हुआ है। उसने कर्नाटक के किसानों को बचाने के लिए अभी तक कोई कदम नहीं उठाया है और ऐसा लगता है कि उसने विदेशी कॉरपोरेट कंपनियों और बाजार के दबाव के आगे समर्पण कर दिया है।

दूध बाजार पर यह आक्रमण ऐसे समय में और भी चिंताजनक है, जब डेयरी किसान पहले से ही बढ़ती लागत, भुगतान में देरी और दूध उत्पादन के लिए उचित लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। कर्नाटक के दूध बाजार पर कब्जे के लिए फ्लिपकार्ट के इस शिकारी अभियान के बाद किसानों के दूध के औसत विक्रय मूल्य में भारी गिरावट तो आई ही है, दूध बिक्री में गिरावट के मद्देनजर सोसायटियों ने किसानों का दूध खरीदना भी कम कर दिया है। इस प्रकार, किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है। दूध बाजार पर कॉरपोरेट कंपनियों द्वारा आक्रमण की यह रणनीति भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा निर्धारित मानदंडों का भी उल्लंघन करती है और इसकी जांच की जानी चाहिए।

यह तो साफ है कि भविष्य में सहकारी संस्थाओं पर और ज्यादा हमले होंगे। उतना ही यह भी साफ है कि न तो अमित शाह के हाथ में देश का सहकारिता क्षेत्र सुरक्षित है और न ही संघी गिरोह के हाथ में देश का भविष्य सुरक्षित है।

 

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