सूचना संचार के डिजिटल युग ने हिन्दी की विकास यात्रा को समृद्ध किया है : प्रो. सुमन
डिजिटल माध्यमों ने हिंदी भाषा को ऊर्जा दी है

नई दिल्ली : नव सूचना संचार तकनीकी माध्यमों ने हिन्दी भाषा की विकास यात्रा को समृद्ध किया है, इसमें डिजिटल साहित्य व डिजिटल माध्यमों के योगदान की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। डिजिटल की इस क्रांति ने हिन्दी भाषा के विकास में अपनी अहम भूमिका का निर्वाह किया है। उक्त विचार प्रो . हंसराज सुमन ने हिन्दी की विकास यात्रा में डिजिटल माध्यमों का योगदान विषय पर शुक्रवार को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर अरबिंदो कॉलेज के छात्रों को संबोधित करते हुए कहे। प्रो. हंसराज सुमन ने ” हिन्दी भाषा सम्प्रेषण और संचार ” विषय पर अपना व्याख्यान देते हुए कहा कि हिन्दी का क्षेत्र अब पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं तक ही सीमित नहीं रहा है बल्कि वह इंटरनेट, ब्लॉग, पॉडकास्ट, ई-पुस्तकें, सोशल मीडिया, वेब सीरीज और ओटीटी प्लेटफॉर्म के माध्यम से हर व्यक्ति तक प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिये पहुँच रही है, यही हिन्दी की ताकत है , जो अपनी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुकी है ।
प्रो. हंसराज सुमन ने छात्रों को जानकारी देते हुए बताया कि संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त 22 भाषाएँ हैं जिसमें असमिया, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू है । ये भाषाएं स्थान – स्थान पर मातृभाषा के तौर पर भी प्रयोग की जाती है । उन्होंने यह भी बताया कि भारत में भाषाई विविधता अत्यधिक है, जहाँ 2011 की जनगणना के अनुसार एक भाषाई सर्वेक्षण में 19,500 से अधिक मातृभाषाएँ और बोलियों का उल्लेख मिलता है। इनमें 121 मुख्य भाषाएँ और 270 से अधिक प्रमुख मातृभाषाएँ हैं जो बहुसंख्यक द्वारा व्यवहार में प्रयोग हो रही हैं। अन्य बोलियों और मातृभाषा के संदर्भ में कहा जा सकता है कि — ” कोस कोस पर पानी बदले चार कोस पर बानी ” यानि मातृ भाषाएँ ही स्थानीय स्तर पर बोलियों को बृहत आकार देती हैं। यही बोलियाँ क्षेत्रीय स्तर पर विस्तार बनाते हुए भाषा को निर्मित करती हैं। इसलिए किसी भी भाषा के बने रहने और विकास करने में मातृभाषाओं की बड़ी भूमिका होती है। सबसे बड़ी मातृभाषा खड़ी बोली है। हिन्दी भाषी क्षेत्र में यह 41% जनसंख्या द्वारा व्यवहार में लाई जा रही है। भारत में 6 शास्त्रीय भाषाएँ भी हैं। ये उड़िया, तेलुगू, तमिल, कन्नड़, मलयालम और संस्कृत हैं। इसमें संस्कृत को छोड़ कर शेष पाँच भाषाएँ मातृभाषा के रूप में भी प्रयोग की जाती हैं।
प्रो. हंसराज सुमन ने अपने वक्तव्य में बताया कि पहले हमें हिन्दी साहित्य पुस्तकों, समाचार पत्र -पत्रिकाओं में मिलता था मगर अब यह हर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आसानी से उपलब्ध है। डिजिटल साहित्य को पाठकों तक पहुंचाने में तमाम ऐसे रचनाकार है जो अपनी रचनाओं को ब्लॉग, सोशल मीडिया और वेबसाइटों के द्वारा आम पाठकों तक पहुंचा रहे हैं तथा उससे पैसा कमा रहे हैं। उन्होंने बताया कि हिन्दी समय, हंस और गूगल बुक्स जैसी डिजिटल लाइब्रेरी ने हिन्दी साहित्य को पाठक वर्ग तक पहुंचाने में मदद की है। इसी तरह से अनेक ऐसे प्लेटफॉर्म है जहाँ पर हिन्दी साहित्य को सुनने का अवसर प्रदान कर रहे हैं उनमें स्टोरीटेल, कुकू एफएम और ऑडिबल जैसे प्लेटफॉर्म है। उन्होंने बताया कि भारत में साक्षरता दर 71.2% है। इसमें बहुत से लोग बहुभाषी भी हैं। कामकाज का क्षेत्र और स्थान विशेष पर विस्थापन के बावजूद इन लोगों ने अपनी मातृभाषा नहीं छोड़ा है। इनमें बंगाली, तेलुगु, तमिल और मलयाली भाषी लोगों की संख्या अधिक है। कम्प्यूटर के प्रयोग में आने के बाद क्षेत्रीय भाषाओं का शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग बहुत कम हो गया है जिससे इन भाषाओं का व्यवहार क्षेत्र सिमटता गया है। इससे अंग्रेजी भाषा का बहुतायत विकास हुआ है। यहांँ तक की बोलियों में भी अंग्रेजी के शब्दों ने प्रवेश कर लिया है। आधुनिक विकास के दबाव में भी मातृभाषा के बहुत से शब्दों के स्थान पर नये शब्दों का प्रयोग होने लगा है।
प्रो.सुमन ने आगे बताया कि नयी तकनीकी एआई के आने के बाद तो भाषाओं की स्थिति बेहद नाजुक हो जाएगी। व्यवहार में भाषाओं का क्षेत्र सिमटता जाएगा। मातृभाषा का प्रयोग भी सीमित परिवारों तक रह जाएगा। शिक्षित वर्ग बचपन से ही बच्चों को कम्प्यूटर शिक्षा से जोड़ने लगेंगे। अब एआई आने के बाद न तो मातृभाषा का व्यवहार होगा न ही बोलियों का। भाषा व्यवहार भी सिर्फ़ जरूरत भर तक रह जाएगा। एआई का प्रयोग रोजगार के अवसर खत्म कर देगा। मेल-मिलाप और आवागमन कम होने से भाषा विकास बाधित होगा व्यवहार में सिर्फ वही शब्द रह जाएंगे जिनको एआई के लिए प्रयोग किया जाएगा।
प्रो. सुमन ने अपने संबोधन में छात्रों को जानकारी देते हुए बताया कि आज हिन्दी के बहुत से लेखक, आलोचक, कवि और वर्तमान में उभरते युवा कवियों ने सोशल मीडिया पोस्ट, इंस्टाग्राम रिल्स और यूट्यूब वीडियो के माध्यम से अपनी रचनाओं को साझा कर रहे हैं, जिसे देख कर आज की पीढ़ी प्रोत्साहित हो रही है। उन्होंने यह भी बताया कि डिजिटल समाचार पोर्टल ने हिन्दी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने में विशेष योगदान दिया है। आज दैनिक भास्कर, एनडीटीवी हिन्दी, आजतक जैसे डिजिटल समाचार पोर्टल ने हिन्दी पत्रकारिता को एक नई पहचान दी है। यही कारण है कि हिन्दी वेब पोर्टल से समाचार व साहित्य लोगों तक पहुँच रहा है, यह उसकी ताकत को दर्शाता है। प्रो. हंसराज सुमन ने हिन्दी भाषा सम्प्रेषण और संचार माध्यमों की व्याख्या करते हुए कहा कि ओटीटी तथा वेब सीरिज हिन्दी फिल्मों को बढ़ावा दे रही हैं। वेब सीरिज, शॉर्ट फिल्में और वृत्तचित्रों की बढ़ती लोकप्रियता ने हिन्दी कंटेंट को सुदृढ़ किया है। उन्होंने जानकारी दी कि नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, जी 5 और एमएक्स प्लेयर जैसी ओटीटी सेवाओं ने हिन्दी फिल्मों को आगे बढ़ाया है। साथ ही डिजिटल माध्यमों ने हिन्दी भाषा को एक ऐसी ऊर्जा दी है जो न केवल लेखन में बल्कि पढ़ने में भी मदद मिली है। यही कारण है कि हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वैश्विक पहचान मिली है जिससे डिजिटल युग में हिन्दी पहले से कहीं ज्यादा समृद्ध हुई है, आने वाला समय डिजिटल हिन्दी का होगा। कार्यक्रम में बहुत से छात्रों ने डिजिटल माध्यमों के योगदान और उनके प्रयोग के विषय में अपनी जिज्ञासा प्रकट की और सवाल पूछे, प्रो.सुमन ने उसका भी उत्तर देकर छात्रों को संतुष्ट किया।



