उत्तर-प्रदेशनई दिल्लीबड़ी खबरलखनऊ

डॉ. एकता सिंह को “अंतर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन” में शोध पत्र प्रस्तुति के परिपेक्ष्य में विशेष सम्मान

रुड़की। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रुड़की में आयोजित Eighth International Ramayana Conference में डॉ. एकता सिंह द्वारा प्रस्तुत शोध पत्र ने विद्वत् जगत में विशेष सराहना प्राप्त की।

अपने शोध में डॉ. सिंह ने महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण और गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस का तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक (Philological) एवं धर्मवैचारिक (Theological) विश्लेषण प्रस्तुत किया। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य इन दोनों महान ग्रंथों में निहित भाषिक संरचनाओं, कथात्मक रूपरेखाओं तथा दार्शनिक दृष्टिकोणों की तुलना करते हुए यह स्पष्ट करना था कि, किस प्रकार राम का स्वरूप आदर्श मानव से भक्ति परंपरा में सर्वोच्च परम दिव्य सत्ता के रूप में विकसित होता है।
शोध में यह प्रतिपादित किया गया कि, वाल्मीकि की संस्कृत रामायण में राम का स्वरूप मुख्यतः धर्म, आदर्श शासन-व्यवस्था एवं नैतिक मर्यादा के प्रतीक के रूप में उभरता है….जबकि तुलसीदास की अवधी रचना रामचरितमानस में राम को भक्ति आंदोलन के केंद्र में स्थित सर्वोच्च ईश्वर के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। इस प्रकार एक ओर जहाँ वाल्मीकि का ग्रंथ राजधर्म और नैतिक आदर्शों को रेखांकित करता है, वहीं तुलसीदास का ग्रंथ भक्तिपरक समर्पण और “आध्यात्मिक एकत्व” को प्रमुखता देता है।
डॉ. एकता सिंह का यह शोध भारतीय साहित्य और अध्यात्म की दो महान परंपराओं को एक समन्वित दृष्टि से देखने का प्रयास है। उनके अध्ययन के अनुसार, दोनों ग्रंथ परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि भारत की साहित्यिक एवं आध्यात्मिक विरासत के पूरक स्तंभ हैं।
सम्मेलन में देश-विदेश के विद्वानों ने इस शोध की गंभीरता, मौलिकता और अकादमिक दृष्टिकोण की सराहना की। यह उपलब्धि न केवल डॉ. सिंह के शैक्षणिक योगदान को रेखांकित करती है, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विमर्श को भी एक नई दिशा प्रदान करती है।
डॉ. सिंह ने अपने अध्ययन में महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण और गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस का तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक एवं धर्मदर्शनात्मक विश्लेषण किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि किस प्रकार संस्कृत की रामायण में राम एक आदर्श मानव, धर्मनिष्ठ शासक एवं मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में चित्रित होते हैं, जबकि अवधी में रचित रामचरितमानस में राम भक्ति परंपरा के केंद्र में स्थित सर्वोच्च परमेश्वर के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं।
अपने शोध में उन्होंने भाषिक संरचना, कथानक विन्यास, सांस्कृतिक संदर्भ और दार्शनिक दृष्टिकोण का तुलनात्मक परीक्षण करते हुए यह प्रतिपादित किया कि दोनों ग्रंथ भारतीय समाज की विभिन्न ऐतिहासिक अवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। वाल्मीकि की कृति जहाँ राजधर्म, नीति और आदर्श शासन-व्यवस्था पर बल देती है, वहीं तुलसीदास की रचना भक्तिपरक समर्पण और आध्यात्मिक एकत्व को प्रमुखता प्रदान करती है।
सम्मेलन में देश-विदेश के विद्वानों ने इस शोध को भारतीय साहित्य और धर्मदर्शन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान बताया।
डॉ. सिंह को सम्मेलन में “सत्राध्यक्ष” के रूप में भी दायित्व प्रदान किया गया, जो उनके विद्वत्तापूर्ण योगदान का प्रमाण है।
यह उपलब्धि न केवल डॉ. एकता सिंह की “हरेक पटल” पर….”शैक्षणिक उत्कृष्टता” को रेखांकित करती है, बल्कि “भारतीय ज्ञान परंपरा” की वैश्विक प्रतिष्ठा को भी तटस्थ करती है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button