उत्तर-प्रदेशनई दिल्लीबड़ी खबरलखनऊ

दिल्ली पैरालंपिक समिति की अध्यक्ष पारुल सिंह ने दिल्ली वाईडब्ल्यूसीए के राष्ट्रीय महिला दिवस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की

नई दिल्ली : दिल्ली वाईडब्ल्यूसीए ने राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर “अधिकार, प्रतिरोध और सुधार” विषय पर एक प्रभावशाली कार्यक्रम का आयोजन किया। यह कार्यक्रम भारत की प्रसिद्ध कवयित्री, स्वतंत्रता सेनानी और “भारत कोकिला” सरोजिनी नायडू की जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया। आयोजन कॉन्स्टेंटिया हॉल, नई दिल्ली में हुआ। पीएएसआई के सहयोग से हुए इस कार्यक्रम में समाज के विभिन्न वर्गों के लोग शामिल हुए। यहां महिलाओं के अधिकार, जागरूकता और सामाजिक बदलाव पर खुलकर चर्चा और विचार-विमर्श किया गया।

मुख्य अतिथि के रूप में दिल्ली पैरालंपिक समिति (जिसे दिल्ली की दिव्यांग पैरा स्पोर्ट्स एसोसिएशन भी कहा जाता है) की अध्यक्ष श्रीमती पारुल सिंह ने समावेशिता और दृढ़ता के महत्व पर प्रकाश डाला। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि सभी महिलाओं, खासकर दिव्यांग महिलाओं के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने में सुधारों की भूमिका बहुत अहम है। उन्होंने कहा, “सच्चा सशक्तिकरण तब शुरू होता है जब हम केवल बातों से नहीं, बल्कि ठोस और समावेशी नीतियों के जरिए बाधाओं को तोड़ते हैं और असमानता के खिलाफ मजबूती से खड़े होते हैं। सरोजिनी नायडू की विरासत को सम्मान देते हुए हमें ऐसे सुधारों के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए जो हर महिला को आगे बढ़ाएं और अधिकार व न्याय की राह में किसी को पीछे न छोड़ें।”

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण एक विचारोत्तेजक पैनल चर्चा रही। इसमें डॉ. दिव्या तंवर, सुश्री निर्मला और एडवोकेट सुश्री नेहा सलूजा जैसे विशेषज्ञ शामिल थे। पैनल में लिंग समानता से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों, व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों के खिलाफ संघर्ष और प्रभावी सुधारों के रास्तों पर गंभीर चर्चा हुई। इस बातचीत ने उपस्थित लोगों को सोचने और खुलकर अपनी बात रखने का अवसर दिया।

महिलाओं के स्वास्थ्य और शिक्षा की समर्थक डॉ. दिव्या तंवर ने कहा, “अधिकार किसी को दिए नहीं जाते, उन्हें सामूहिक संघर्ष से हासिल किया जाता है। इस राष्ट्रीय महिला दिवस पर हमें हाशिए पर खड़ी महिलाओं की आवाज को और मजबूत बनाना चाहिए, ताकि विचार से आगे बढ़कर ठोस बदलाव लाया जा सके और एक बेहतर समाज का निर्माण हो।”

समाज सेवा में सक्रिय सुश्री निर्मला ने कहा, “संघर्ष ही सुधार की शुरुआत है। सरोजिनी नायडू के काव्यात्मक विद्रोह से लेकर आज के जमीनी आंदोलनों तक, महिलाओं ने हमेशा नेतृत्व किया है। हमें इसी भावना के साथ ऐसे समाज का निर्माण करना चाहिए जहां हर महिला के अधिकार सुरक्षित और मजबूत हों।”

लिंग न्याय की विशेषज्ञ एडवोकेट सुश्री नेहा सलूजा ने कहा, “कानूनी सुधार स्थायी बदलाव की नींव हैं, लेकिन वे तभी सफल होते हैं जब समाज भी पुरानी सोच और रूढ़ियों के खिलाफ खड़ा हो। यह कार्यक्रम हमें याद दिलाता है कि महिलाओं के अधिकार ही मानवाधिकार हैं—जिन्हें संघर्ष से हासिल किया जाता है और पूरी दृढ़ता से सुरक्षित रखा जाता है।”

चर्चा के साथ-साथ कार्यक्रम में महिलाओं के इतिहास और वर्तमान मुद्दों पर आधारित एक रोचक क्विज प्रतियोगिता भी आयोजित की गई। इसके अलावा एक प्रभावशाली नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत किया गया, जिसमें सशक्तिकरण, संघर्ष और सफलता की कहानियों को जीवंत रूप से दिखाया गया। ये सभी गतिविधियां न केवल जानकारी बढ़ाने वाली रहीं, बल्कि लोगों को सामाजिक बदलाव के लिए सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित भी करती रहीं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button