समापन दिवस की पूर्व संध्या पर नाटक “धरती आबा – बिरसा मुंडा” की गूंज

लखनऊ । जनजाति भागीदारी उत्सव – 2025 आज अपने भव्य समापन की ओर बढ़ रहा है। समापन से पूर्व आयोजित पाँचवे दिन सोमवार 17 नवम्बर की सांस्कृतिक संध्या में नाटक धरती आबा – बिरसा मुंडा का प्रदर्शन किया गया वहीं विभिन्न जनजातीय प्रस्तुतियों ने आगंतुकों की प्रशंसा हासिल की।
नाटक उत्तर प्रदेश लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान, लखनऊ के सौजन्य से रंगयात्रा संस्था द्वारा मंचित किया गया था। डॉ. करुणा पांडेय के मार्गदर्शन, चित्रा मोहन द्वारा लिखित और ज्ञानेश्वर मिश्र ‘ज्ञानी’ द्वारा निर्देशित इस प्रस्तुति ने बिरसा मुंडा के संघर्षमय जीवन, जातीय अस्मिता, उलगुलान और बलिदान को प्रस्तुत किया। नाटक में आर्थिक संघर्ष, क्रिश्चियन धर्म अपनाने और पुनः अपनी संस्कृति की ओर दृढ़तापूर्वक लौटने का निर्णय, ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह, मुखबिरी, गिरफ्तारी और जेल में संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मृत्यु को अत्यंत मार्मिक दृश्यों के साथ दर्शाया गया। इसमें संदीप देव, मुकुल चौहान, प्रियंका भारती, अंशिका सक्सेना, निरुपमा राहुल, ज्योति सिंह, विनीता सिंह, काजल सिंह, विशाल श्रीवास्तव, कोमल प्रजापति, राम कुमार, अनिल कुमार, मधु प्रकाश श्रीवास्तव और अज़हर सिद्दीकी ने अभियान किया। दूसरी ओर तमाल बोस ने प्रकाश परिकल्पना, आदित्य शर्मा ने संगीत परिकल्पना, चयन सिंह सावरे ने ढोलक वादन एवं गायन, रीमा सक्सेना और नीमा गुप्ता ने वेशभूषा परिकल्पना, राज किशोर गुप्ता ने मुख सज्जा का दायित्व निभाया।
जनजातीय नृत्यों और लोक कलाओं की मनमोहक छटा*
चित्रकूट की बूटीबाई एवं दल की चंगेलिया गायन-नृत्य प्रस्तुति से संध्या का आरंभ हुआ। “सुवा सुसररिया” जैसे गीतों ने लोकरंग की छटा बिखेरी। बहराइच की राजकुमारी एवं दल ने हूरदूंगवा नृत्य प्रस्तुत किया, जबकि पश्चिम बंगाल के अबू सालेह एवं दल का रायबेंसे नृत्य अपनी वीरता और तालबद्धता के कारण सराहा गया। गाजीपुर से विनोद कुमार मरावी के नेतृत्व में प्रस्तुत गोंडी नृत्य में तीज-त्योहारों, देवी-देवताओं की स्तुति और सामूहिक उत्सव की संस्कृति को जीवंत किया गया। मध्य प्रदेश के लाल सिंह मकाम की बैगा परधौनी, उत्तराखंड के प्रेम हिंदुआन की पौड़ा नृत्य प्रस्तुति और राजस्थान के सुगना राम का रावणहत्था वादन शाम की खूबसूरती में और इजाफा करते गए। अरुणाचल प्रदेश से ओदलों नृत्य और शेरदुकपेन नृत्य की प्रस्तुतियों ने युद्ध-जीत, स्वास्थ्य, समृद्धि और शुभता के पारंपरिक संदेशों को मंच पर साकार किया। पश्चिम बंगाल के अनुत्तम दास एवं दल ने बाउल गायन से श्रोताओं को आत्मिक शांति का अनुभव कराया।
हस्तशिल्प प्रदर्शनी का आकर्षण
उत्सव परिसर में लगे शिल्प मेले में पश्चिम बंगाल का कांथा वर्क, वाराणसी का जनजातीय हस्तशिल्प, बैतूल के आदिवासी आभूषण, हैदराबाद की जूलरी और लखीमपुर की जलकुंभी से बनी दरी विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं।



