उत्तर-प्रदेशनई दिल्लीबड़ी खबरलखनऊ

विश्व खाद्य दिवस पर भूखमुक्त भारत का सपना : डॉ. फूडमैन विशाल सिंह की 20 साल की सेवा

भूख केवल पेट की तृष्णा नहीं, यह मानवता की सबसे बड़ी परीक्षा है। डॉ. फूडमैन विशाल सिंह, जिन्हें लोग प्यार से “फूडमैन” कहते हैं, पिछले 20 वर्षों से इस परीक्षा को चुनौती दे रहे हैं। साल 2009 से लेकर आज तक, वे प्रतिदिन 1000 से अधिक जरूरतमंदों को निःशुल्क पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराते हैं। अस्पतालों के बाहर, सड़कों के किनारे, झुग्गियों और वृद्धाश्रमों में उनकी टीम “भोजन सेवा परिवार” के रूप में हर दिन मानवता की मिसाल पेश करती है। डॉ. सिंह कहते हैं “भोजन केवल रोटी नहीं, यह मानवता का प्रसाद है। इसे बांटना सेवा है, और सेवा से बड़ा धर्म कोई नहीं।” सेवा से साधना तक का मार्ग छोटे प्रयास से शुरू हुआ यह मिशन आज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आंदोलन बन चुका है। हजारों स्वयंसेवक, स्थानीय परिवार, माता-पिता और बच्चे इस सेवा में जुड़कर भूख मुक्त समाज का हिस्सा बन रहे हैं। डॉ. सिंह का यह मानना है कि “एक मुट्ठी अन्न किसी की ज़िंदगी बदल सकती है। संवेदनशीलता और सेवा का संकल्प ही इसे संभव बनाता है।” बैंकॉक सम्मेलन: हंगर फ्री वर्ल्ड का वैश्विक मंच हाल ही में थाईलैंड के बैंकॉक में आयोजित “हंगर फ्री वर्ल्ड” सम्मेलन में डॉ. विशाल सिंह को वैश्विक अध्यक्ष घोषित किया गया। उन्होंने मंच से स्पष्ट किया “हर घर से एक मुट्ठी अन्न निकले, और कोई भूखा न सोए।” इस संदेश को न केवल एशियाई देशों ने सराहा, बल्कि यूरोप और अफ्रीका के प्रतिनिधियों ने भी इसे अपने देशों में लागू करने की इच्छा जताई। प्रधानमंत्री से मुलाकात और राष्ट्रीय समर्थन बैंकॉक से लौटने के बाद डॉ. सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से मुलाकात कर भूखमुक्त भारत मिशन की रूपरेखा साझा की। प्रधानमंत्री ने उनकी पहल को सराहा और कहा “यह अभियान भारत की अन्नदान महादान परंपरा को वैश्विक स्तर पर जीवंत कर रहा है।” इस मुलाकात ने भारत सरकार को प्रेरित किया कि ग्रामीण स्तर पर धात्री महिलाओं और सामुदायिक किचन के माध्यम से पौष्टिक भोजन वितरण सुनिश्चित किया जाए। विश्व खाद्य दिवस (16 अक्टूबर) का संदेश 16 अक्टूबर, विश्व खाद्य दिवस पर डॉ. विशाल सिंह का संदेश साफ़ और प्रेरक है “भोजन देना केवल दान नहीं, यह साधना है। एक भूखा पेट भरता है, तो उसकी मुस्कान ही मानवता का असली आशीर्वाद बन जाती है।” वे मानते हैं कि सेवा परमो धर्म है, और भोजन सेवा ही सच्ची साधना। राष्ट्रीय चुनौतियाँ और डॉ. विशाल सिंह का दृष्टिकोण हालांकि भारत में POSHAN अभियान, PMGKAY, ICDS और मिड-डे मील जैसी नीतियाँ लागू हैं, देश अभी भी बाल स्टंटिंग (≈32%), वेस्टिंग (≈18–19%) और पोषणहीनता जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। डॉ. सिंह का मानना है कि — > “नीति और संवेदना का मेल जरूरी है। केवल योजना बनाना पर्याप्त नहीं, जमीन पर असर दिखना चाहिए। यह तभी संभव है जब समुदाय, स्वयंसेवक और सरकारी ढांचा साथ काम करें।” उनकी पहल यह दिखाती है कि छोटे-छोटे कदम सामुदायिक किचन, स्कूल पोषण, महिला प्रशिक्षण — जब जोड़कर लागू किए जाएं, तो राष्ट्रीय स्तर पर भूख और पोषण की स्थिति में सुधार संभव है। अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय प्रभाव बैंकॉक हंगर फ्री वर्ल्ड सम्मेलन: वैश्विक अध्यक्ष बनाकर दुनिया को संदेश दिया कि हर देश की भागीदारी से भूख मिट सकती है। स्थानीय पहल: लखनऊ में अस्पतालों के बाहर, झुग्गियों में और वृद्धाश्रमों में प्रतिदिन 1000+ लोगों को भोजन। सरकारी सहयोग: PMGKAY, POSHAN और आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से पौष्टिक भोजन वितरण। डॉ. विशाल सिंह कहते हैं “भूखमुक्त समाज केवल योजना से नहीं, संवेदनशीलता, सेवा और सामुदायिक सहभागिता से बनता है।” निष्कर्ष: भूखमुक्त विश्व की दिशा डॉ. विशाल सिंह का 20 साल का संघर्ष यह संदेश देता है कि “जब मानवता के लिए दिल में जगह हो, तो हर घर से निकली मुट्ठी अन्न की ताकत पूरे विश्व को भूखमुक्त बना सकती है।” विश्व खाद्य दिवस 16 अक्टूबर पर यही संदेश हमें याद दिलाता है कि मानवता का सबसे बड़ा धर्म सेवा और साझा भोजन है। उनकी सोच और कर्म हमें यह प्रेरणा देता है कि सेवा से ही साधना और साधना से ही मानवता का उद्धार संभव है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button