आसफुद्दौला की एक और निशानी बिबियापुर कोठी
लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतें सिरीज (7)

के. सरन
आसफुद्दौला फैजाबाद से अवध की राजधानी लखनऊ आए तो उन्होने लखनऊ में अपना महल बनाने के साथ बाग बगीचे भी बनवाए और मोहल्ले बसाना शुरू कर दिया । बहुत सी इमारतों के साथ उन्होने गोमती के दाहिने किनारे अंग्रेजी शैली की एक महलनुमा कोठी भी बनवाई । यह कोठी लखनऊ के दक्षिण पूर्व कोने पर एक निहायत बियाबान इलाके में बनवाई जो अपनी शान और दास्तान के लिए बहुत मशहूर थी।यह कोठी नुमा महल बिबियापुर कोठी के नाम से जानी जाती थी।
लखनऊ में एकान्त में यह कोठी दरअसल अंग्रेज आला अफ्सरों और ब्रिटिश सरकार की आला हस्तियों की आव -भगत के लिए बनवाई गई धी।

जब यह कोठी बन रही थी तब क्लाड मार्टिन लखनऊ आ चुके थे और नवाब आसफुद्दौला से उनकी दोस्ती हो चुकी थी।मार्टिन इमारतों के निर्माण में अभूतपूर्व विशाल ज्ञान रखते थे लिहाजा उनकी राय भी आसफुद्दौला लेते रहते थे। एकान्त मे बनवाई जा रही इस कोठी के निर्माण के समय,फ्रांस के मूल निवासी मार्टिन ने,आसफुद्दौला को सलाह दी की इसको फ्रांसीसी लुक दिया जाय ।फिर क्या था इस बड़ी इमारत में बड़े बड़े हाल बनवाए गए और इनमें फ्रांस से मंगवाए गए खूबसूरत आसमानी टाइल्स लगवाए गए। इनमें गर्मियो के लिए हवादार खिड़कियां, बरसात के मौसम में बारिश का मजा लेने के लिए खुले बारजे (बालकनी) और जाड़े में ठिठुरन से बचने के लिए लकड़ी जलाने वाले अलावदान बनवाए गए।
योगेश प्रवीन जी के अनुसार– “बिबियापुर कोठी में इसके एक सिरे पर लगाई गई लकडी की सर्पाकार घुमाव दार खासी चौड़ाई की सीढ़ियां उत्तर भारत में अपने ढंग की सबसे पुरानी सीढ़ियां हैं। गोल मीनारनुमा जीने में बीचो-बीच खड़ा एक बड़ा भारी काष्ठ -स्तम्भ है,जिसके चारों तरफ डैनों जैसी लकड़ी की सीढियां हैं। शहर के एकदम बाहर एक बियाबान जंगल के कोने में, गोमती के कछार में बनी, इस कोठी का नवाबों ने शिकारगाह के रूप में खूब इस्तेमाल किया और इसकी अहमियत तब और बढ़ गई जब आसफुद्दौला के न रहने पर उनके पुत्र वजीर अली के नवाब बनने के चार महिने के अन्दर ही, अंग्रेजों की इच्छा के विरूद्ध किये जा रहे कामों के कारण उनको गद्दी से उतार दिया और गिरफ्तार कर लिया । इस घटना के बाद आसफुद्दौला के सौतेले भाई सआदत अली खान को असली वारिस बताकर ,इसी बिबियापुर कोठी में दरबार लगाकर,सआदत अली को अवध का नवाब घोषित कर दिया और उन्हें आठ घोड़े की बग्घी पर बैठाकर नवाब सआदत अली खां को लखनऊ के शाही महल तक एक शानदार जुलूस के साथ लाया गया था।
आजादी के बाद इस कोठी की उचित देखभाल के अभाव में यह शानदार बिबियापुर महल धीरे-धीरे गिरता गया।करीब पचास साल पहले यहां मिलिट्री डेरी फार्म खोला गया यह फार्म लखनऊ के अहिमामऊ और मलेसे मऊ के पास बाहर तक सैकड़ों एकड़ जमीन के बहुत बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है। लखनऊ विकास प्राधिकरण अब इसका भू स्वरूप बदल कर इसे व्यापारिक और रिहाइशी क्षेत्र में बदलने की योजना बना रहा है।


