किसी भी राष्ट्र की सफलता उसकी भाषा नीति पर निर्भर करती है : डॉ. आशीष कन्धवे
मैत्रेयी महाविद्यालय,दिल्ली विश्वविद्यालय में राजभाषा प्रशिक्षण कार्यक्रम सम्पन्न

नई दिल्ली : संयुक्त राजभाषा प्रकोष्ठ एवं आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन समिति के संयुक्त तत्वावधान में 20 अप्रैल 2023 को मैत्रेयी महाविद्यालय,दिल्ली विश्वविद्यालय में महाविद्यालय के प्राध्यापकों के लिए राजभाषा प्रशिक्षण कार्यक्रम संपन्न हुआ। इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में मुख्य अतिथि व वक्ता डॉ. आशीष कन्धवे थे.कार्यशाला का विषय: राजभाषा हिंदी का कार्यान्वयन था ।

कार्यक्रम में मंच पर प्रो.हरीतिमा चोपड़ा, प्राचार्य, मैत्रेयी महाविद्यालय तथा राजभाषा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष प्रोफेसर प्रदीप राय भी उपस्थित थे।कार्यक्रम का उद्घाटन दीप प्रज्वलन से हुआ। उसके पश्चात इसी महाविद्यालय के सहायक आचार्य सुश्री कोमल ने अपनी सुमधुर वाणी में गणपति वंदना प्रस्तुत करके सबके मन को मोह लिया।

कार्यक्रम का संचालन डॉ पुष्पा गुप्ता ने किया.कार्यक्रम के संयोजन का दायित्व डॉ स्नेहलता तथा डॉक्टर मीनू कुमारी ने निर्वहन किया । कार्यक्रम में बीज वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए प्रोफेसर हरीतिमा चोपड़ा ने कहा कि हिंदी भाषा का वर्चस्व भारत ही नहीं अपितु विश्व भर में बढ़ता जा रहा है। हिंदी सिर्फ राजकाज की भाषा ही नहीं है बल्कि भारत के चिंतन की भाषा है संस्कृति की भाषा है और समावेशी विकास की भाषा। इसलिए यह अनिवार्य हो जाता है कि शिक्षकों को भाषा के दायित्व से परिचित कराया जाए। हिंदी की स्थिति मजबूत हुई है इसमें कोई दो मत नहीं है परंतु राजभाषा के रूप में हिंदी कार्यान्वयन को कैसे सुगम और सरल बनाया जाए इस बात की चर्चा आज के मुख्य वक्ता के द्वारा की जाएगी।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ. आशीष कन्धवे ने
कहा कि किसी भी राष्ट्र की सफलता उसकी भाषा नीति पर निर्भर करती है। भाषा ही वह कुंजी है जो किसी राष्ट्र को विकासशील से विकसित और आत्मनिर्भरता के मार्ग पर ले जाती है। आज का विषय राजभाषा हिंदी का कार्यान्वयन कैसे हो क्या चुनौतियां हैं और उसके समाधान क्या है इस पर विस्तार से चर्चा करने से पहले हमें भाषा की संवैधानिक स्थिति को भी समझना होगा।

उन्होंने बताया कि संविधान की धारा 120 के अनुसार संसद का कार्य हिन्दी में या अंग्रेजी में किया जाता है। परन्तु यथास्थिति लोकसभा का अध्यक्ष या राज्यसभा का सभापति किसी सदस्य को “उसकी मातृभाषा में सदन को सम्बोधित करने की अनुमति दे सकता है। संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबन्ध न करे तो 15 वर्ष की अवधि के पश्चात् “या अंग्रेजी में” शब्दों का लोप किया जा सकेगा ।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के अनुसार देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी संघ की राजभाषा घोषित की गई है। परन्तु संविधान के अनुच्छेद 343 (2) में 15 वर्ष की अवधि तक अर्थात् 26 जनवरी, 1965 तक सरकारी काम-काज में अंग्रेजी के प्रयोग को जारी रखने की व्यवस्था भी की गई। इस बात को ध्यान में रखकर तत्कालीन गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कहा था कि यह कदम हमारे लिए आत्मघाती से दो सकता है और उस समय संसद में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने भी कल कल करने की हमारी आदत कहीं हिंदी को अनंत काल के लिए हमसे दूर न कर दे की चिंता से देश को अवगत कराया था।

संविधान में यह भी प्रावधान किया गया कि राष्ट्रपति इस अवधि के दौरान भी निर्दिष्ट कार्यों के लिए आदेश निकालकर अंग्रेजी के अतिरिक्त हिन्दी का प्रयोग करने की अनुमति दे सकते हैं। इस सम्बन्ध में संविधान के अनुच्छेद 343 (3) के अनुसार संसद को भी यह शक्ति प्रदान की गई है कि वह अधि-नियम पारित करके 26 जनवरी, 1965 के बाद भी सरकारी काम-काज में अंग्रेजी का प्रयोग जारी रख सकती है।

उन्होंने जानकारी दी कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 344 में यह उल्लिखित है कि संविधान के प्रारम्भ होने के पाँच वर्ष बाद और फिर उसके दस वर्ष बाद राष्ट्रपति एक आयोग बनाएँगे। यह आयोग अन्य बातों के साथ-साथ संघ के सरकारी काम-काज में हिन्दी भाषा के उत्तरोत्तर प्रयोग के बारे में संघ के राजकीय प्रयोजनों में से सब या किसी एक के लिए अंग्रेजी भाषा के प्रयोग पर रोक लगाए जाने के बारे में राष्ट्रपति को सिफारिश करेगा। आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के लिए इस अनुच्छेद के खण्ड (4) के अनुसार 30 संसद सदस्यों की एक संसदीय समिति के गठन की भी व्यवस्था की गई थी। राजभाषा अधिनियम के अंतर्गत अनेक धाराओं पर चर्चा हुई तथा राजभाषा के कार्यान्वयन के संबंध में आने वाली चुनौतियां और परेशानियों पर भी गंभीर चर्चा हुई ।
इस कार्यशाला में महाविद्यालय के डेढ़ सौ से अधिक शिक्षक उपस्थित थे। इस कार्यक्रम के धन्यवाद ज्ञापन डॉक्टर मीनू कुमारी ने किया।1965



