कला केवल सृजन नहीं, संभावनाओं से भरा व्यापक कैरियर क्षेत्र भी है : प्रो. आलोक कुमार कुशवाहा

लखनऊ : प्रदेश की राजधानी में 115 वर्ष पुराने कला एवं शिल्प महाविद्यालय, लखनऊ के हलदार हाल सभागार में कला विद्यार्थियों के लिए कला, कलाकार का जीवन और ललित कला के क्षेत्र में कैरियर की व्यापक संभावनाओं को केंद्र में रखते हुए विशेष वीडियो प्रस्तुति एवं संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को कला शिक्षा के साथ-साथ कला के बदलते स्वरूप, रोजगार एवं व्यावसायिक अवसरों तथा एक स्वतंत्र कलाकार के रूप में अपनी पहचान विकसित करने की संभावनाओं से परिचित कराना था।
कार्यक्रम में महाविद्यालय के इंचार्ज प्रिंसिपल एवं कलाकार प्रो. आलोक कुमार कुशवाहा ने अपनी कला-यात्रा पर आधारित विस्तृत साक्षात्कार की वीडियो प्रस्तुति के माध्यम से विद्यार्थियों से संवाद किया। इस अवसर पर कला महाविद्यालय के शिक्षक अतुल हुंडु, कला समीक्षक एवं कलाकार भूपेंद्र कुमार अस्थाना, खुर्शीद ज़ैहरा, विभावरी सिंह, अजय कुमार, संजय राज, संध्या यादव, रीना गौतम एवं रविकान्त पाण्डेय सहित बड़ी संख्या में कला विद्यार्थी उपस्थित रहे।
वीडियो प्रस्तुति के माध्यम से विद्यार्थियों को यह समझने का अवसर मिला कि कला केवल कक्षा, पाठ्यक्रम, परीक्षा अथवा तकनीकी दक्षता तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि यह जीवन, विचार, संवेदना, समाज और व्यक्ति की दृष्टि को अभिव्यक्त करने वाली व्यापक रचनात्मक प्रक्रिया है। प्रो. कुशवाहा की कला-यात्रा के अनुभवों के माध्यम से विद्यार्थियों को यह भी समझने का अवसर मिला कि कलाकार की पहचान निरंतर अभ्यास, स्वतंत्र सोच, प्रयोग और अपने आसपास की दुनिया के गहन अवलोकन से विकसित होती है।
कार्यक्रम में कला के क्षेत्र में उपलब्ध विविध संभावनाओं पर विशेष चर्चा हुई। विद्यार्थियों को बताया गया कि आज ललित कला का क्षेत्र केवल चित्रकला, मूर्तिकला और प्रिंटमेकिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इलस्ट्रेशन, ग्राफिक डिजाइन, एनीमेशन, डिजिटल आर्ट, कॉन्सेप्चुअल आर्ट, आर्ट क्यूरेशन, कला लेखन एवं समीक्षा, कला पत्रकारिता, कला शिक्षा, संग्रहालय एवं गैलरी प्रबंधन, कला संरक्षण एवं दस्तावेजीकरण, आर्ट कंसल्टेंसी, पब्लिक आर्ट, सेट एवं प्रदर्शनी डिजाइन तथा विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म तक इसका व्यापक विस्तार हो चुका है। इसके साथ ही कलाकार अपनी स्वतंत्र कला-प्रैक्टिस, प्रदर्शनियों, कला परियोजनाओं, कार्यशालाओं और संस्थागत अवसरों के माध्यम से भी अपना व्यावसायिक क्षेत्र विकसित कर सकते हैं।
प्रस्तुति में कलाकार की व्यक्तिगत दृष्टि और मौलिकता, गहन अवलोकन, निरंतर अभ्यास, प्रयोगशीलता, असफलताओं से सीखने, अपनी विशिष्ट दृश्य भाषा विकसित करने तथा जीवन और समाज के अनुभवों को कला से जोड़ने पर विशेष बल दिया गया। विद्यार्थियों को यह भी बताया गया कि एक समकालीन कलाकार के लिए सृजन के साथ अपने कार्य का पोर्टफोलियो तैयार करना, कलाकृतियों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण, प्रदर्शनियों में सहभागिता, नेटवर्किंग, आर्टवर्क की प्रभावी प्रस्तुति एवं मूल्य निर्धारण तथा डिजिटल माध्यमों का रचनात्मक उपयोग भी महत्वपूर्ण है।
प्रो. आलोक कुमार कुशवाहा ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि कलाकार बनने की यात्रा किसी एक डिग्री या पाठ्यक्रम के पूरा होने के साथ समाप्त नहीं होती, बल्कि वास्तविक कलात्मक विकास उसके बाद शुरू होता है। विद्यार्थियों को कला के प्रति गंभीरता, स्वतंत्र चिंतन, निरंतर अभ्यास और प्रयोगशीलता के साथ अपने आसपास के जीवन और समाज को देखने-समझने की आदत विकसित करनी चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों को अपनी रुचि और क्षमता के अनुरूप कला के विभिन्न क्षेत्रों को समझने तथा अपनी विशिष्ट पहचान बनाने के लिए प्रेरित किया।
इस अवसर पर विद्यार्थियों ने ललित कला में कैरियर, उच्च शिक्षा, स्वतंत्र कला-प्रैक्टिस, प्रदर्शनियों, कला संस्थानों, डिजिटल माध्यमों, व्यावसायिक अवसरों तथा कलाकार के विकास से संबंधित अनेक प्रश्न पूछे। प्रो. कुशवाहा ने विद्यार्थियों के प्रश्नों का विस्तारपूर्वक उत्तर देते हुए कला के क्षेत्र में उपलब्ध संभावनाओं और उनके लिए आवश्यक तैयारी पर जानकारी साझा की। कार्यक्रम ने विद्यार्थियों के सामने कला को केवल एक अकादमिक विषय के बजाय रचनात्मकता, आत्म-अभिव्यक्ति, शोध, संस्कृति, समाज और व्यावसायिक विकास से जुड़े एक व्यापक क्षेत्र के रूप में देखने की नई दृष्टि प्रस्तुत की। संवाद के दौरान विद्यार्थियों और शिक्षकों के बीच कला की बदलती भूमिका तथा भविष्य की संभावनाओं पर सार्थक विचार-विमर्श हुआ।
यह कार्यक्रम कला विद्यार्थियों के लिए न केवल प्रेरणादायक रहा, बल्कि उन्हें अपनी कलात्मक पहचान, रचनात्मक दृष्टि और भविष्य की व्यावसायिक दिशा को लेकर अधिक गंभीरता से सोचने का महत्वपूर्ण अवसर भी प्रदान करता है।



