बजट भाषण और बजट, आर्थिक रणनीति और आर्थिक राजनेतृत्व की कसौटी पर खरे नहीं उतरते : पी. चिदंबरम

नई दिल्ली : पी. चिदंबरम, सांसद व पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री ने केंद्रीय बजट पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है कि हर बजट-पूर्व टिप्पणीकार और लेखक तथा अर्थशास्त्र का हर छात्र संसद में वित्त मंत्री के भाषण में जो कुछ उसने सुना, उससे अवश्य ही स्तब्ध रह गया होगा।
चिदंबरम ने कहा कि मैं मानता हूँ कि बजट केवल वार्षिक राजस्व और व्यय का बयान भर नहीं होता। मौजूदा परिस्थितियों में बजट भाषण को उन प्रमुख चुनौतियों पर एक स्पष्ट दृष्टिकोण पेश करना चाहिए, जिनका ज़िक्र कुछ दिन पहले जारी किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में किया गया था। मुझे संदेह है कि सरकार और वित्त मंत्री ने आर्थिक सर्वेक्षण पढ़ा भी है या नहीं। अगर उन्होंने पढ़ा है, तो ऐसा लगता है कि उन्होंने उसे पूरी तरह से दरकिनार करने का फैसला कर लिया है और अपने पसंदीदा शौक पर लौट आए हैं-लोगों पर शब्दों की बौछार करना, आमतौर पर अक्रोनिम्स के ज़रिये।
मैं कम से कम 10 ऐसी चुनौतियाँ गिना सकता हूँ, जिन्हें आर्थिक सर्वेक्षण और कई जानकार विशेषज्ञों ने चिन्हित किया है-
1. संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा लगाए गए दंडात्मक टैरिफ, जिन्होंने निर्माताओं, विशेष रूप से निर्यातकों, के लिए दबाव पैदा किया है;
2. लंबे समय से चले आ रहे व्यापारिक संघर्ष, जो निवेश पर बोझ डालेंगे।
3. बढ़ता हुआ व्यापार घाटा, विशेष रूप से चीन के साथ;
4. सकल स्थिर पूंजी निर्माण (लगभग 30 प्रतिशत) का कम स्तर और निजी क्षेत्र की निवेश करने में हिचकिचाहट;
5. भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के प्रवाह को लेकर अनिश्चित दृष्टिकोण और पिछले कई महीनों से विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) का लगातार बाहर जाना;
6. राजकोषीय समेकन (fiscal consolidation) की बेहद धीमी गति और FRBM के विपरीत लगातार ऊँचा राजकोषीय घाटा और राजस्व घाटा;
7. आधिकारिक रूप से घोषित मुद्रास्फीति के आँकड़ों और घरेलू खर्च, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन के वास्तविक बिलों के बीच लगातार बना रहने वाला अंतर;
8. लाखों MSMEs का बंद होना और बचे हुए MSMEs का अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष;
9. रोज़गार की अस्थिर स्थिति, विशेष रूप से युवाओं में बेरोज़गारी;
10. बढ़ता शहरीकरण और शहरी क्षेत्रों (नगरपालिकाओं और नगर निगमों) में बिगड़ता बुनियादी ढांचा।
इनमें से किसी भी मुद्दे को वित्त मंत्री के भाषण में संबोधित नहीं किया गया। इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं था कि तालियाँ औपचारिक-सी थीं और अधिकांश श्रोता बहुत जल्दी ध्यान हटाकर अलग हो गए। यहाँ तक कि संसद टीवी द्वारा किया गया प्रसारण भी कुछ बार बंद हो गया!
एक अकाउंटेंट के मानकों से भी देखें तो 2025-26 में वित्त प्रबंधन का यह एक बेहद खराब लेखा-जोखा था। राजस्व प्राप्तियाँ 78,086 करोड़ रुपये कम रहीं, कुल व्यय 1,00,503 करोड़ रुपये कम रहा। राजस्व व्यय 75,168 करोड़ रुपये कम रहा और पूंजीगत व्यय में 1,44,376 करोड़ रुपये की कटौती की गई (केंद्र 25,335 करोड़ रुपये और राज्य 1,19,041 करोड़ रुपये)। इस दयनीय प्रदर्शन की व्याख्या करने के लिए एक शब्द तक नहीं कहा गया। वास्तव में, केंद्र का पूंजीगत व्यय 2024-25 में GDP के 3.2 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में 3.1 प्रतिशत रह गया है।
राजस्व व्यय में की गई कटौतियाँ उन मदों में पड़ी हैं जो आम लोगों से संबंधित हैं। उदाहरण:
ग्रामीण विकास: Rs 53,067 करोड़
शहरी विकास: Rs 39,573
सामाजिक कल्याण: Rs 9,999
कृषि: Rs 6,985
शिक्षा: Rs 6,701
स्वास्थ्य: Rs 3,686
महत्वपूर्ण सेक्टर्स और कार्यक्रमों में धनराशि में कटौती की गई है। बहुप्रचारित जल जीवन मिशन पर किया गया व्यय निर्दयतापूर्वक 67,000 करोड़ रुपये से घटाकर मात्र 17,000 करोड़ रुपये कर दिया गया। (2026-27 में इसे बढ़ाकर 67,670 करोड़ रुपये किया गया है, लेकिन इस आँकड़े की क्या विश्वसनीयता है?)
कई महीनों तक चले अभ्यास के बाद, राजकोषीय घाटे (FD) का संशोधित अनुमान (RE) बजट अनुमान (BE) के अनुरूप 4.4 प्रतिशत पर ही टिका रहा है, और 2026-27 के लिए यह अनुमान है कि FD GDP के मात्र 0.1 प्रतिशत तक ही घटेगा। राजस्व घाटा 1.5 प्रतिशत पर स्थिर रहेगा। यह निश्चित रूप से वित्तीय अनुशासन और समेकन की दिशा में कोई साहसिक अभ्यास नहीं है।
बजट भाषण की सबसे गंभीर आलोचना यह है कि वित्त मंत्री योजनाओं, कार्यक्रमों, मिशनों, संस्थानों, इनिशिएटिव, फंडों, समितियों, हब्स आदि की संख्या बढ़ाते जाने से थकते नहीं हैं। मैंने कम से कम 24 की गिनती की है। मैं आपकी कल्पना पर छोड़ता हूँ कि इनमें से कितने अगले साल तक भुला दिए जाएंगे और गायब हो जाएंगे।
अंत में, भाषण के भाग बी पर। आयकर अधिनियम, 2026 के पारित होने के महीनों बाद-जो 1 अप्रैल, 2026 से लागू होगा-वित्त मंत्री ने कुछ दरों में छेड़छाड़ की है। यद्यपि अनेक छोटे-छोटे परिवर्तनों के प्रभाव की सावधानीपूर्वक जाँच की जानी होगी, यह याद रखना चाहिए कि लोगों के विशाल बहुमत का आयकर या आयकर दरों से कोई सरोकार नहीं है। जहाँ तक अप्रत्यक्ष करों का संबंध है, औसत व्यक्ति केवल भाषण के अनुच्छेद 159, 160 और 161 से ही चिंतित होगा। मैं इन छोटी रियायतों का स्वागत करता हूँ।
हमारा निष्कर्ष यह है कि बजट भाषण और बजट, आर्थिक रणनीति और आर्थिक राजनेतृत्व (economic statesmanship) की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।



