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तहज़ीब के शहर में अमन का संगम, छोटा इमामबाड़ा से उठी भाईचारे की बुलंद आवाज़

एक मंच पर जुटे देश के सभी प्रमुख धर्मगुरु

लखनऊ। शहर-ए-अदब की तारीख में 1 फ़रवरी 2026 की तारीख महज़ एक दिन बनकर नहीं, बल्कि भाईचारे की एक नई इबारत बनकर दर्ज हो गई। जब लखनऊ के ऐतिहासिक छोटा इमामबाड़ा की शाही दीवारों ने एक साथ जय घोष, अरदास और अज़ान की गूंज को महसूस किया, तो लगा मानो सदियों पुरानी गंगा-जमुनी तहज़ीब मुस्कुरा उठी हो।

दोपहर के 12:30 बजे थे, जब हुसैनाबाद की फिजाओं में अमन की खुशबू घुलनी शुरू हुई। मौका था एक अज़ीमुश्शान जलसा-ए-आम का, जिसका मकसद किसी एक मजहब की नुमाइंदगी करना नहीं, बल्कि देश के आपसी सौहार्द, अमन और शांति को हिमालय जैसी मजबूती देना था।

मंच का नजारा किसी खूबसूरत गुलदस्ते जैसा था। एक तरफ भगवा वस्त्रों में सजे संत-महात्मा थे, तो दूसरी तरफ दस्तार और जुब्बे में उलमा-ए-किराम। साथ ही सिख समाज के प्रतिनिधि और ईसाई पादरियों की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता है। इन तमाम रहनुमाओं का एक ही सुर था, इंसानियत ही सबसे बड़ा मजहब है।

यह कार्यक्रम विशेष रूप से एक ऐसी शख्सियत के सम्मान में समर्पित था, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रौशन किया है। मौलाना सैय्यद कल्बे जवाद नकवी साहब, जिन्हें हाल ही में ईरानी राष्ट्रपति के हाथों इंटरनेशनल अवार्ड से नवाजा गया, आज अपने ही शहर में अपनों के बीच थे।

सामाजिक प्रतिनिधियों और धर्मगुरुओं ने उन्हें खिराज-ए-तहसीन (सम्मान) पेश करते हुए कहा कि यह अवार्ड केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि भारत की उस इल्मी और रूहानी विरासत का सम्मान है, जो पूरी दुनिया को शांति का रास्ता दिखाती है।

इस जलसे ने यह संदेश दिया कि नफरतों के दौर में आज भी ऐसी जगहें जिंदा हैं, जहाँ दिल मिलते हैं। छोटा इमामबाड़ा के इस साये में जो वादे और इरादे आज दोहराए गए, वे आने वाले कल के लिए एक ढाल का काम करेंगे।

लखनऊ ने एक बार फिर साबित कर दिया कि यहाँ की आबोहवा में आज भी वही पुरानी तहज़ीब रची-बसी है। यह जलसा महज़ एक आयोजन नहीं था, बल्कि उन ताकतों को करारा जवाब था जो बांटने की राजनीति करती हैं। यहाँ से उठी अमन की ये आवाज़ यकीनन पूरे मुल्क के कोने-कोने तक अपनी गूंज पहुंचाएगी।

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