दिव्यांगों को सुविधाएं उपलब्ध ना कराने वाले कॉलेजों की ग्रांट बंद करें : यूजीसी
डीयू के कॉलेजों में दिव्यांगों ( विक्लांगों ) के लिए लिफ्ट,रैम्प और टैक्टाइल की सुविधाओं का अभाव

नई दिल्ली : फोरम ऑफ एकेडेमिक्स फॉर सोशल जस्टिस ( शिक्षक संगठन ) ने दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर योगेश सिंह को पत्र लिखकर यह बताया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध कॉलेजों में दिव्यांगों ( विक्लांगों ) को दी जाने वाली सुविधाओं का नितांत अभाव है । जबकि विश्वविद्यालय में छात्रों ,शिक्षकों व कर्मचारियों की संख्या हर साल बढ़ती जा रही है । यूजीसी के अनेक बार दिए निर्देशों के बावजूद लगभग 80 प्रतिशत कॉलेजों व विभागों में दिव्यांगों (विक्लांगों ) को दी जाने वाली सुविधाओं का अब तक अभाव बना हुआ है । इन कॉलेजों में ना तो उनके लिए चलने फिरने के लिए टैक्टाइल फ्लोरिंग, रैम्प, लिफ्ट, ब्रेल चिन्ह, ध्वनि संकेत व विशेष विल चेयर और ना ही उनके लिए विशेष रूप से निर्मित शौचालय का प्रबंध किया गया है जिससे उन्हें अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
फोरम के चेयरमैन डॉ. हंसराज सुमन ने कुलपति को लिखे पत्र में बताया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में 3000 के लगभग छात्र , 300 शिक्षक व 300 कर्मचारी दिव्यांग वर्गो के कार्यरत्त है । विश्वविद्यालय प्रशासन को उनकी पीड़ा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए मगर कॉलेजों के प्रिंसिपल को यूजीसी से ग्रांट मिलने के बाद भी इनके लिए सुविधाओं का घोर अभाव है ।विश्वविद्यालय के एक दर्जन कॉलेजों जिसमें — हंसराज कॉलेज ,खालसा कॉलेज ,मिरांडा हाउस ,सोशल वर्क डिपार्टमेंट, सोशल साइंस फैकल्टी,लक्ष्मी बाई कॉलेज, श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स, आई.पी कॉलेज, लेडी श्रीराम कॉलेज, राजधानी कॉलेज, सत्यवती कॉलेज , माता सुंदरी कॉलेज , आदि में दिव्यांगों ( विक्लांगों ) को सुविधाएं उपलब्ध है । जिन कॉलेजों में उनके लिए सुविधाएं मुहैया नहीं है वहाँ पर दिव्यांग श्रेणी के अभ्यर्थी प्रवेश लेना नहीं चाहते ।
डॉ. हंसराज सुमन ने बताया है कि दिव्यांगों ( विक्लांगों ) को विशेष सुविधाओं हेतु 1995 में विक्लांग कानून पारित हुआ था जिसमें उन्हें सरकार की ओर से दी जाने वाली आर्थिक सहायता के साथ- साथ उन्हें सक्षम बनाया जा सके, सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएगी। इसके अलावा सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं का नैतिक दायित्व बनता है कि वे हर स्तर पर उनकी मदद करे। उनकी इस सहायता के लिए उसके बाद यूजीसी ने अपने पत्र संख्या -6-1/2006(सीसीपी-11) द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों / कॉलेजों को दिव्यांगों के लिए सभी स्थानों पर अवरोध मुक्त तथा ब्रेल किताबें और सांकेतिक भाषा के व्याख्याकर्ता का प्रबंध करने को कहा गया था लेकिन कुछ कॉलेजों को छोड़कर यह सुविधाएं आज तक उपलब्ध नहीं हुई है। जबकि कॉलेज बिल्डिंग मेंटेनेंस के नाम पर यूजीसी से ग्रांट ली जाती है । उस ग्रांट को अन्य मदों में खर्च कर दी जाती है ।
डॉ. सुमन का कहना है कि दिव्यांग शिक्षकों एवं कर्मचारियों द्वारा बार–बार दिव्यांगों ( विक्लांगों ) की सुविधाओं की ओर ध्यान दिलाने के लिए उनके बैठने, पढ़ने, खेलने कूदने,खाने-पीने आदि के लिए कोई विशेष स्थान या कक्ष आदि का आबंटन नहीं किया गया है और ना ही भारत सरकार द्वारा दी गई सुविधाओं को उन्हें उपलब्ध कराया गया है। उनका कहना है कि उनके संवैधानिक अधिकारों का खुलम-खुला उल्लंघन किया जा रहा है और उनके नाम पर यूजीसी/केंद्र सरकार से मिलने वाले फंड को अन्य मदों में व्यय कर झूठे उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा किए जा रहे हैं । डॉ. सुमन ने बताया है कि विक्लांग कानून पारित होने के 29 साल बाद भी इन प्रावधानों का पालन नहीं हुआ है । विक्लांग कानून के सेक्शन -46 ने सरकारों को सरकारी भवनों / कॉलेजों में दिव्यांगों ( विक्लांगों ) के लिए विशेष सुविधाएं प्रदान करने को जरूरी बताया है। साथ ही इन वर्गों के लिए रैम्प, लिफ्ट, टेक्सटाइल, ब्रेल बुक आदि की सुविधाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी उक्त संस्था की है जिसमें छात्र अध्ययन कर रहे हैं।साथ ही शिक्षक व कर्मचारी कार्यरत्त है।
उन्होंने यह भी बताया है कि नेत्रहीन शिक्षकों के लिए लाइब्रेरी में ब्रेल बुक और ऑडियो-वीडियो के लिए विशेष बजट का प्रावधान किया गया जो उनके लिए खर्च किया जाएगा। साथ ही छात्रों के लिए ब्रेल लिपि में पुस्तकें,ऑडियो वीडियो, टेपरिकॉर्डर की सुविधाएं उपलब्ध कराना संस्थान/कॉलेज का नैतिक दायित्व बनता है । डॉ. सुमन ने कॉलेजों व विभागों में विक्लांगों को विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति को पत्र लिखकर यह भी मांग की है कि प्रत्येक कॉलेज में रैम्प, लिफ्ट ,ब्रेल चिन्ह, ध्वनि संकेत, विल चेयर और विशेष रूप से निर्मित शौचालयों का निर्माण कराया जाए ताकि इन वर्गों को असुविधा न हो । साथ ही विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से एक सर्कुलर जारी कर कॉलेजों को यह भी निर्देश दिए जाए कि जो कॉलेज 6 महीने के अंदर दिव्यांगों ( विक्लांगों ) की दी जाने वाली सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराएंगे उन कॉलेजों की ग्रांट बन्द करने के निर्देश दे ताकि कॉलेज जल्द से जल्द यह कार्य शुरू कर सके ।
उनका यह भी कहना है कि डीयू के कॉलेजों और विभागों में यह पता लगाया जाए कि किन-किन कॉलेजों में दिव्यांगों ( विक्लांगों ) के लिए सुविधाएं उपलब्ध नहीं है उनके आंकड़े एकत्रित किए जाए और पता लगाया जाए कि उन्होंने अभी तक विक्लांगों को ये सुविधाएं उपलब्ध क्यों नहीं प्रदान की । सरकार व यूजीसी द्वारा दिया गया पैसा उन्होंने किस मद में व्यय किया है । डॉ. सुमन ने अपने पत्र में यह भी मांग की है कि विक्लांग छात्रों के लिए ग्राउंग फ्लोर पर एक विशेष कक्ष इनके लिए बनाया जाएं ताकि खाली समय में वे बैठ सके। साथ ही इनके लिए गीत , संगीत ,कल्चरल प्रोग्राम , खेल-कूद आदि के सामान की व्यवस्था करानी चाहिए ताकि ये भी प्रतियोगिताओ में भाग ले सकें ।



