उत्तर-प्रदेशनई दिल्लीबड़ी खबरलखनऊ

संविधान की रक्षा का सवाल और समाजवाद

डा. गिरीश

हाल के दिनों में संविधान की रक्षा का सवाल राजनैतिक विमर्श के केन्द्र में रहा है। हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव में यद्यपि कई प्रमुख मुद्दों ने मतदाताओं को उद्वेलित कर रखा था, लेकिन संविधान की रक्षा का सवाल एक अहम मुद्दा था। संभवतःइसी मुद्दे ने अबकी बार चार सौ पार का ख्वाब सँजोये बैठी भाजपा को 240 का आंकड़ा भी नहीं छूने दिया।

देश की आजादी के बाद यह पहला चुनाव है जिसे किसी दल अथवा नेता से कहीं ज्यादा आम जनता ने लड़ा है। आम जनता ही इस खेल की ‘मैन औफ़ द मैच’ है।

भाजपा और उसकी सरकार की विभाजनकारी, फासीवाद- प्रोत्साहक एवं कारपोरेट- परस्त नीतियों की कोख से निकले कई मुद्दे थे जिन पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, वाम और लोकतान्त्रिक शक्तियों ने आवाज उठाई और भुक्तभोगी आम जनता ने उन मुद्दों के बारे में अपनी राय बनायी।

रोजगार से जुड़े सवालों ने नौजवानों को झकझोर के रख दिया था। 2 करोड़ युवाओं को रोजगार देने के वादे का तो कहीं अता पता नहीं था। उल्टे गत 10 सालों में 12 करोड़ बेरोजगार और बढ़ गए। बेरोजगारी, 4 वर्ष बाद घर वापसी योजना- अग्निवीर, अति अल्पवेतनभोगी और अधिकारविहीन संविदाकर्मियों की संख्या  में उत्तरोत्तर बढ़ोत्तरी, समस्त श्रम अधिकारों को अपदस्थ कर थोपे गये चार लेबर कोड बिल, कम वेतन पर अधिकाधिक काम और भर्ती परीक्षाओं में धांधली सिर चढ़ कर बोल रहे थे।

इसी तरह हाड़तोड़ महंगाई, देश और देशवासियों पर सीधे प्रहार कर रहा भ्रष्टाचार, लिसानों की कंगाली, सार्वजनिक क्षेत्र और सार्वजनिक संपत्तियों की बिक्री, कार्पोरेट्स घरानों को मालामाल करना और गरीबों को कंगाल बनाना तथा पुलवामा जैसे स्केण्डल का न हो पाना जैसे सवाल अहम भूमिका निभा रहे थे। इन सवालों ने जनबरी माह में प्राण प्रतिष्ठा, धर्म और आस्था की आड़ में किए गए प्रपंचों और सांप्रदायिक जहर उगलने वाली शीर्षस्थ भाजपा नेत्रत्व की बकवास को मतदाताओं ने कूड़ेदान में पटक दिया।

लेकिन संविधान की रक्षा का सवाल सर्वोपरि था जिसने आमजन को अहसास करा दिया कि उसके अधिकार, उसजा भविष्य, विकास और लोकतन्त्र सभी खतरे में हैं। खतरे का अहसास इतना गहरा था कि शायद पहली बार भारत के संविधान का महत्व चर्चा के केंद्र में आया। वही संविधान जिसके निर्माण का श्रेय डा. बी. आर. अंबेडकर को इसलिये जाता है कि उसकी प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होने महात्बपूर्ण भूमिका निभायी।

प्रश्न यह है कि आखिर संविधान पर इतना बड़ा हमला क्यों?

क्योंकि यह भारत का संविधान ही देश का सर्वोच्च कानून है, वह उसके शासन ढांचे, अधिकारों और कर्तव्यों को रेखांकित करता है। वह सत्ता और शासन को मर्यादित करता है और उन्हें निरंकुश बनने से रोकता है।

यह भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित करता है, जो अपने नागरिकों के लिए, न्याय, स्वतन्त्रता, समानता और बंधुतव सुनिश्चित करता है। इसकी प्रस्तावना भी हमले के केंद्र में है जो भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक गणराज्य घोषित करती है।

निष्कर्ष यह कि हमारा सारा संविधान संप्रभुता, समानता, न्याय, स्वतन्त्रता, बंधुत्व, गरिमा, धर्मनिरपेक्षता, संघववाद, समाजवाद एवं लोकतन्त्र के इर्दगिर्द ही घूमता है। सच कहा जाये तो यही इसका दर्शन है जो समाजवाद के निर्माण की प्रेरक शक्ति है।

संविधान के यही मानवीय और प्रगतिवादी प्राविधान शोषक वर्ग और मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान/ तथा शासक दल को अखरते हैं क्योंकि वे उनके प्रतिगामी मार्ग और उद्देश्यों के मार्ग में बाधक भी हैं।

सत्ताधारी पार्टी भाजपा अपने विद्रूप चेहरे को कभी हिंदूवादी तो कभी सनातन धर्मी होने के मुखौटे लगाती रहती है लेकिन इसके पीछे का सच कुछ और है। वह घनघोर सांप्रदायिक है, फासीवादी प्रव्रत्तियों से लवालब है, साम्राज्यवादपरस्त है- अतएव वैश्विक स्त्तर पर साम्राज्यवादी देशों के साथ खड़ा होना चाहती है। हालांकि वर्तमान आंतरिक और वैश्विक परिस्थितियाँ उसे ऐसा करने नहीं देती हैं। ताजा उदाहरण है कि भारत के प्रधानमंत्री ने अभी संसद में विश्वासमत हासिल नहीं किया है लेकिन वे  G- 7 के शिखर सम्मेलन में शामिल होने को इटली पहुँच गये। और वहां उनका निरादर तक हुआ।

इतना ही नहीं भाजपा संपूर्णतः पूंजीवादी और कारपोरेटपरस्त है जिनके हित किसानों, कामगारों, गरीबों और तमाम शोषित- वंचितों की लूट और शोषण से पूरे होते हैं। संविधान उनके शोषण और लूट के मार्ग में बाधा बन कर खड़ा है जिसे वे अनेकानेक हथकंडों से बदलने पर आमादा हैं। भाजपा के लक्ष्यों की प्रतिपूर्ति के मार्ग में संविधान एक बड़ा रोड़ा बन कर खड़ा हुआ है।

जब भी पूंजीवादी सत्ता प्रतिष्ठानों की राह में संविधान रोड़े बन कर खड़ा हुआ या तो उसके मानदंडों की अवहेलना की गयी या उसे बदलने का प्रयास किया गया। भाजपा के श्री अटल बिहारी वाजपेयी के क्षासंकाल में तो इसे बदलने को संविधान समीक्षा आयोग तक बना डाला गया था। मौजूदा सरकार के शासनकाल में इसकी अवहेलना और बदलावों के कई उदाहरण मौजूद हैं। उनमें धारा 370 के हटाये जाने और निर्वाचन आयोग के चयन की प्रक्रिया को बदले जाने आदि प्रमुख हैं।

उनके कुछ घोषित लक्ष्य हैं- संविधान की प्रस्तावना में से धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद शब्दों को हटाना, उनके स्थान पर हिंदूराज जोड़ना, राष्ट्रपति प्रणाली लागू करना आदि कई। इस खतरे को सबसे पहले भारतीय कम्युनिस्ट पारी व अन्य  वामपंथी शक्तियों ने उजागर किया फिर अन्य लोकतान्त्रिक ताकतों ने इसे समझा। अंततः यह जनता का नारा बन गया जिसने समाज में गहरी उथल पुथल पैदा कर दी। इसका उदाहरण यह है कि बसपा का कोर वोटर का एक भाग संविधान बचाने का नारा दे रही शक्तियों के साथ जा खड़ा हुआ।

‘अबकी बार 400 पार’ भाजपा के इस नारे का यही संदेश गया कि वो इतना बढ़ा बहुमत इसीलिए चाहती है ताकि संविधान को बदल सके। अतएव आम चुनावों में यह बड़ा मुद्दा बन गया और भाजपा को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी।

भाजपा की इस हार से संविधान बदलने का खतरा टल गया है, पर यह पूरी तरह समाप्त हो गया है यह समझना बड़ी भूल होगी। जब तक शोषण पर टिकी पूंजीवादी व्यवस्था रहेगी वे अपबे हित में संविधान को बदलने अथवा उसमें काट- छांट करने के प्रयास जारी रखेंगे। अतएव हमें भी और जनता को भी कड़ी चौकसी बनाए रखनी है।

हम पहले ही कह चुके हैं कि संविधान की मूल अवधारणाओं का निचोड़- शोषण, गरीबी, असमानता से मुक्त समाज- समाजवादी समाज का निर्माण है।

यहां उल्लेखनीय है कि पार्टी विशेष का नाम समाजवाद के नाम पर रख लेने अथवा यदा- कदा कुछ कार्पोरेट्स और उनके पिट्ठूओ की आलोचना करना मात्र समाजवाद नहीं है। यह एक संपूर्ण विचार है जो मानवता के भारी बहुमत के पक्ष में खड़ा है। यह मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के हर रूप का नकार है।

प्रत्येक से उसकी क्षमता के अनुसार, प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार उपलब्ध कराना इसका पवित्र उद्देश्य है। पूंजी का पूरी तरह राज्य नियंत्रण ही समाजवाद नहीं, पृथ्वी पर मौजूद समस्त प्राकृतिक और उत्पादित धन- धान्य को प्रत्येक नागरिक के उत्थान में लगा कर यह निर्मित किया जा सकता है। अतएव यह देशिक नहीं वैश्विक है।

विश्व के ज्ञात इतिहास और भारत की अर्वाचीन मनीषा से लेकर आज तक समाजवाद का यह विचार किसी न किसी रूप में विद्यमान है। लेकिन मनीषी कार्ल मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन ने इसे वैज्ञानिक रूप से परिभाषित किया। आज के भारत के मनीषियों- डा. बी. आर. अंबेडकर, शहीद भगत सिंह एवं महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इसे भारत की शोषित- पीड़ित जनता के लिए एकमात्र विकल्प माना और उसके प्रति प्रतिबद्धता जताई।

डा. अंबेडकर ने कहा- मानव समाज में दुख व्याप्त हैं, जिन्हें दूर किया जाना चाहिए ताकि लोग सुख से रह सकें। उन्होने एक व्यक्ति, एक मत, एक मूल्य पर ज़ोर दिया।

डा. अंबेडकर का समाजवाद एक ओर बुद्ध और कबीर से प्रेरित है तो वहीं तत्कालीन सोवियत संघ के समाजवादी माडल से। वह समता समानता का पैरोकार है। उनके अनुसार  वह राज्य समाजवाद से हासिल की जा सकती है। अपने ग्रंथ ‘स्टेट एंड माइनोरिटीज’ में वे लिखते हैं-

– जमीन राज्य के अधीन रहेगी, उस पर सामूहिक भेदभाव के बिना खेती की जायेगी।
– अधिकतर उद्योग राज्य के अधीन होंगे जिन्हें सरकार चलाएगी—उत्पादन करेगी।
– राज्य स्वयं बीमा कंपनी चलायेगा, बीमा सख्ती से लागू किया जायेगा। उससे आयी धनराशि को सरकार खेती और उद्योग पर खर्च करेगी। खेती से हूयी आय का एक भाग काम करने वालों को मिलेगा। उद्योग में काम करने वालों को वेतन मिलेगा, बीमा करने वालों को कमीशन मिलेगा।
– राज्य को खेती, उद्योग और बीमा से जो मुनाफा मिलेगा उसे वंचित लोगों के हित, सुख तथा उत्थान के लिए खर्च करना होगा, देश की सुरक्षा के लिये कुछ हिस्सा केंद्र को भेजना होगा।
– कोई व्यक्ति राज्य में जमीन, उद्योग अथवा बीमा का मालिक नहीं होगा।
– राज्य के पास पर्याप्त पूंजी रहेगी जिसके सहारे वह जो भी निर्माण कार्य करना चाहेगा, निर्धारित अवधि मे आसानी से पूरा कर लेगा।

समाजवाद के बारे में डा॰ अंबेडकर ने और भी बहुत कुछ लिखा है, लेकिन आज के अंबेडकारवादी इस ओर ध्यान देते नजर नहीं आते।

शहीदे आज़म भगत सिंह ने अपना सारा जीवन समाजवाद के लक्ष्य को हासिल करने को समर्पित कर दिया था। वे मार्क्स और लेनिन के विचारों के कट्टर अनुयायी थे तथा वे मार्क्स को साम्यवाद का पिता कहते थे। वे गरीबी को एक महा अभिशाप और मानव निर्मित दंड मानते थे जिसका निदान वे समाजवाद में देखते थे।

वे ईश्वर के बजाय डार्विन पर भरोसा करते थे। उसी विकासवादी डार्विन पर जिनको भाजपा सरकार ने पाठ्यक्रमों से हटा दिया है। अभी हाल में ही इस सरकार ने एनसीईआरटी की पुस्तकों से बाबरी मस्जिद तोड़े जाने संबंधी पाठ यह कह कर हटा दिया कि छात्रों को दंगा फसाद की बातें नहीं पढ़ाई जानी चाहिए। जबकि यह पाठ्यक्रम में शामिल ही इसलिए किया गया था कि आने वाली पीढ़ियाँ संघ परिवार के इस कुक्रत्य से ऐसा न करने और न होने देने की सीख लें सकें।

महापंडित राहुल सांक्रत्यायन प्रौढ़ावास्ता तक पहुँचते पहुँचते प्रबल साम्यवादी चिंतक बन गए थे। उन्होने साम्यवाद समाजवाद और साम्यवादी नेताओं पर बहुत कुछ लिखा है। इतना ही नहीं उन्होने  एक पुस्तक “साम्यवाद ही क्यों” लिख कर समाजवाद की महत्ता को निरूपित किया है।

भारत और दुनियाँ के अनेकानेक मनीषियों ने समाजवाद को ‘मानवता का सर्वोत्क्रष्ट सिद्धान्त’ कहा है।

इसे जमीन पर उतारना हम सभी का कर्तव्य है।
संविधान की रक्षा और समाजवाद के निर्माण का संकल्प एक दूसरे के पूरक हैं।

( स्व. कामरेड रमेश मिश्रा, आगरा की चौथी पुण्यतिथि पर डा. गिरीश द्वारा दिये भाषण के संकलित और संपादित अंश )। डा. गिरीश।

Par

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button