यथार्थ का चित्रण करती कवि अनुपम मिश्रा की रचना ‘आसमाँ को ओढ़ता और धरती बिछाता हूँ’

आसमाँ को ओढ़ता और धरती बिछाता हूँ
यह कविता उन लोगो के जीवन का एक अंश मात्र भी नही है जो गांव से शहर अपने परिवार के लिए रोटी कमाने आते हैं और बिना काम पाए अधिकतर खाली हाथ वापस घर चले जाते हैं.

रोज़ मुँह अंधेरे ही गांव से शहर को काम पर चला आता हूँ।
ढाई कोस पैदल फिर रेल पकड़ पाता हूँ।
ज़ोर जिस्म का लगाकर सिर्फ़ लटक पाता हूँ।
कई कोस का सफ़र रोज़ ऐसे ही बिताता हूँ।
थूकी हुई छीटों को राह भर छुड़ाता हूँ।
घंटेो का सफ़र यूंही झूलकर बिताता हूँ।
दिनभर काम पाने की कोशिश मे दर-दर भटक आता हूँ।
फिर थक कर किसी कोने मे फटा अंगौछा बिछाता हूँ।
चटनी और बाजरे की रोटी को सहलाता हूँ।
बिन खाए सिर्फ गंध से भूख को दबाता हूँ।
साँझ ढले सुबह का सिलसिला फिर मै दोहराता हूँ।
और देर रात चोरी से झोपड़ी में सिर मैं घुसाता हूँ।
भूख से बिलखती मुनिया को चटनी से बाजरे की रोटी खिलाता हूँ।
पर सोहना सब समझ जाती है और मै नज़रे चुराता हूँ।
सामने सोहना एक लोटा पानी लेकर खड़ी थी ।
आज वह भी भूख से लड़ने की ज़िद पर अड़ी थी ।
आसमा मे एक सितारा रोज़ मुस्कराता है ।
लाख रोकूँ पर आँख से अश्क छलक जाता है ।
भूख से बेहाल मै आज फिर आसमाँ को ओढ़ता और धरती बिछाता हूँ।
आसमाँ को ओढ़ता और धरती बिछाता हूँ।
रचनाकार : अनुपम मिश्रा



