उत्तर-प्रदेशबड़ी खबरलखनऊ

ऐसी भी एक स्वाधीनता—सेनानी जोड़ी रही !!

                     के. विक्रम राव
             यह विप्लवगाथा है एक सत्याग्रही दंपति की। दोनों निष्ठावान गांधीवादी रहे। पति थे चटगांव के बांग्लाभाषी बैरिस्टर यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त। पत्नी थी ब्रिटिश, केंब्रिज में जन्मी, नेली एडिथ ऐलेन ग्रे, जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की तीसरी महिला अध्यक्षा रहीं। जब निर्वाचित अध्यक्ष पं. मदन मोहन मालवीय अचानक (1933) में गिरफ्तार हो गये तो कोलकाता में 48वें अधिवेशन में वे अध्यक्षा नामित हुयीं थीं। यतीन्द्र मोहन की 23 जुलाई 2022 को 89वीं पुण्यतिथि है। उनका रांची जेल (तब अविभाजित बंगाल प्रेसिडेंसी) में निधन हुआ था। कोलकाता में उनकी शवयात्रा में इतना जनसैलाब कभी नहीं देखा गया था। देशबंधु चितरंजन दास के निधन (16 जून 1928) के बाद। यतीन्द्र मोहन को आदर से देशप्रिय कहा जाता था।

यतीन्द्र मोहन चटगांव के एक धनी जनप्रिय वकील यात्रामोहन सेनगुप्त के पुत्र थे। पिता बंगाल विधानपरिषद के सदस्य थे। यतीन्द्र ब्रि​टेन से कोलकाता लौटते ही राष्ट्रवादी संघर्ष में शामिल हो गये थे। उनकी रुचि श्रमिक आंदोलन में अधिक थी। उन्होंने बंगाल—असम रेल कर्मचारियों के यूनियन को संगठित किया था। बर्मा तेल कम्पनी मजदूरों की भी यूनियन गठित की। स्वाधीनता संघर्ष में वे 1924 के प्रथम असहयोग आंदोलन से ही जुड़ गये। गांधीजी ने उनके बंगाल में कांग्रेस गठन को मजबूत करने का जिम्मा दिया। वे लाभदायी बैरिस्टरी छोड़कर, अदालतों का बहिष्कार कर, हर गांधीवादी संघर्ष (नमक संत्याग्रह मिलाकर) में भी कूद पड़े। जेल आना जाना लगा रहा।
जब अंग्रेजी साम्राज्य ने बर्मा को भारतीय संघ से अलग कर एक पृथक राष्ट्र बनाया तो रंगून में यतीन्द्र मोहन ने विरोध में जनसभा आयोजित की और जेल में रखे गये बांग्ला क्रांतिकारी कैदियों के वकील के नाते उन्होंने सूफी आस्था और साधु—संतों के लिये मशहूर चटगांव में साम्राज्यवाद के विरुद्ध सबल विरोध का आयो​जन भी किया था। यतीन्द्र की गमनीय विशिष्टता थी कि जब उनके पिता ने उन्हें केंब्रिज भेजा तो अमूमन अपेक्षा यही थी कि भारतीय युवा आईसीएस में चयनित होकर गुलाम हिन्दुस्तान में मजिस्ट्रेट या कमिश्नर बनेगा। हमवतनियों पर हुकूमत चलायेगा। दमन करेगा। मगर यतीन्द्र मोहन केंब्रिज विश्वविद्यालय में ही भारतीय छात्रों की ”मजलिस” के अध्यक्ष बने। लक्ष्य स्पष्ट था। ब्रिटिश मुक्त—भारत हासिल करना। वहीं उनकी नेली से भेंट हुयी। वे उनकी माता—पिता के घर पेईंग गेस्ट के तौर पर ​रहते थे। जब 1909 में उनका विवाह हुआ तो दोनों भारत आकर राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हो गये। उन्होंने चटगांव शस्त्रागार पर देशभक्तों के हमले के बाद ब्रिटिश शासकों द्वारा अकथनीय अत्याचार का विरोध किया। पीड़ितों का मुकदमा लड़ा। खासकर क्रांतिवीर मास्टर सूर्या सेन को कोर्ट में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। जब बंग भंग के बाद लार्ड कर्जन के अनुयायियों ने हिन्दू—मुस्लिम वैमनस्य बढ़ाया तो पाकिस्तान आंदोलन को तभी से बल मिलना शुरु हो गया था। इसका वे प्रतिरोध करते रहे।
सेनगुप्त दम्पति में विभिन्नतायें कई थीं। मसलन नस्ल, भाषा, जीवनशैली, मगर भारत की आजादी पर उनकी सोच तथा दृष्टिकोण समान था। बापू के प्रथम असहयोग आंदोलन (1921) में दोनों की भागीदारी बराबर की थीं। जब खादी को अवैध घोषित कर दिया गया और गांधी टोपी पहनना अपराध था तो नेली चटगांव में घर—घर जाकर खादी बेचती थीं। असंख्य जुलाहों को मदद मिलती थी। तभी दिल्ली में एक निषिद्ध जनसभा को संबोधित करने पर नेली को चार माह की सजा हुयी। दिल्ली जेल में रखा गया। अपने दिल्ली कारागार वास के दिनों को याद कर उन्होंने बताया कि अंग्रेज जेलर ने घड़ों में पानी भेजता था तो ”हिन्दू पानी” और ”मुस्लिम पानी” चिल्लाकर बताया जाता था। वह जेल नहीं था, यातनागार और नरक जैसा था।
जब भारत का विभाजन हुआ तो महात्मा गांधी ने नेली को पूर्वी पाकिस्तान (चटगांव) में ही बसजाने और हिन्दू—मुस्लिम सौहार्द का काम करने का निर्देश दिया। उन्हें कई दफा घर में ही कैद रहना पड़ा। वे बंगाल विधानसभा के लिये दो बार तथा पूर्वी पाकिस्तान एसेंबली के लिये एक बार (1954) निर्वाचित हुयीं।
उन्हें भारत सरकार (प्रधानमंत्री) ने 1971 में द्वितीय शीर्ष पुरस्कार पद्मविभूषण से नवाजा। एकदा उनका कूल्हा टूट गया था तो उन्हें ढाका से कोलकाता अस्पताल लाया गया। मगर बचाया न जा सका। आजाद मगर खण्डित भारत इस सेनगुप्त युगल को चिर स्मरणीय मानता रहेगा।

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