इन्दिरा एकादशी पापों को नष्ट करती है और पितरों को अधोगति से मुक्ति दिलाती है
इन्दिरा एकादशी 6 अक्टूबर 2026 पर विशेष

इन्दिरा एकादशी
डॉ. शैलजा शर्मा दीक्षित
इन्दिरा एकादशी आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है। पितृपक्ष में आने के कारण इसका विशेष महत्व है। वर्ष 2026 में यह मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 को पड़ रही है।
पारण
पंचांगों के अनुसार 6 अक्टूबर की इन्दिरा एकादशी के अगले दिन प्रातः पारण बताया गया है; इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार द्वादशी पारण करना उचित रहेगा।
इन्दिरा एकादशी की पूजा-विधि
दशमी को प्रातः काल स्नान पूजा आदि के बाद पुन: दोपहर को नदी आदि में जाकर स्नान करें। फिर श्रद्धापूर्व पितरों का श्राद्ध करें और एक बार भोजन करें।
सात्त्विक भोजन करें और संयम रखें।
भगवान श्रीहरि का स्मरण करें। गीता पाठ व विष्णु सहस्त्र नाम पढ़े ।
रात्रि में जल्दी सोकर अगले दिन व्रत का संकल्प लें।
एकादशी के दिन
प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें ।
भगवान विष्णु/श्रीकृष्ण की पूजनकरें।
दीपक, धूप, पुष्प, नैवेद्य ,तुलसीदल और फल अर्पित करें।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें।
इन्दिरा एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें।
विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता या श्रीमद्भागवत का पाठ करना शुभ माना जाता है।
सामर्थ्य के अनुसार निर्जल या फलाहार व्रत करें। स्वास्थ्य के अनुसार ही व्रत रखें।
रात्रि में अर्चा विग्रह के समक्षभजन-कीर्तन और जागरण करे।
विशेष: एकादशी में भगवान को अर्पित तुलसीदल का विशेष महत्व बताया गया है।
इन्दिरा एकादशी की कथा
इन्दिरा एकादशी की कथा भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी।यह एकादशी पापों को नष्ट करती है और पितरों को अधोगति से मुक्ति दिलाती है।
प्राचीन समय में माहिष्मती नगरी में इन्द्रसेन नाम के धर्मात्मा राजा राज करता था । वह भगवान विष्णु के भक्त था और अपनी प्रजा का पालन धर्मपूर्वक करते थे।
एक दिन उनके राज्य में आकाश मार्ग से देवर्षि नारद आए। राजा ने उनका आदर-सत्कार किया। नारदजी ने बताया कि राजा के पिता पूर्व जन्म के किसी कर्म के कारण पितृलोक में कष्ट पा रहे हैं।
राजा बहुत दुःखी हुए और उन्होंने अपने पिता के उद्धार का उपाय पूछा।
तब नारदजी ने उन्हें आश्विन कृष्ण पक्ष की इन्दिरा एकादशी का व्रत करने की विधि बताई। राजन व्रत के नियमों को श्रद्धापूर्वक अनुसरण करते हुए प्रतिज्ञा करें कि ‘मैं आज संपूर्ण भोगों का त्याग करके निराहार एकादशी का व्रत करूँगा।
हे पुंडरीकाक्ष! हे केशव!मैं तुम्हारी शरण हूँ, तुम मेरी रक्षा करो, इस प्रकार नियम के साथ शालिग्राम की मूर्ति के आगे विधिपूर्वक श्राद्ध करके योग्य ब्राह्मणों को फलाहार प्रसाद का भोजन करायें और दक्षिणा भी दें। पितरों के श्राद्ध से जो बचे हुए को सूँघकर गौ को दें तथा ध़ूप, दीप, चंदन,गंध, पुष्प, नैवेद्य आदि सब सामग्री से विष्णु भगवान का पूजन करके आस्था के साथ एकादशी का व्रत किया, भगवान विष्णु की पूजा करते उसका पुण्य अपने पिता को अर्पित किया।
भगवान विष्णु की कृपा से राजा के पिता को अधोलोक से मुक्ति मिली और वे विष्णु लोक को प्राप्त हुए। राजा इन्द्रसेन भी आजीवन धर्मपूर्वक राज्य कर अपने पुत्र को सिंहासन सौंप स्वर्ग को गए।
इसी कारण इन्दिरा एकादशी को विशेष रूप से पितरों के कल्याण और भगवान विष्णु की कृपा से जोड़ा जाता है।
इन्दिरा एकादशी का महत्व
मुख्य भाव:
भगवान विष्णु की भक्ति व कृपा, एकादशी व्रत, पितरों के प्रति श्रद्धा
परंपरा में माना जाता है कि इस व्रत से—
भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त होती है।
पितरों के लिए पुण्य-समर्पण किया जाता है।जिससे अधोगति प्राप्त पितरों की मुक्ति होती है।
भक्त के मन की शुद्धि और भक्ति की वृद्धि होती है।
पूजा व्रत, जप, दान ,ध्यान और भगवद्-स्मरण का आध्यात्मिक फल प्राप्त होता है।



