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कारगिल की विरासत और भारत का भविष्य

कारगिल विजय दिवस (26 जुलाई) पर विशेष :

डॉ. एस.के. गोपाल

युद्ध किसी भी सभ्य समाज की पहली पसंद नहीं हो सकता। भारत की सांस्कृतिक परंपरा भी सदैव शांति, सह-अस्तित्व और संवाद की पक्षधर रही है। लेकिन जब राष्ट्र की संप्रभुता, सीमाओं और स्वाभिमान पर आघात होता है, तब संघर्ष अपरिहार्य हो जाता है। 1999 का कारगिल युद्ध इसी सत्य का सशक्त उदाहरण है। 26 जुलाई को मनाया जाने वाला कारगिल विजय दिवस केवल एक सैन्य विजय का स्मृति दिवस नहीं है। यह राष्ट्रीय आत्मविश्वास, सामूहिक संकल्प और अदम्य साहस का भी प्रतीक है।

कारगिल युद्ध की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसे दुनिया के सबसे कठिन युद्धक्षेत्रों में लड़ा गया। बर्फ से ढकी ऊँची पर्वत चोटियाँ, ऑक्सीजन की कमी, प्रतिकूल मौसम और सामरिक दृष्टि से लाभप्रद ऊँचाइयों पर बैठे शत्रु, इन सबके बीच भारतीय सैनिकों ने जो पराक्रम दिखाया, वह विश्व सैन्य इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उन्होंने केवल अपने कब्जे वाले क्षेत्र वापस नहीं लिए, बल्कि यह साबित किया कि भारत अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए हर कीमत चुकाने को तैयार है।

कारगिल की विजय हमें यह भी सिखाती है कि किसी राष्ट्र की शक्ति केवल उसके हथियारों से नहीं मापी जाती। सैनिकों का मनोबल, राजनीतिक नेतृत्व की दृढ़ता और नागरिक समाज की एकजुटता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। उस समय पूरा देश जाति, भाषा, क्षेत्र और विचारधाराओं से ऊपर उठकर सेना के साथ खड़ा था। यही राष्ट्रीय एकात्मता भारत की सबसे बड़ी ताकत है। आज जब सार्वजनिक जीवन में मतभेद और विभाजन की आवाजें अधिक सुनाई देती हैं, तब कारगिल हमें याद दिलाता है कि राष्ट्रीय हित हर मतभेद से ऊपर है।

समय के साथ युद्ध की प्रकृति भी बदल चुकी है। अब खतरे केवल सीमाओं तक सीमित नहीं हैं। साइबर हमले, ड्रोन तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सैन्य प्रणालियाँ, दुष्प्रचार अभियान, आर्थिक दबाव और आतंकवाद जैसी चुनौतियाँ लगातार सामने आ रही हैं। ऐसे समय में कारगिल की सीख और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। राष्ट्रीय सुरक्षा अब केवल सेना का विषय नहीं रही। यह विज्ञान, तकनीक, उद्योग, अर्थव्यवस्था, कूटनीति और नागरिक जागरूकता से जुड़ा व्यापक राष्ट्रीय दायित्व बन चुकी है। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, सीमावर्ती क्षेत्रों में मजबूत आधारभूत संरचना और आधुनिक तकनीक में निवेश राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्य आवश्यकताएँ हैं।

कारगिल विजय दिवस का एक मानवीय पक्ष भी है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। युद्ध समाप्त होने के बाद भी शहीदों के परिवारों का संघर्ष समाप्त नहीं होता। उनके सम्मान, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और पुनर्वास की जिम्मेदारी पूरे समाज की है। सच्ची श्रद्धांजलि केवल श्रद्धासुमन अर्पित करने से नहीं होगी। हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि शहीदों के परिवार सम्मान और आत्मसम्मान के साथ जीवन जी सकें। इसी प्रकार पूर्व सैनिकों के अनुभवों और क्षमता का राष्ट्र निर्माण में अधिक प्रभावी उपयोग किया जाना चाहिए।

आज की पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्मृतियों का क्षरण है। सूचना के तीव्र प्रवाह में इतिहास कई बार कुछ तिथियों और औपचारिक आयोजनों तक सिमटकर रह जाता है। कारगिल विजय दिवस को केवल औपचारिक समारोहों तक सीमित नहीं रहने देना चाहिए। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं में इसके ऐतिहासिक, सामरिक और नैतिक पक्षों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। नई पीढ़ी को यह समझना होगा कि स्वतंत्रता और सुरक्षा सहज उपलब्ध नहीं होती। इसके पीछे अनगिनत सैनिकों का त्याग, तप और बलिदान होता है।

कारगिल की विजय हमें यह भी बताती है कि शांति और शक्ति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। जो राष्ट्र अपनी सुरक्षा के प्रति सजग और सक्षम होता है, वही आत्मविश्वास के साथ शांति का संदेश दे सकता है। भारत की विदेश नीति भी इसी संतुलित दृष्टिकोण पर आधारित रही है। हमारा उद्देश्य संघर्ष नहीं, शांति है; लेकिन शांति की रक्षा के लिए सामर्थ्य भी उतना ही आवश्यक है।

कारगिल विजय दिवस पर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करना हमारा कर्तव्य है। उससे भी बड़ा दायित्व उनके आदर्शों को अपने राष्ट्रीय जीवन का हिस्सा बनाना है। यदि हम अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करें, राष्ट्रीय एकता को सर्वोपरि रखें, लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करें और आत्मनिर्भर, अनुशासित तथा सशक्त भारत के निर्माण में अपना योगदान दें, तभी कारगिल के अमर वीरों के बलिदान का वास्तविक सम्मान होगा। विजय का सच्चा उत्सव तभी है, जब उसकी प्रेरणा हमारे वर्तमान को सशक्त बनाए और भविष्य का मार्ग प्रशस्त करे।

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