सिमटता परिवार, निपटते रिश्ते, सिसकता अकेले

लखनऊ । संयुक्त परिवार की व्यवस्था से अलग आज एकल परिवार में सदस्यों को संबल देने वालों का अकाल सा है, ऐसे में रिश्ते टूट और बिखर ज्यादा रहे हैं। व्यक्ति तनाव और अवसाद का शिकार हो रहे हैं।
ये कहना था मुख्य अतिथि राम कथा वाचक धीरेन्द्र वशिष्ठ का। उन्होंने कहा कि समाज मनुष्य को भ्रष्ट करता है मनुष्य अबोध बालक के रूप में जनम लेता है। जो स्वभाव से सरल और सीधा होता है। समाज में आने के बाद संपत्ति, लालच और ऊंच-नीच की भावना उसका स्वभाव परिवर्तित करके भ्रष्ट बना देती है। मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, लेकिन हर जगह वह जंजीरों में जकड़ा हुआ है।
‘परिवारिक और सामाजिक संबंधों का वर्तमान स्वरूप’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन अवध फाउण्डेशन की ओर से जानकीपुरम कार्यालय सभागार सभागार में किया गया था।
अतिथियों का स्वागत करते हुए संस्था के अध्यक्ष सूरजदेव शुक्ल ने कहा कि वर्तमान परिवेश में सतयुग से कलियुग तक पारिवारिक संबंधों का निरंतर पतन होता गया। इसे सुधारने की आवश्यकता है।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन करने के पश्चात बीना मिश्रा के शिष्यों अराध्या मिश्रा, अद्वैत मिश्रा, साक्षी मिश्रा, रचित मिश्रा द्वारा के श्रीराम स्तुति व हनुमान चालीसा के पाठ से हुआ l
रामप्रकाश त्रिपाठी के संचालन में
डाॅ काशीनाथ पांडेय ने कहा परिवार के बिना शिक्षा, ज्ञान, विकास किसी बच्चे का नहीं हो सकता। प्राचीन भारतीय संस्कृति सभी अपने कर्तव्य बताती थी, लेकिन प्रदूषित पाश्चात्य संस्कृति अधिकार सिखा रही है, जो पतन का कारण है।बीना मिश्रा ने रामायण के चरित्रों को काव्य में ढालकर परिवार का महत्व बताया। बीरेन्द्र श्रीवास्तव ने समाज और देश की ईकाई परिवार को बताया।
कार्यक्रम में शिक्षाविद्, समाजसेवी, बुद्धिजीवी और युवाओं के संग काशीनाथ पाण्डेय, आरडी शुक्ला, शिवकुमार पांडेय, छठ कुमार शुक्ला, आर सी त्रिपाठी, जानकी शरण शुक्ला, प्रणव दत्ता, प्रकाश चन्द्र शर्मा जी,राकेश तिवारी, केसर सिंह, बीना मिश्रा, राम दयाल शुक्ला, शिवकुमार पांडेय, जानकी शरण शुक्ला, टीएन शुक्ला, लक्ष्मी नारायण दीक्षित ने भी अपने विचार व्यक्त किए।



