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ऐसे सुप्रीम कोर्ट की क्षय हो!

नागरिक परिक्रमा

संजय पराते की राजनैतिक टिप्पणी

मासिक धर्म पर महिलाओं को अवकाश दिए जाने की एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जायमाल्या बागची की पीठ ने कहा है कि इससे महिलाओं के रोजगार की संभावनाओं पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, क्योंकि ऐसी बाध्यताओं के चलते मालिक व नियोक्ता रोजगार में महिलाओं को नियुक्त करने से वंचित कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह अवधारणा संविधान में निहित एक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के विरुद्ध है, शोषण की प्रक्रिया और रूढ़िवादी विचारों को मजबूत करने वाली है और इसलिए सरासर महिला विरोधी टिप्पणी है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की यह पहली बार की गई महिला विरोधी टिप्पणी नहीं है। इससे पहले इसी पीठ द्वारा घरेलू कामगार महिलाओं को न्यूनतम मजदूरी देने के लिए कानून बनाने के लिए दायर की गई याचिका को भी खारिज करते हुए टिप्पणी की थी कि घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम पारिश्रमिक का कानून बनाने का मतलब होगा कि ऐसे लोगों को काम मिलना बंद हो जाएगा।

संविधान का अनुच्छेद-14 और अनुच्छेद-21 हमारे देश के नागरिकों को समानता और गरिमा पूर्ण जीवन जीने का अधिकार देता है। इस अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास यह अधिकार है कि वह केंद्र और राज्य सरकारों को ऐसे नीतिगत विषयों पर नीति या कानून बनाने का आदेश दे सकती है। लेकिन उक्त दोनों याचिकाओं की खारिजी से ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस अधिकार को त्याग दिया है। इसके पहले खाद्यान्न सुरक्षा, मध्यान्ह भोजन सहित न जाने कितने विषय हैं, जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को नीति बनाने का आदेश दिया था।

महिलाओं के हित में दाखिल जनहित याचिकाओं को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जिन तर्कों का सहारा लिया है, वे अत्यंत ही आपत्तिजनक है। यदि इन तर्कों का सहारा लिया जाता, तो अतीत में इस दुनिया से न तो गुलामी की व्यवस्था का खात्मा होता और न ही बंधुआ गुलामी खत्म होती, न तो मजदूरों को 8 घंटे के काम का अधिकार मिलता और न ही न्यूनतम मजदूरी पाने का अधिकार। ये सभी अधिकार इस दुनिया और हमारे देश के लोगों को एक समतापूर्ण और शोषणविहीन समाज के निर्माण के संघर्ष के क्रम में ही मिले हैं और एक सभ्य समाज की ओर बढ़ने के लिए यह संघर्ष आज भी जारी है। इन संघर्षों ने मेहनतकशों को जिस अनुपात में गुलामी और शोषण की बेड़ियों से मुक्त किया है, उसी अनुपात में शोषक वर्ग के सकल मुनाफों पर भी चोट की है।

समानता के अधिकार को तब तक सुनिश्चित नहीं किया जा सकता, जब तक कि हमारे समाज के विशेष रूप से कमजोर तबकों और लोगों की विशेष आवश्यकताओं को पूरा नहीं किया जाता। इसीलिए संविधान विकलांगों की विशेष देखभाल करने का निर्देश सरकारों को देता है। ठीक इसी प्रकार, जो लोग घरों में काम करते हैं, आठ घंटे काम करने के बाद उनको जीवन निर्वाह योग्य न्यूनतम मजदूरी प्राप्त हो, इसकी निगरानी संविधान की रक्षक सुप्रीम कोर्ट और सरकारें नहीं करेंगी, तो और कौन करेगा? क्या इन घरेलू मजदूरों के शोषण और उनको बदतर स्थिति में ही जीवन यापन करने की इजाजत इस आधार पर दी जा सकती है कि इससे इन घरों के मालिकों पर आर्थिक चोट पहुंचेगी?

मासिक धर्म के मामले में भी यही बात है। प्राकृतिक रूप से महिलाओं की शारीरिक संरचना पुरुषों से भिन्न होती है, विशेषकर प्रसव के मामले में। इसलिए महिलाओं की शारीरिक संरचना को ध्यान में रखते हुए यदि उनकी शिक्षा और रोजगार के संबंध में विशेष प्रावधान नहीं किए जाएंगे, तो महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता की बात केवल जुबानी और कागजों तक ही सीमित रह जाएगी। इसलिए महिलाओं को मुफ्त पैड देने और मासिक धर्म के दिनों में उन्हें विशेष अवकाश देने की माग पर एक बड़ा आंदोलन खड़ा होता दिख रहा है, ताकि वे इन दिनों थकान, बुखार, उल्टी, भंयकर दर्द, अत्यधिक रक्तस्राव जैसी स्वास्थ्य समस्याओं में आराम कर सकें।

जापान, इंडोनेशिया, जांबिया, स्पेन, दक्षिण कोरिया और चीन सहित दुनिया के बहुत से देशों में मासिक धर्म के दिनों में महिलाओं के लिए अवकाश की व्यवस्था पहले से ही मौजूद है। दुनिया मातृत्व अवकाश से आगे बढ़कर पितृत्व अवकाश की ओर भी बढ़ रही है। भारत में भी बिहार और कर्नाटक में मासिक धर्म के दिनों में अवकाश दिया जा रहा है। कुछ निजी कंपनियां जैसे जोमैटो, स्विगी, एकर इंडिया, एलएनटी, ओरिएंट इलेक्ट्रिक आदि भी मासिक धर्म पर अवकाश की सुविधा प्रदान कर रही है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का यह मानना कि इस सुविधा की मांग पर करने पर नियोक्ता महिलाओं को रोजगार नहीं देंगे, असंगत और तथ्यों से परे है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के जीवन से जुड़े एक बहुत बड़े अधिकार के मामले में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर मासिक धर्म अवकाश के लिए कानून का बनना आज की सबसे बड़ी जरूरत है, क्योंकि यह कदम पुरुषों और महिलाओं के बीच लैंगिक भेदभाव दूर करने और समानता की ओर बढ़ने वाला कदम है।

मोदी राज में जिस तरह बड़ी तेजी के साथ संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता का क्षरण हो रहा है, सुप्रीम कोर्ट भी उससे अछूता नहीं है। दरअसल, हमारे देश में संघी गिरोह जिस सांप्रदायिक-कॉर्पोरेट राज को आगे बढ़ा रहा है, वह इस देश के नागरिकों के बुनियादी अधिकारों और मानवाधिकारों को कुचलकर ही आगे बढ़ सकता है। यही कारण है कि पूरी कोशिश यही हो रही है कि अधिकार प्राप्त नागरिकों को आज्ञपालक प्रजा में तब्दील कर दिया जाएं, ताकि वे कोई सवाल खड़े न करें, किसी भी प्रकार के अधिकारों की बात न करें और बिना किसी ना-नुकूर के मालिकों की तिजोरियों को भरने का ‘राष्ट्रीय कर्तव्य’ पूरा करते रहे। आज्ञापालक प्रजा असहमति व्यक्त नहीं करती, केवल कर्तव्य का पालन करती है। वह देशद्रोही नहीं, पूरी तरह राष्ट्रभक्ति का अंधानुसरण करती है। पूंजीवाद की कॉर्पोरेट व्यवस्था में नागरिक केवल ‘माल’ होते है, जिनकी मुनाफा पैदा करने के यज्ञ में आहुति ही दी जानी है।

राहुल सांकृत्यायन होते, तो यही कहते कि : ऐसे सुप्रीम कोर्ट का क्षय हो!

 

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