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कानून के हाथ लंबे हैं या दबंगों के पत्थर? एक डरी हुई माँ का अधूरा इंसाफ

अपराधियों का सीना चौड़ा और बेटियों में खौफ

लखनऊ। ठाकुरगंज राजधानी की सड़कों पर महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े होर्डिंग्स शायद धूप में फीके पड़ गए होंगे, तभी तो ठाकुरगंज के खिल्ली चौराहे पर मर्दानगी का एक नया और वीभत्स अध्याय लिखा गया। घटना महज़ इतनी थी कि आशा नाम की एक महिला के घर की गैस खत्म हो गई थी। वह अपनी दो बेटियों भारती और आरती के साथ बाहर नाश्ता करने निकली थी, पर उसे क्या पता था कि चौराहे पर कुछ सूरमा हाथ में पत्थर लिए उसकी मर्यादा का नाश्ता करने को बेताब बैठे हैं।

रवि, राजू, कन्हैयालाल और उनके पूरे कुनबे ने मिलकर जो पराक्रम दिखाया, वह वाकई हैरतअंगेज है। एक अकेली महिला और उसकी दो जवान बेटियों को घेरकर भद्दी गालियां देना, उनके बाल पकड़कर जमीन पर घसीटना और फिर ईंट-पत्थरों से उन पर प्रहार करना, यह सब किसी फिल्म का विलेन वाला सीन नहीं बल्कि हमारे सभ्य समाज की असलियत है। आखिर कन्हैयालाल के दामाद और उनके साथियों ने यह तो सिद्ध कर ही दिया कि जब तक समाज में ईंटें मौजूद हैं, तब तक किसी बेटी का बाहर निकलना एक दुस्साहस ही माना जाएगा।

हैरानी की बात यह है कि जब राहगीरों ने बीच-बचाव की कोशिश की तो इन शूरवीरों का सीना और चौड़ा हो गया। सरेआम जान से मारने की धमकी दी गई, परिवार को खत्म करने का ऐलान हुआ और अंततः जीत उसी दहशत की हुई जो आज आशा और उसकी बेटियों की आँखों में साफ देखी जा सकती है। अपराधी आज भी सीना तानकर घूम रहे होंगे, जबकि वह पीड़ित परिवार अपने ही घर की चारदीवारी में कैद होने को मजबूर है।
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अक्सर कहा जाता है कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, लेकिन क्या वे इतने लंबे हैं कि ठाकुरगंज की गलियों में छिपे इन हमलावरों के गिरेबान तक पहुँच सकें? या फिर दबंगों के फेंके हुए पत्थर कानून की इन भुजाओं से कहीं ज्यादा भारी पड़ने वाले हैं? आशा ने अपनी तहरीर में न्याय की गुहार लगाई है, लेकिन न्याय की चक्की की धीमी रफ्तार और इन दबंगों का रसूख, कहीं इस मामले को भी एक साधारण मारपीट की फाइल बनाकर दफन न कर दे।

ठाकुरगंज पुलिस के पास अब यह प्रार्थना पत्र है। देखना यह है कि क्या खाकी की हनक इन ईंट-पत्थर के शौकीनों तक पहुँच पाती है या फिर कार्यवाही की फाइल भी उसी ठंडे बस्ते में जाएगी जहाँ अक्सर न्याय की उम्मीदें दम तोड़ देती हैं। आखिर जब तक समाज में ऐसे वीर खुले घूमेंगे, तब तक किसी बेटी का बाहर निकलकर नाश्ता करना एक जानलेवा जोखिम ही बना रहेगा।

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