नवाबी शासन से पहले नवाबी शासन के दौरान

अवथ इतिहास विद् डा०योगेश प्रवीन के लिखे इतिहास के अनुसार लखनऊ के मोहल्लों का इतिहास समझने के लिए मुहल्लो को दो भागों मे बांट दें तो इसे आसानी से समझा जा सकता है।
लखनऊ : नवाबी शासन से पहले
नवाबी शासन के दौरान
के. सरन
लखनऊ को अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र लक्षमण ने बसाया था तभी से लक्षमण टीला यहाँ है।
लखनऊ का नाम पहले लखनौ” था उसी ज़माने में मुगलो ने यहां टक्साल बनाई थी जिसमें ढाले गए सिक्कों पर इस नाम का जिक्र भी था l
पांडव कुल के राजा जनमेजय के पुरोहित जगदेव ने जुग्गौर बसाया प्राचीन काल की बस्तियों में ब्राह्मण कायस्थ राजपूत और अन्य हिन्दुओं का निवास था।अमौसी कनौसी देव- पुर पारा, गऊ घाट पिपरा घाट ,भोला -खेडा, केसरी खेडा, हंसाखेडा, दरोगा खेडा आदि मुहल्ले हिन्दु राजाओं ने नवाबो के शासन से पहले बसाया था यानी जहां अब आलमबाग का अवध चौराहा है उसके पश्चिम और दक्षिण भाग पर बसे ये मुल्ले (तब गांव)पहले बसे।निगोहा,मलिहाबाद,मडियांव आदि राजा बिजली पासी के 12 कच्चे किले थे जिनमे से एक के अवशेष ही अब बाकी हैं जो वर्तमान मे आशियाना के पास है। शेष किले पुराना किला, गढी कनौरा , गढी जिन्दौर ,आदि नाम से याद किये जाते हैं ।जब किले नहीं रहे तो उनके पास बस्तियां बसीं जो मोहनलाल गंज और नगराम के नाम से जानी जाती हैं। काकोरी भी उसी जमाने मे नवाबों से पहले के पासी राजा ककोटक का बसाया हुआ है।
योगेश जी के अनुसार -दसवी सदी में रजपसियों का मुकाबला सैयद सालार ग़ाज़ी से हुआ। 12-वी सदी में बख्तियार खिलजी ने रजपसियों से मुकाबला किया।इसी के साथ मुस्लिम का लखनऊ आना और बसना शुरू हो गया था।
शेखजादों ने गोमती किनारे के मच्छी -भवन किला पर कब्जा किया और इसकेआसपास छाछी- कुआं तक शेख बसे। शेखों के जमाने मे सूफी फकीरो का लखनऊ मे आना जाना बढा तो उनके नाम से पीर जलील (गोला गंज) पीर बुखारा,(चौक) रौजा बाग(राजेन्द्र नगर ,मे )तकिया अंगारा शाह( बाद मे खवासपुरवा)तकिया ताराशाह (माडल हाऊस मे) सुबहान नगर और गौसनगर बसे।
सल्तनत काल मे इल्तुतमिश ने कसमण्डी बसाया ।
मुहम्मद तुगलक के समय सल्तनत काल मे ही चौक की पहली मस्जिद बनी जो “बिसातियों की मस्जिद” कहलाती है।
सल्तनत काल के बाद मुगल काल आया।मुगल काल मे
1540 मे बादशाह हुमायूं जौनपुर में शेरशाह सूरी से हारकर भागता हुआ लखनऊ आया था।
15 वीं सदी मे भी यहाँ बहुत अच्छी आबादी थी।
1590 मे मुगल सम्राट अकबर ने शासन व्यवस्था दुरूस्त करने के लिए पूरे देश को 12 प्रांतों मे बाटा था।
तब अवध नाम से भी प्रांत बना जिसकी राजधानी लखनऊ थी।तभी बिजनौर के मनसबदार अब्दुरर्हीम शाही को लखनऊ की जागीर मिली और वे गवर्नर नियुक्त हुए।



