देवों की भाषा कहलाने वाली संस्कृत भाषा का महत्व

लखनऊ : कुर्सी रोड स्थित आइडियल डिग्री कॉलेज में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान एवं यशोराज ट्रस्ट के संयुक्त तत्वाधान में संस्कृत भाषा के नए आयाम विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें मुख्य वक्ता डॉ ममता शुक्ला, अश्वनी शर्मा, माया गुप्ता, सुमित, राजेश उपस्थित रहे।

डॉ ममता शुक्ला ने कहा कि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी कही जाती है। भारत की सांस्कृतिक पहचान अगर पूरी दुनिया में है, तो उनमें से एक संस्कृत भाषा भी है। जिसे हम देव भाषा भी कहते हैं। क्योंकि इसको भगवान ब्रह्मा जी ने उत्पन्न किया था। वेदों की रचना इसी भाषा में की गई क्योंकि यह शुद्धता का भी प्रमाण है। इसके आंचल से ही हिन्दी, पाली, प्राकृत आदि कई भाषाएं विकसित हुईं हैं, यह भाषा संस्कृति की तरह व्यापक है अनेक वेद, उपनिषद, वेदांग आदि की विषयवस्तु संस्कृत में ही वर्णित है। संस्कृत भाषा हिन्दू धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म और सिख धर्म में संचार का पारंपरिक साधन रही है।

अश्वनी शर्मा ने कहा कि इतिहासकार अलब-ए-रूनी ने संस्कृत भाषा की विशेषता आदि पर खूब चर्चा की है। इसी प्रकार इतिहासकार विल डूरान्ट ने लिखा है कि ‘भारत की मातृभूमि कई प्रजातियों की जन्मदात्री रही है और संस्कृत यूरोपीय भाषाओं की जननी थी। संस्कृत साहित्य को प्राचीन कविता, नाटक और विज्ञान के साथ-साथ धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों में इस्तेमाल होने वाले विशेषाधिकार भी प्राप्त है।

माया गुप्ता ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृति को समृद्ध बनाए रखने में इस भाषा का योगदान अतुलनीय है। यह जितनी प्राचीन है उतनी आधुनिक और वैज्ञानिक भी। संस्कृत भाषा के सार्वभौमिक स्वरूप एवं व्यापकता के कारण वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।



