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माजरा राहुल-अडानी का नहीं था ! सुप्रीम कोर्ट ने तख्ता-पलट रोका !!

के. विक्रम राव

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गौतम अडानी के विरुद्ध याचिका खारिज करने के बाद कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठते हैं। पहला तो यही कि फिसलकर नीचे गिरे अडानी कंपनी के शेर ऊंचाई पर गए। मुकेश अंबानी को पछाड़कर अडानी फिर सबसे अमीर बन गए।
मगर सर्वाधिक चिंता की बात राष्ट्रीय संदर्भ में यह है कि इस समस्त अडानी-राहुल-मोदी प्रकरण की शुरुआत के पीछे लक्ष्य क्या था ? हिंडनबर्ग वाली रपट आखिर किसने, किस इरादे से और क्यों प्रचारित की थी ? इससे माहौल बन रहा था कि भारत के प्रधानमंत्री एक उद्योगपति की कठपुतली बन गए हैं।


इस पूरी पटकथा का खलनायक है जॉर्ज सोरोस, एक अमेरिकी। बात 16 फरवरी को म्यूनिख में हुए सुरक्षा सम्मेलन की है जहां सोरोस ने प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय कारोबारी गौतम अडानी के बीच संबंधों की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि अडानी के स्टॉक-हेरफेर पर मोदी चुप हैं। सोरोस ने दावा किया था कि अडानी समूह में हुई उथल-पुथल भारत में “लोकतंत्र के बचाव का दरवाजा खोल सकती है।” यूं तो अडानी विवाद पर सरकार की चुप्पी को लेकर विपक्षी दलों को सवाल उठाने का पूरा अधिकार है। लेकिन किसी भी विदेशी कारोबारी या वहां की सरकार को इसका हक़ कतई नहीं है। जॉर्ज सोरोस पर ये आरोप भी लग चुके हैं कि उन्होंने अमेरिका, रूस और चीन में राष्ट्रवादियों के खिलाफ लड़ने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च किए हैं। बीजेपी का आरोप भी है कि जॉर्ज सोरोस से जुड़े लोग कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ में शामिल हुए थे। बीजेपी नेताओं ने ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशन’ नाम के एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) का नाम लिया है। इस एनजीओ को जॉर्ज सोरोस से धन मिलता है। इसके उपाध्यक्ष सलिल शेट्टी कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ में शामिल हुए थे।
मोदी काबीना की मंत्री स्मृति ईरानी ने सोरोस के इरादों का सम्यक रीति से उजागर किया है। ईरानी ने दावा किया कि सोरोस ने भारत समेत विश्व की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में हस्तक्षेप के लिए एक अरब डॉलर से अधिक का कोष बनाया है। उन्होंने कहा : “एक विदेशी ताकत जिसके केंद्र बिंदु में जॉर्ज सोरोस हैं। वह हिंदुस्तान के लोकतांत्रिक ढांचे के पर चोट करेंगे। वह प्रधानमंत्री मोदी को अपने वार का मुख्य बिंदु बनाएंगे। वह हिंदुस्तान में अपनी विदेशी ताकत के अंतर्गत एक ऐसी व्यवस्था बनाएंगे जो हिंदुस्तान के हितों का नहीं बल्कि उनके हितों का संरक्षण करेगी।”
तो आखिर यह जॉर्ज सोरोस है क्या बला ? विदेश मंत्री एस. जयशंकर के शब्दों में : “अमेरिका के कारोबारी जॉर्ज सोरोस बूढ़े, अमीर, जिद्दी, पूर्वग्रही और खतरनाक है, जो कहानियां गढ़ने में माहिर हैं। जो न्यूयॉर्क में बैठकर अब भी यह सोचते हैं कि दुनिया इनके हिसाब से चले। इस 92-वर्षीय जॉर्ज सरोज ने कहा था कि गौतम अडानी के कारोबारी साम्राज्य में जारी उठापटक सरकार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पकड़ को कमजोर कर सकती है। यह भी कहा था कि वह (मोदी) लोकतांत्रिक देश के नेता हैं, लेकिन खुद लोकतांत्रिक नहीं है।
यह अमेरिकी अरबपति कारोबारी भारतीय नेता नरेंद्र मोदी से खुन्नस रखता है। सोरोस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों के धुर आलोचक हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया था कि मोदी के नेतृत्व में भारत तानाशाही व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। सोरोस ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने और नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का भी खुलकर विरोध किया था। जब हिंडनबर्ग रिसर्च ने जनवरी में अदानी के खिलाफ रिपोर्ट जारी की थी तो सोरोस काफी मुखर हो गए थे। उन्होंने कहा कि अडानी का पीएम मोदी के साथ इतना घनिष्ठ संबंध है कि दोनों एक दूसरे के लिए जरूरी हो गए हैं।
हंगरी में अमीर यहूदी परिवार में जन्मे जॉर्ज सोरस अमेरिकी नागरिक हैं। उन्होंने 1984-89 के दौरान हंगरी में हुए सत्ता परिवर्तन में अहम भूमिका निभाई थी। उनको शुरुआत से ही मजबूत सरकारों को अस्थिर करने का शौक रहा है। अमेरिका में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को 2004 में दोबारा जीतने से रोकने चले थे। अभियान को चंदे में एक बड़ी रकम दी थी। सन् 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप को हराने के लिए भी उन्होंने अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी को 20 करोड डालर से ज्यादा का धन दिया था।
जॉर्ज सोरोस पर कई गंभीर आरोप भी लगे हैं। बैंक ऑफ़ इंग्लैंड को 1992 में तबाह कर खुद की जेब भरने का आरोप लगा। अपनी ओपन सोसाइटी फाउंडेशन की मदद से वह करीब 100 देशों में वे सक्रिय हैं। जॉर्ज बुश को हराने के लिए उन्होंने 125 करोड रुपए खर्च किए थे। इतना ही नहीं उन्होंने मीडिया कंपनी फॉक्स न्यूज को बर्बाद करने के लिए 10 लाख डॉलर लगा दिए थे। इसी तरह ब्रेक्जिट के खिलाफ अभियान चलाने में चार लाख पाउंड खर्च कर दिये। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ठग कहा था।
अब एक त्रिभुज नजर आता है इस संपूर्ण अडानी-मोदी-राहुल गांधी वाले प्रकरण में। सोरोस इससे जुड़कर इसे चार आयाम का बना देते हैं। हिंडनबर्ग जांच रिपोर्ट तो एक बहाना था। भारतीय गणतंत्र की निर्वाचित सरकार को डिगाने का। भला हो सुप्रीम कोर्ट का कि इस वैश्विक साजिश को नाकाम कर दिया। अब भारत सरकार पर है कि जॉर्ज सोरोस तथा उनके लोगों द्वारा नई दिल्ली में रचे गए षडयंत्रों को उजागर करे। उन्हें ढायें, नाकाम करें।

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