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संत का धरा पर आना और धरा से जाना, दोनों ही मुबारक होता है’

महान निरंकारी सन्त प्रेम नारायण लाल स्मृति में ऑनलाइन कवि सम्मेलन व मुशायरा एवं उनके जीवन-दर्शन पर आधारित चित्र प्रदर्शनी आयोजित किया जाएगा

लखनऊ : इतिहास गवाह है कि आदिकाल से धरती पर ही संतों का आगमन होता रहा है। मानव–मात्र को सदमार्ग को अपनाकर गृहस्थ में रहते हुए मानव जीवन के परम लक्ष्य ईश्वर निराकार की प्राप्ति हेतु सदा ही संतों–महापुरुषों का अनवरत प्रयास रहा है। एक ओर जहां साकार रूप में सद्गुरु समय–समय पर आते रहे हैं, वहीं वो अपने साथ अपने सहायक रूप में अपने अन्नय भक्तों को भी संग लाते रहे हैं, जिसका प्रमाण हमारे धार्मिक वेद–ग्रंथों में भी मिलता है। ऐसे संत सदैव एक लक्ष्य के तहत धरा पर आते हैं, फिर उसकी पूर्ति होते ही दुनियां को अलविदा कह जाते हैं। इस तरह से ऐसे जीवन हमेशा के लिए प्रेरणा के स्रोत बन जाते हैं और मुबारक कहलाते हैं अथवा यूं कहें कि ऐसे संतों का धरा पर आना और धरा से जाना दोनों ही मुबारक होते हैं। ऐसे संतों कहीं और जाते नहीं बल्कि सदा के लिए अमरत्व को पाकर इस निराकार में सूक्ष्म रूप में समाहित हो जाते हैं और सदा के लिए प्रेरणा–स्रोत बन जाते हैं। ऐसे ही एक सहायक दूत के रूप में निरंकारी संत श्री प्रेम नारायण लाल जी को आज उनके 7वें पुण्य–तिथि पर सप्रेम संस्थान के सदस्यों द्वारा उनके जीवन को याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। श्री प्रेम नारायण लाल जी ने अपने सदगुरु की पूर्ण समर्पण भाव से युक्त होकर गुरु–भक्ति में मगन होकर न केवल स्वयं का कल्याण किया अपितु सदगुरु से प्राप्त ब्रह्मज्ञान तथा अमर सत्य–संदेश को यथाशक्ति जनमानस को जागृति प्रदान करने में जीवन–पर्यन्त अमूल्य योगदान भी दिया।

उनके मूल निवास स्थान प्रेमनगर बिंद्राबाज़ार आजमगढ़ में उनकी धर्मपत्नी माता सरोज कुमारी अस्थाना के ममतामयी सानिध्य में आज अनेक स्थानीय लोग,समाजसेवी व गणमान्य महानुभाओं ने एकत्र होकर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किया। इस अवसर पर डॉ श्यामनयन, टूअर राम, प्रकाश सहित अन्य लोग उपस्थित रहे। उनके बड़े सुपुत्र डॉ. पुष्पेंद्र कुमार अस्थाना “पुष्प” के वाराणसी आवास, दूसरे सुपुत्र इंजीनयर धर्मेंद्र कुमार अस्थाना के नोएडा आवास और छोटे सुपुत्र चित्रकार भूपेंद्र कुमार अस्थाना के लखनऊ आवास पर विशेष प्रार्थना सभा करके श्री प्रेम के महान जीवन-दर्शन व सुकृत्यों को याद किया गया।
ज्ञातव्य हो कि श्री प्रेम बचपन से ही एक अलौकिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। 1944 में जन्में श्री प्रेम को 19 अक्टूबर 1975 को एक दिन जब दिव्य अनुभूति प्राप्त हुई तो उसके बाद से उनका सम्पूर्ण जीवन अध्यात्म व समाज को पूर्ण समर्पित हो गया। तब से आजीवन उन्होंने घर से लेकर समाज के हर वर्ग तक सहज व सरल सुख सुकून व शांति पहुंचाने में अपना दिन रात समर्पित कर दिया। उनका महाप्रयाण आज ही के दिन 21नवंबर 2016 को हुआ था।
भूपेंद्र अस्थाना ने बताया कि उनको समर्पित सप्रेम संस्थान द्वारा उनके पावन स्मृति में आगामी 10 दिसम्बर को एक अखिल भारतीय ऑनलाइन कवि सम्मेलन व मुशायरा,17 दिसम्बर को वाराणसी के गुरुदेव हरदेव ट्यूटोरियल द्वारा एक बाल प्रतियोगिता तथा 24 दिसम्बर को आजमगढ़ में रोहुआ (वाराणसी-आजमगढ़ जी.टी. मार्ग) स्थित निरंकारी भवन में एक विशाल सत्संग समारोह एवं उनके जीवन-दर्शन पर आधारित चित्र प्रदर्शनी आयोजित किया जाएगा। युवा कवि रोहित अस्थाना ने कहा कि “प्रेम”, यह केवल एक शब्द नहीं अपितु ‘एक जीवन’ है, जो स्वयं में पूर्ण है एवं जिससे जुड़कर इस अपूर्ण संसार का मनुष्य भी पूर्ण हो जाता है। प्रेम अव्याख्यायित है…। प्रेम अथाह सागर है, यह इतना गहरा है कि मनुष्य इसकी जितनी भी गहराई तक चला जाए, वो इसकी थाह को पा नहीं सकता। यह संसार भी प्रेम का ही एक विस्तार है…। प्रेम अनुभव है, एहसास है, यह एक परम आनंद की अवस्था है, वास्तव में प्रेम, ‘परमात्मा’ है और जिस मनुष्य ने इस प्रेम को अनुभव कर लिया, इस परमात्मा को पा लिया, तो उसकी सारी जिज्ञासा शांत हो गई, उसके सारे प्रश्नों के उत्तर उसे मिल गए और उसका जीवन सार्थक हो गया। इस धरती पर ऐसे कई मनुष्यों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने जीवन में इस प्रेम को अनुभव किया है, जिन्होंने अपने जीवन को ही प्रेम का पर्यायवाची बना दिया है, जिन्होंने इस परमपिता-परमात्मा के साक्षात्कार द्वारा आत्म-साक्षात्कार किया है और जिन्हें ये दुनियाँ आज संत, महात्मा, ऋषि अथवा मुनि कहकर पुकारती है। ऐसे ही एक संत थे श्री. “प्रेम नारायण लाल” जी। इस अवसर पर देशभर से प्रेम नारायण लाल जी से जुड़े उनके शागिर्द लोगों ने अपने भावपूर्ण शब्दों में श्रद्धांजलि अर्पित की।

– भूपेंद्र अस्थाना
9452128267,7011181273

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