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वर्ल्ड हेल्थ डे के उपलक्ष्य में सेफ सोसाइटी की ओर से आयोजित हुआ “सम्मेलन” कार्यक्रम

लखनऊ: वर्ल्ड हेल्थ डे के उपलक्ष्य में सेफ सोसाइटी की ओर से बालिकाओं और महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि महापौर  संयुक्ता भाटिया ने कहा कि हमारे समाज में अभी भी महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति उपेक्षा का रवैया अपनाया जाता है। महिलाएं अक्सर अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह होती हैं। जब तक स्वास्थ्य को लेकर बहुत ज्यादा दिक्कत न हो तो वे चिकित्सक के पास भी नहीं जाती हैं। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य को बिल्कुल नजरअंदाज कर दिया जाता है। खासतौर पर अगर हम ग्रामीण परिवेश की बात करें तो यहां बचपन से ही एक लड़की को मानसिक रूप से कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। किशोरावस्थ्या में शरीर में होने वाले बदलाव से लेकर शादी और बच्चों की जिम्मेदारी और अपेक्षाओं पर खरे उतरने को लेकर वे अवसादग्रस्त होने लगती हैं। ऐसे में हमें उनके मानसिक स्वास्थ्य पर खास ध्यान देना चाहिए।

सेफ सोसायटी के महिला आजीविका की कार्यक्रम प्रबंधक विभा मिश्रा ने कहा कि ग्रामीण परिवेश में अधिकतर लोग आर्थिक रूप से संपन्न नहींं होते हैं। ऐसे गरीब परिवार की महिलाओं के ऊपर घर चलाने के साथ साथ पारंपरिक अपेक्षाएं, स्नेह की कमी और अपने पति के साथ संघर्ष, विधवा और तलाक और अपनी बेटियों के लिए दहेज प्रदान करने में कठिनाई सहित कई कारण होते हैं। यदि हम महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाए और उनके मानसिक और शारीरिक तौर पर स्वस्थ्य रहने के प्रति जागरूक करें तो हम समाज में काफी बदलाव ला सकते हैं।

कार्यक्रम में मौजूद मेंटल हेल्थ काउंसलर दीपाली श्रीवास्तव ने कहा कि हिंसा की शिकार महिलाओं में अवसाद, चिंता और मनोदैहिक लक्षणों सहित मानसिक बीमारी का खतरा अधिक होता है । भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा एक आम सामाजिक समस्या है। वन स्टेप सेंटर और वूमेन हेल्पलाइन में महिलाओं संबंधित हिंसा के काफी मामले आते हैं। जिसमें से अधिकतर विवाहित महिलाओं के होते हैं। आज की तारीख में भी लगभग 90 फीसद ग्रामीण आबादी मानसिक स्वास्थ्य से वंचित है। अभी भी लोग मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित इलाज को पागलपन से जोड़कर देखते हैं। जिसकी वजह से वो मनोरोग विशेषज्ञ के बजाय झाड़फूंक के चक्कर में फंसे रह जाते हैं। ऐसे में अवसाद ग्रस्त महिला या किशोरियों को पागल या भूतप्रेत का साया बताकर कई बार जान से मार भी दिया जाता है।
बीकेटी की एलएमओ ने मेंस्ट्रूअल और रेप्रोडक्टिव हेल्थ को लेकर कहा कि भारत में प्रसवोत्तर अवसाद 11-23% महिलाओं को प्रभावित करता है। इसके पीछे का कारण गरीबी, प्रसवपूर्व मनोरोग रुग्णता, खराब वैवाहिक और पारिवारिक संबंधों, समर्थन की कमी, वैवाहिक हिंसा और बालिकाओं के जन्म होता है। साथ ही किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक बदलाव तथा सुरक्षित , स्वच्छ मासिक धर्म सम्बन्धी आचरण का अभाव, प्राकृतिक रूप से होने वाली शारीरिक प्रक्रिया के चारों ओर एक जटिल व भारी सन्नाटा खड़ा कर दिया गया है । इसलिए बच्चियों के मन में पीरयड के प्रारम्भ तथा इससे सम्बंधित आचरण के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण बिठाने की आवश्यकता है । लड़कियों / महिलाओं द्वारा प्रयुक्त अस्वस्थ मासिक धर्म सम्बन्धी व्यवहार आदि कारण से उनको आरटीआई (रीप्रोडक्टिव ट्रैक्ट इन्फ़ेक्शन ) , पीआईडी ( पेल्विक इन्फ़्लैमटॉरी डिज़ीज) हो सकती है। जिसकी वजह से आगे जाकर कई तरह की जटिलताएं हो सकती हैैं। सही समय पर इलाज न कराने से जान भी जा सकती है। इसलिए मासिक धर्म स्वच्छता को बच्चियों की स्वास्थ्य शिक्षा का अंग बनाया जाना अति आवश्यक है।

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