उत्तर-प्रदेशबड़ी खबर

व्यक्ति के आंतरिक भावनाओं को उजागर करता नाटक पार्क

लखनऊ। सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था श्रद्धा मानव सेवा कल्याण समिति, लखनऊ द्वारा भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय, नई दिल्ली के रिपेट्री ग्रान्ट वर्ष 2026-27 की प्रथम प्रस्तुति के रूप में आयोजित सुप्रसिद्ध नाट्य रचनाकार मानव कोल की नाट्यकृति पार्क का नाट्य मंचन नगर के वरिष्ठ रंग निर्देशिका अचला बोस परिकल्पना तुषार बाजपेयी शुभम के निर्देशन में स्थानीय अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, में किया गया। नाटक के कथानक के अनुसार मानव कौल की नाट्य रचना पार्क नाटक की शुरूआत एक साधारण से पार्क में होती है। यहाँ विभिन्न आयु, स्वभाव और पृष्ठभूमि के लोग आते हैं। कोई सुबह के सैर के लिए आता है तो कोई समय बिताने के लिए, कोई अकेलेपन से बचने के लिए तो कोई अपने भीतर चल रहे द्वन्द से कुछ देर राहत पाने के लिए, पहली दृष्टि में यह सभी पात्र एक दूसरे के लिए अपरिचित लगते हैं, लेकिन जैसे-जैसे संवाद आगे बढ़ते हैं, उनके भीतर छिपे अकेलेपन, असुरक्षा, इच्छाओं और अधूरेपन की परतें खुलने लगती हैं। नाटक में पात्रों के बीच होने वाले बातचीत सामान्य और रोजमर्रा की प्रतीत होती हैं, किन्तु इन्हीं साधारण संवादों के भीतर जीवन के गहरे प्रश्न छिपे हुए हैं। वे प्रेम, विश्वास, बिछड़ने, परिवार, समय, स्मृतियों और बदलते सामाजिक संबंधों पर चर्चा करते हैं। धीरे-धीरे दर्शक यह अनुभव करने लगता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर किसी न किसी प्रकार का खालीपन लिए हुए है। वे लोगों से घिरे होने के बावजूद स्वयं को अकेला महसूस करते हैं। नाटक यह भी दिखाता है कि आधुनिक जीवन की तेज गति में मनुष्य को संवेदनहीन बना दिया है। लोग एक दूसरे से बात तो करते हैं, पर वास्तव में एक दूसरे को सुनते नहीं। हर व्यक्ति अपनी पीड़ा, अपनी इच्छाओं और अपने संघर्षों में इतना उलझा है कि यह सामने वाले के मन तक पहुँच ही नहीं पाता। यही कारण है कि नाटक में मौन का भी उतना ही महत्य है. जितना संवाद का। कहानी के आगे बढ़ने के साथ-साथ पार्क एक ऐसे स्थान में बदल जाता है, जहां पात्र अपने वास्तविक व्यक्तित्व के साथ सामने आते हैं। ये अपने डर, असफलताएं, अधूरे सपने और रिश्तों की विफलताओं को स्वीकार करते हैं। कई बार वे स्वयं से प्रश्न करते हैं कि क्या जीयन केवल भाग-दौड़ का नाम है, य मनुष्य को अपने भीतर झाँकने का भी समय निकालना चाहिए। नाटक का अन्त किसी निश्चित समाधान के साथ नहीं होता है। मानय कौल दर्शकों को कोई अन्तिम उत्तर नहीं देते हैं। इसके बजाए यह उन्हें इस सोच के साथ छोड़ते हैं कि शायद हर व्यक्ति अपने जीवन के किसी न किसी पार्क में बैठा है। यहां यह दूसरों के बीच रहते हुए भी स्वयं को खोजने की कोशिश कर रहा है। यही इस नाटक की सबसे बड़ी विशेषता है कि दर्शकों को सोचने, आत्म मंथन करने और अपने जीवन से नाटक को जोड़कर देखने के लिए प्रेरित करता है। नाटक के मुख्य पात्र उदय की भूमिका में तुषार बाजपेयी, नरेश की भूमिका में विकास दुबे एवं मदन की भूमिका में ऋषि राज ने अपने-अपने भावपूर्ण अभिनय से रंग दर्शकों को अत्यधिक प्रभावित किया।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button