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1984 में जो हुआ, क्या वह लोकतंत्र की हत्या नहीं थी ? आज भी हजारों सिख परिवार न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं -: मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता

नई दिल्ली  : भाजपा द्वारा सिख संगठनों के साथ आयोजित “1984 सिख नरसंहार विरोधी मार्च” के मंच से बोली हुए केन्द्रीय मंत्री सरदार हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि मुझे याद है कि 42 साल पहले मैं जिनेवा में तैनात था। मेरे माता-पिता दिल्ली की जी.डी.ए. कॉलोनी में रहते थे। जब हिंसा शुरू हुई, तो मेरे कुछ हिंदू मित्रों ने उन्हें अपनी कार में सुरक्षित स्थान पर पहुंचाकर सुरक्षा दी। उन्होंने कहा कि दिल्ली में 2,733 लोग मारे गए। उन्हें बेहद निर्ममता से मौत के घाट उतारा गया। अगर आप देशभर के आंकड़े देखें, तो लगभग 3,325 लोगों की हत्या हुई थी। ये सरकारी आंकड़े हैं जिन्हे सिख समाज ने हमेशा अधूरा रिकॉर्ड माना है।

मैं सरकारी आंकड़ों के संदर्भ में एक बात बताना चाहता हूं। जब दिल्ली में लोग सिख परिवारों के घरों तक पहुंच रहे थे, तो वे मतदाता सूची देखकर नहीं जा रहे थे क्योंकि मतदाता सूची में हरनाम सिंह नाम का व्यक्ति मध्य प्रदेश का भी हो सकता है, हरियाणा का भी हो सकता है। वह जाट भी हो सकता है, राजपूत भी हो सकता है या पगड़ी पहनने वाला कोई अन्य व्यक्ति भी हो सकता है, लेकिन हमलावरों को शायद पहले से ही संबंधित लोगों की पहचान और जानकारी दी जा रही थी। उन्होंने कहा कि इससे स्पष्ट होता है कि ये घटनाएं अचानक गुस्से में हुई हिंसा नहीं थीं, बल्कि इनके लिए पूरी तैयारी की गई थी।

सरदार हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि सरदार मनमोहन सिंह जी का घर भी दिल्ली में था, यह हमलावर उनके घर तक भी पहुंच गए थे। उनका दामाद, जो हिंदू था, घर के बाहर खड़ा हो गया और उसने कहा कि यह मेरा घर है। भीड़ ने कहा था हमारी सूची के अनुसार तो यह किसी सिख का घर है, दामाद ने कहा लेकिन यहां ऐसा कोई व्यक्ति नहीं रहता और सबकी रक्षा की।

उन्होंने कहा कि आज एक शब्द का इस्तेमाल किया जाता है कि यह दंगा था। लेकिन ये दंगे नहीं थे। दंगे तब होते हैं, जब दो समूह आपस में लड़ते हैं। यहां दिल्ली में एकतरफा तरीके से 2,733 लोगों को बेहद निर्ममता से मार दिया गया। इसके लिए सही शब्द नरसंहार है। अंग्रेजी में इसे Genocide कहा जाता है। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी, जहां तक मुझे याद है, इसके लिए Crime Against Humanity यानी मानवता के विरुद्ध अपराध जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था।

आप समझ सकते हैं कि यह कितना गंभीर अपराध था। मैं समझता हूं कि कांग्रेस के लोगों को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। जब हम बच्चे थे और कोई शरारत करते थे, तो मां डांटते हुए कहती थीं कि तुम्हें अक्ल नहीं है, बाजार से खरीदकर ले आओ। इसी तरह अगर किसी भी मुद्दे पर कार्यक्रम के लिए कोई दूसरी तारीख चुनी जा सकती थी, तो क्या 1 नवंबर का दिन ही चुनना जरूरी था ?

सरदार हरदीप सिंह पुरी ने कहा की आज भी मैं समझता हूं कि हमारे समुदाय और देश ने 1984 में जो कुछ देखा, उसे पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है और न ही उसे लेकर पीड़ितों से सही तरीके से कांग्रेस द्वारा माफी मांगी गई है। इसलिए 1 नवंबर का दिन चुनना उचित नहीं था। बाकी सब ठीक है, लेकिन मेरा मानना है कि आने वाले वर्षों में भी हमें 42 साल पहले हुई उस त्रासदी को याद रखना चाहिए। यह हम सभी का व्यक्तिगत और सामूहिक कर्तव्य है कि हम उस घटना को कभी न भूलें।

सरदार पुरी ने कहा मेरे विचार से सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस तरह की हिंसा दोबारा कभी हिंदुस्तान में या दुनिया के किसी भी हिस्से में नहीं होनी चाहिए। मैं आपका अधिक समय नहीं लेना चाहता, क्योंकि हमारे बाकी वक्ताओं ने भी इस विषय पर विस्तार से अपनी बात रखी है। कार्यक्रम पहले ही एक घंटा विलंब से चल रहा है।

*दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता* आज रविवार को 1984 के सिख नरसंहार के पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने और उस भयावह त्रासदी की यादों को जीवित रखने को लेकर हरि नगर में आयोजित पदयात्रा में शामिल हुईं। इस पदयात्रा में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं, जनप्रतिनिधियों और हजारों की संख्या में सिख समाज के नागरिकों ने भाग लेकर 1984 के पीड़ित परिवारों के प्रति एकजुटता व्यक्त की। पदयात्रा के माध्यम से कांग्रेस से उस त्रासदी की जवाबदेही तय करने और दशकों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे परिवारों को न्याय दिलाने की मांग उठाई गई।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि आज संविधान की प्रति लेकर चलने और लोकतंत्र की दुहाई देने वालों से सिख समाज यह सवाल पूछ रहा है कि नवंबर 1984 में जो हुआ, क्या वह लोकतंत्र की हत्या नहीं थी? हजारों सिख परिवारों ने उस भयावह दौर में अपने परिजनों को खोया। आज भी अनेक माताएं, बहनें और परिवार उस दर्दनाक त्रासदी की यादों के साथ जी रहे हैं और न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने कांग्रेस नेतृत्व पर निशाना साधते हुए कहा कि 1984 में सिख समाज के साथ जो हुआ, उसकी जिम्मेदारी से कांग्रेस और गांधी परिवार बच नहीं सकते। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक मूल्यों के उल्लंघन का इतिहास देश ने अलग-अलग दौर में देखा है। वर्ष 1975 में आपातकाल और 1984 की सिख विरोधी हिंसा को याद करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि आज भी लोकतंत्र की बात करने वालों को पहले अपने अतीत और उस समय हुई घटनाओं पर जवाब देना चाहिए।

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि 1984 की हिंसा में अपने परिजनों को खोने वाले सिख परिवारों का दर्द आज भी कम नहीं हुआ है। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया, जिन महिलाओं ने अपने घर-परिवार उजड़ते देखे, उनके लिए न्याय की प्रतीक्षा आज भी एक अधूरा सवाल बनी हुई है। उन्होंने सवाल उठाया कि इतने वर्षों बाद भी पीड़ित परिवारों को वह न्याय और संवेदनशीलता क्यों नहीं मिली, जिसके वे हकदार हैं? कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने आज तक उनके दर्द को स्वीकार करने और उन्हें न्याय का भरोसा देने के लिए पर्याप्त संवेदनशीलता क्यों नहीं दिखाई?

मुख्यमंत्री ने कहा कि हरि नगर की यह पदयात्रा उन हजारों परिवारों की पीड़ा और न्याय की मांग को आवाज देने का प्रयास है, जिन्होंने 1984 में अपनों को खोया। इसमें शामिल सिख भाई-बहन कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों से जवाब मांग रहे हैं कि उनके साथ हुए अन्याय का हिसाब कब होगा और उन्हें पूर्ण न्याय कब मिलेगा। उन्होंने पदयात्रा में शामिल सिख समाज के नागरिकों और भाजपा कार्यकर्ताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह एकजुटता पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता का संदेश देती है। मुख्यमंत्री ने कहा कि देश की जनता उन सभी लोगों से जवाब मांगेगी, जो लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करते हुए समाज में अराजकता और विभाजन की स्थिति पैदा करने का प्रयास करते हैं।

*दिल्ली भाजपा अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा* ने 1984 के सिख नरसंहार को कांग्रेस की सुनियोजित साजिश बताते हुए कहा कि कांग्रेस के नेताओं ने स्वयं सड़कों पर खड़े होकर सिख परिवारों के घरों की पहचान की और नरसंहार को अंजाम दिलाया। एच.के.एल. भगत और सज्जन कुमार सहित कई कांग्रेस नेताओं की भूमिका इस घटना में सामने आई। उन्होंने कहा कि लगातार 72 घंटे तक सिखों का कत्लेआम किया गया। उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को अपनी आंखों के सामने जिंदा जलाए जाने की दर्दनाक घटना को भी याद किया।

श्री हर्ष मल्होत्रा ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि 1984 के नरसंहार की बरसी पर जानबूझकर कार्यक्रम आयोजित कर राहुल गांधी पीड़ित परिवारों के पुराने जख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह राजीव गांधी ने कहा था कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है, राहुल गांधी उसी मानसिकता को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गठित एस.आई.टी. के कारण 1984 के नरसंहार के दोषियों को सजा मिल सकी। यशपाल को मृत्युदंड और नरेश शेरावत को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। वहीं, दिल्ली में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने पीड़ित परिवारों के लगभग 250 सदस्यों को नौकरी दिलाई है और अब पीड़ित परिवारों की तीसरी पीढ़ी को भी नौकरी देने का निर्णय लिया है।

अंत में हर्ष मल्होत्रा ने बताया कि कल भी बंगला साहिब गुरुद्वारे तक दीप मार्च निकाला जाएगा। 1984 के नरसंहार की स्मृति में गुरुद्वारा बंगला साहिब में बनाए गए स्मारक तक पहुंचकर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। उन्होंने सभी माताओं और बहनों से अपील की कि वे कल सुबह 11 बजे अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर इस श्रद्धांजलि कार्यक्रम में शामिल हों।

दिल्ली सरकार में मंत्री सरदार मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा कि राहुल गांधी अपने पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए 1984 के सिख नरसंहार को लेकर राजनीति कर रहे हैं। 42 वर्ष पहले तत्कालीन कांग्रेस सरकार के शासनकाल में हजारों निर्दोष सिखों को घरों से निकालकर उनकी पहचान करने के बाद बेरहमी से मार डाला गया और उनके गले में टायर डालकर जिंदा जलाया गया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने जिन लोगों पर इस नरसंहार में शामिल होने के आरोप लगे, उन्हें सजा दिलाने के बजाय मुख्यमंत्री, मंत्री और बड़े पदों पर बैठाकर सम्मानित किया। इनमें सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर, एच.के.एल. भगत और धर्मदास शास्त्री जैसे नाम शामिल हैं। सिरसा ने कहा कि सिखों को न्याय दिलाने की दिशा में अटल बिहारी वाजपेयी, स्वर्गीय अरुण जेटली और सुषमा स्वराज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सिख नरसंहार के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए एसआईटी गठन की पहल की थी।

सिरसा ने 1984 के पीड़ित जुगेंद्र जी का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने गवाही देने की कीमत अपने जवान बेटे को खोकर चुकाई, जिसे आरोपों के अनुसार सज्जन कुमार के साथियों ने आग के हवाले कर दिया था। उन्होंने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का यह बयान कि *”जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है”*, सिख नरसंहार के संदर्भ में देखा बोला गया और इसकी आलोचना हुई कि इससे हिंसा को उचित ठहराने का संदेश गया। सिरसा जी ने राहुल गांधी से सवाल किया कि जिस कांग्रेस ने नरसंहार के आरोपों से घिरे नेताओं को संरक्षण और सम्मान दिया, वह आज किस मुंह से इंसाफ की बात कर रही है।

वरिष्ठ अधिवक्ता एवं 1984 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने वाले *अधिवक्ता एच. एस. फुल्का* ने कहा कि 1984 में जिस तरह से सेवानिवृत्त सैनिकों और 51 सेवारत सैनिकों की बेरहमी से हत्या की गई, वह बेहद गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण था। उन्होंने कहा कि यह हिंसा अचानक नहीं हुई थी, बल्कि इसके पीछे पहले से सुनियोजित साजिश थी। सिखों के घरों की सूचियां पहले ही तैयार कर ली गई थीं और पूरी योजना के तहत इस नरसंहार को अंजाम दिया गया था।

श्री फुलका ने कहा कि उस समय झूठा नैरेटिव गढ़कर 1 नवंबर को इतने बड़े नरसंहार को अंजाम दिया गया। आज भी उसी सोच के तहत झूठा नैरेटिव फैलाकर देश में अराजकता और अव्यवस्था पैदा करने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में सभी को सतर्क और चौकन्ना रहने की आवश्यकता है। उन्होंने पीड़ित परिवारों को सरकारी नौकरियां देने की पहल के लिए मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि पीड़ित परिवारों की कुछ अन्य मांगें भी हैं, जिन पर सैनी साहब ने पहल की है। उन्हें उम्मीद है कि मुख्यमंत्री इन सभी मांगों को भी पूरा करेंगी।

राज्यसभा सांसद सरदार विक्रमजीत सिंह साहनी ने कहा की मेरे अपने परिवार ने अनेक सदस्यों की हत्या का घाव सहा है और मैं मानता हूं की इतने वर्ष बाद दिल्ली में आई भाजपा सरकार से पीड़ित परिवारों को बहुत उम्मीद है। मैं मुख्य मंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता से अपील करता हूं की वह सिख पुनर्वास कॉलोनियों में रह रहे आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को पूर्ण न्याय सुनिश्चित करें।

दिल्ली सरकार के *मंत्री आशीष सूद* ने कहा कि राहुल गांधी और कांग्रेस के नेता अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में जिस तरह के चित्र दिखाते हैं और आगजनी एवं अराजकता को बढ़ावा देने वाली मानसिकता प्रदर्शित करते हैं, वह बेहद चिंताजनक है। ऐसी अराजकता की आग में किसका घर जलेगा, किसकी दुकान इसकी चपेट में आएगी और किसका भाई-बहन प्रभावित होगा, इसका कोई अंदाजा नहीं लगा सकता। अराजकता किसी को भी अपना शिकार बना सकती है। हम आज इसी मानसिकता का विरोध करने के लिए एकत्रित हुए हैं।

उन्होंने कहा कि 1984 में जिस तरह देश में अराजकता फैलाकर सिख समुदाय का नरसंहार किया गया था, आज वही ताकतें एक बार फिर अराजकता फैलाने की मंशा के साथ रामलीला मैदान में दिखाई दे रही हैं। इन लोगों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सामने सिख हैं, हिंदू हैं या मुसलमान, इन्हें केवल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने से मतलब है। आज का दिन 1984 के नरसंहार और उस भयावह कत्लेआम को याद करते हुए अराजकता की राजनीति को समाप्त करने और लोकतंत्र की रक्षा के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने का संकल्प लेने का दिन है।

यमुना विकास बोर्ड के अध्यक्ष *सरदार अरविंदर सिंह लवली* ने कहा कि 1 नवंबर 1984 को दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे देश में कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गई थी। जब राजसत्ता निष्क्रिय हो जाए, तो लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा खतरा कोई नहीं हो सकता। उस दिन भारतीय लोकतंत्र की मर्यादाओं को तार-तार किया गया और देश की एकता एवं अखंडता पर प्रहार हुआ। देश की आजादी और एकता को बनाए रखने में पंजाबियों एवं विशेष रूप से सिख समाज का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, लेकिन उन्हीं सिखों को निशाना बनाया गया। यह हमला केवल सिख समाज पर नहीं, बल्कि पूरे देश पर था। भाजपा अपने राष्ट्रीय नेतृत्व के आह्वान पर 1 नवंबर को ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ के संकल्प के साथ याद करती है। आज कांग्रेस एक बार फिर देश की एकता और अखंडता पर प्रहार करने का प्रयास कर रही है, जिसे देश की जनता कभी माफ नहीं करेगी।

हरिनगर विधायक  श्याम शर्मा ने कहा कि आज जहां कांग्रेस ने राजनीतिक रैली करके सिखों के जख्मों पर नमक छिड़का है तो वहीं भाजपा ने यह “मौन विरोध मार्च” रखकर 1984 के शहीदों को सच्ची श्रदधांजली दी है।

 

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