खून बेचकर पढ़ाई, पेपर लीक से शामत आई : राजेन्द्र पाल गौतम
शिक्षा और भर्ती व्यवस्था की नाकामी पर गंभीर सवाल : अभय दुबे

लखनऊ : अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी मुख्यालय 24 अकबर रोड नई दिल्ली में आज अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के उ0प्र0 प्रभारी राजेन्द्र पाल गौतम पूर्व मंत्री एवं अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता-प्रभारी उ0प्र0 कांग्रेस मीडिया विभाग अभय दुबे ने उत्तर प्रदेश छात्रों के गंभीर मुद्दे पर पत्रकारवार्ता को सम्बोधित किया।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के उ.प्र. प्रभारी राजेन्द्र पाल गौतम पूर्व मंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश के युवाओं का भविष्य आज दो तरफ भाजपा सरकार रौंद रही है। एक ओर गरीब परिवारों के छात्र नीट और एसएससी जैसी परीक्षाओं की तैयारी का खर्च उठाने के लिए अपना खून बेंचने को मजबूर हैं और दूसरी ओर जब वही छात्र परीक्षा तक पहुंचते हैं, तो पेपर लीक और भर्ती घोटाले उनकी मेहनत पर पानी फेर देते हैं। यही वह बुनियादी सवाल है जिसे नेता प्रतिपक्ष श्री राहुल गांधी जी ‘छात्रों की गूंज’ अभियान के जरिए लगातार उठा रहे हैं, शिक्षा आज आम छात्र की पहुंच से बाहर हो चुकी है, और जो छात्र हर कीमत चुकाकर पढ़ाई कर भी रहे हैं, उनका भविष्य घोटालों में बेचा जा रहा है।
प्रयागराज का दिल दहला देने वाला सचः पढ़ाई के लिए खून का सौदा
दैनिक भास्कर को सूचना मिली थी कि उत्तर प्रदेश के कई शहरों में छात्र पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए खून बेच रहे हैं। इसी आधार पर किए गए इन्वेस्टिगेशन में प्रयागराज को चुना गया, जहां हजारों छात्र नीट और एसएससी की तैयारी करते हैं, और वहां खुलासा हुआ कि गरीब परिवारों के छात्र कोचिंग, हॉस्टल और मेस की फीस भरने के लिए अपना खून बेच रहे हैं। कुछ छात्र महीने में 2 बार, तो कुछ 4 बार तक खून दे रहे हैं। जांच में अंडरकवर रिपोर्टर मरीज के परिजन बनकर शहर के सबसे बड़े ब्लड बैंक, राजापुर चैराहे स्थित इलाहाबाद मेडिकल एसोसिएशन (ए0एम0ए0) ब्लड बैंक पहुंचे, जहां बाहर खड़े छात्र पैसे लेकर खून देने को तैयार मिले। इन छात्रों के पिता किसान हैं, पर जमीन इतनी नहीं कि खेती से घर का पूरा खर्च चल सके। ये छात्र अपनी पढ़ाई का खर्च खुद जुटाते हैं और कई बार खून बेचकर मिला पैसा गांव भी भेजते हैं।
छात्र संतोष (बदला हुआ नाम) प्रयागराज में एसएससी की तैयारी कर रहा है और घर का इकलौता बेटा है। मां का देहांत हो चुका है, पिता किसान हैं और दो छोटी बहनें गांव में पढ़ाई के साथ घर संभालती हैं। खेती से बस दाल-रोटी चलती है। दो महीने से हॉस्टल फीस न भर पाने और रहने की जगह छिन जाने के डर से वह ब्लड बैंक पहुंचा। उसने एक यूनिट खून के ₹8,000 मांगे। ट्यूशन पढ़ाने के सुझाव पर उसका जवाब था कि खून तो फिर बन जाएगा, लेकिन पढ़ाई छूट गई तो बेरोजगार रह जाएगा। उसने माना कि खून देने के बाद कुछ दिन तकलीफ होती है, पर खर्च नहीं निकला तो गांव लौटना पड़ेगा।
छात्र आनंद (बदला हुआ नाम) भी एसएससी की तैयारी कर रहा है। पिता बीमार हैं, इसलिए उसे घर पैसे भी भेजने पड़ते हैं। वह कोचिंग फीस चुकाने के लिए ब्लड बैंक आया था, जबकि सिर्फ 10 दिन पहले मेस का पैसा देने के लिए दूसरे ब्लड बैंक में खून बेच चुका था। उसने भी ₹8,000 से कम लेने से इनकार किया। उसका कहना है कि अगर एक दिन अफसर बन गया तो सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी, इसीलिए अभी जूझ रहा है।
यह सोचने वाली बात हैः जिस छात्र के लिए सरकारी नौकरी ही एकमात्र उम्मीद है, वह उस नौकरी की तैयारी के लिए अपनी सेहत गिरवी रख रहा है।
छात्रों का काल दलाल मालामाल
यह मामला सिर्फ व्यक्तिगत मजबूरी का नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक संगठित सिंडिकेट काम कर रहा हैः
1. ब्लड बैंकों के आसपास सक्रिय दलालों के संपर्क में ऐसे छात्र रहते हैं, जो एक फोन कॉल पर खून देने पहुंच जाते हैं।
2. हॉस्टलों में अलग-अलग ग्रुप बने हैं, जहां एजेंट पहले मरीजों से सौदा करते हैं और फिर छात्रों को बुलाते हैं।
3. ए0एम0ए0 ब्लड बैंक के बाहर मिले दलाल सोनू ने एक यूनिट के लिए छात्र को सिर्फ ₹4,000 देने की बात कही, जबकि सीधे सौदे में छात्र ₹8,000 मांग रहे हैं। उसका तर्क था कि पकड़े जाने का जोखिम दलाल उठाते हैं, इसलिए उनका कमीशन कटता है। बार-बार कहने पर भी वह सिर्फ ₹5,000 तक पहुंचा और प्रोसेसिंग फीस भी छात्र से ही वसूलने की बात कही।
4. 20 दिन पहले खून देने की बात पर दलाल ने कहा कि कोई दिक्कत नहीं होगी, छात्र महीने में दो-दो बार खून देते हैं।
5. पकड़े जाने से बचने के लिए ब्लड बैंक बदल-बदलकर खून दिलाया जाता है, और प्रयागराज में दिक्कत हो तो आसपास के जिलों में काम कराया जाता है।
6. सोनू और उसके साथी राजेश ने दावा किया कि वे दोनों मिलकर रोज 12 यूनिट से ज्यादा खून दिलवाते हैं। उनके पास अस्पताल की मुहर, फर्जी डॉक्टर, पर्चा और फर्जी डिमांड लेटर पहले से तैयार रहते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार ब्लड बैंक सीधे तौर पर शामिल नहीं हैं, लेकिन उन्हें लैब के बाहर चल रहे इस खेल की जानकारी रहती है। वहीं प्रयागराज प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि शिकायत आने पर ही कार्रवाई की जाती है। सवाल यह है कि जब फर्जी दस्तावेजों के सहारे रोज दर्जनों यूनिट खून का अवैध कारोबार ब्लड बैंकों के बाहर खुलेआम चल रहा है, तो प्रशासन शिकायत का इंतजार क्यों कर रहा है?
*महंगी शिक्षा की मार*
*छात्रों के अनुसारः*
1. बड़ी कोचिंग संस्थाएं (आकाश इंस्टीट्यूट, एलन, कैरियर, नारायणा जैसी) सालभर की फीस एकमुश्त ₹1.20 लाख से ₹1.80 लाख तक लेती हैं।
2. हॉस्टल का कमरा ₹3,500 से ₹5,000 महीने में मिलता है।
3. स्टडी मटीरियल और खाने का खर्च अलग से।
4. सरकार की अभ्युदय कोचिंग योजना मौजूद है, लेकिन उसमें प्रवेश के तय मानक हैं, जिन्हें सभी जरूरतमंद छात्र पूरा नहीं कर पाते।
यही वह मुद्दा है जिसे राहुल गांधी जी ने ‘छात्रों की गूंज’ में सामने रखा। कोटा में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने स्क्रीन पर एसएससी, यूपीएससी, आरआरबी, जेईई और नीट की तैयारी में लगने वाली फीस का बजट दिखाया, और प्रयागराज में उन्होंने कहा कि देश का युवा ऐसी व्यवस्था में फंसा है, जहां वर्षों की मेहनत और संघर्ष के बाद भी उसे अपने भविष्य का भरोसा नहीं मिल रहा। प्रयागराज के छात्रों का खून बेचना इसी सच्चाई का सबसे दर्दनाक प्रमाण है।
*खून देकर पढ़ाई, पेपर लीक से बर्बाद भविष्य*
जो छात्र अपनी सेहत दांव पर लगाकर परीक्षा की तैयारी करते हैं, उन्हें बदले में क्या मिलता है? उत्तर प्रदेश में पिछले वर्षों में भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं की साख लगातार गिरी हैः
1. वर्ष 2024 की शुरुआत ही यूपी पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा के पेपर लीक से हुई, जिसके बाद नीट, यू0जी0, यू0जी0सी0 नेट समेत कई परीक्षाओं में गड़बड़ी की खबरें आईं।
2. 11 फरवरी 2024 को हुई यूपीपीएससी आर0ओ0/ए0आर0ओ0 प्रारंभिक परीक्षा का पेपर लीक होने के बाद उसे रद्द करना पड़ा।
3. इन मामलों में प्रयागराज निवासी राजीव नयन मिश्रा को मुख्य आरोपी माना गया, यानी वही शहर जहां छात्र आज पढ़ाई के लिए खून बेच रहे हैं।
एक कांस्टेबल भर्ती या एक आर0ओ0/ए0आर0ओ0 परीक्षा रद्द होने का मतलब है लाखों छात्रों की महीनों की तैयारी, फीस, किराया और मानसिक मेहनत का बर्बाद होना। सोचिए, संतोष और आनंद जैसे छात्रों पर क्या गुजरती होगी, जब खून बेचकर जुटाए पैसों से की गई तैयारी के बाद परीक्षा ही रद्द हो जाए। एक तरफ छात्र अपना खून देकर शिक्षा खरीद रहे हैं, दूसरी तरफ परीक्षा माफिया उनका भविष्य बेच रहा है।
*जान जोखिम में: नियम क्या कहते हैं-*
नियमानुसार पुरुष 90 दिन में एक बार और महिला 120 दिन में एक बार ही रक्तदान कर सकती है। महीने में 4 बार रक्तदान करना बेहद खतरनाक है, जिससे छात्रों को-
1. गंभीर एनीमियाः हीमोग्लोबिन और लाल रक्त कोशिकाएं तेजी से घटती हैं, आयरन की कमी होती है।
2. थकावट और कमजोरीः अंगों और मांसपेशियों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंचती।
3. एकाग्रता पर असरः ध्यान लगाने में परेशानी और याददाश्त कमजोर होना। यानी जिस पढ़ाई के लिए खून बेचा जा रहा है, वही प्रभावित होती है।
4. चक्कर और बेहोशीः ब्लड प्रेशर गिरने से आंखों के आगे अंधेरा छाने का खतरा।
5. कमजोर प्रतिरोधक क्षमताः प्लेटलेट्स और श्वेत रक्त कोशिकाओं के नुकसान से संक्रमण और बीमारियों का खतरा।
6. हृदय पर अतिरिक्त दबावः दिल को तेजी से खून पंप करना पड़ता है, जिससे सांस फूलने की समस्या हो सकती है।
इसके अलावा फर्जी दस्तावेजों और पहचान छिपाकर बार-बार लिया गया खून उन मरीजों के लिए भी खतरा है, जिन्हें यह चढ़ाया जाता है।
*कानून मौजूद है, पर भ्रष्टाचार अपार*
भारत में खून बेचना या पैसे लेकर रक्तदान करना अपराध है। 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के नियमों के तहत खून की खरीद-बिक्री पर रोक लगाई थी, और केवल स्वैच्छिक रक्तदान ही मान्य है। कानून के तहत-
1. खून की व्यावसायिक खरीद-बिक्रीरू 2 से 7 साल तक की जेल और ₹10 से 20 हजार तक जुर्माना।
2. बिना वैध प्रक्रिया ब्लड बैंक से खून की दलालीः ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत 3 से 5 साल तक की सजा।
3. फर्जी पर्ची, फर्जी लेटर या पहचान छिपाकर बार-बार खून बेचनाः धोखाधड़ी, जालसाजी और संक्रामक बीमारी फैलाने/जान जोखिम में डालने की धाराओं में 1 से 7 साल तक की सजा।
इतने सख्त प्रावधानों के बावजूद दलाल खुलेआम रोज दर्जनों यूनिट का धंधा चला रहे हैं, तो यह निगरानी तंत्र की विफलता है। असली अपराधी मजबूर छात्र नहीं, बल्कि वह व्यवस्था है जिसने उन्हें यहां तक पहुंचाया और वह सिंडिकेट जो उनकी मजबूरी से कमा रहा है।
*श्री राजेन्द्र पाल गौतम जी एवं श्री अभय दुबे जी ने कहा कि हम मांग करते हैं कि-*
1. प्रयागराज और आसपास के जिलों में ब्लड बैंकों के बाहर सक्रिय दलाल सिंडिकेट की उच्चस्तरीय जांच हो, और फर्जी मुहर, पर्चे व डिमांड लेटर बनाने वालों पर तत्काल कार्रवाई हो।
2. सभी ब्लड बैंकों में डोनर का केंद्रीकृत डिजिटल रिकॉर्ड अनिवार्य हो, ताकि एक व्यक्ति अलग-अलग ब्लड बैंकों और जिलों में बार-बार खून न दे सके।
3. प्रशासन शिकायत का इंतजार किए बिना स्वतः संज्ञान लेकर छापेमारी करे।
4. खून बेचने को मजबूर छात्रों को अपराधी न बनाकर उनकी स्वास्थ्य जांच, काउंसलिंग और आर्थिक सहायता की व्यवस्था हो।
5. अभ्युदय जैसी कोचिंग योजनाओं का दायरा और सीटें बढ़ें, और प्रवेश मानक जरूरतमंद छात्रों के अनुकूल बनें।
6. प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए हॉस्टल, लाइब्रेरी और भोजन सहायता की सरकारी व्यवस्था हो।
7. निजी कोचिंग संस्थानों की फीस पर नियमन हो और सालभर की एकमुश्त फीस वसूली पर रोक लगे।
8. यूपी पुलिस भर्ती, आर0ओ0/ए0आर0ओ0 समेत सभी पेपर लीक मामलों में बड़े चेहरों तक पहुंचकर समयबद्ध सजा हो, और प्रभावित छात्रों को आर्थिक क्षतिपूर्ति मिले।
9. भर्ती परीक्षाओं का निश्चित वार्षिक कैलेंडर जारी हो और परिणाम समय पर घोषित हों।
राजेन्द्र पाल गौतम l एवं अभय दुबे ने कहा कि जिस प्रदेश में छात्र किताबों के लिए खून बेचें और फिर पेपर लीक में उनकी मेहनत लुट जाए, वहां यह सवाल सिर्फ शिक्षा का नहीं, युवाओं के सम्मान और भविष्य का है। राहुल गांधी जी की ‘छात्रों की गूंज’ इन्हीं आवाजों को उठाने का मंच है। हम मांग करते हैं कि सरकार इस गंभीर स्थिति पर तत्काल संज्ञान ले और छात्रों को सस्ती शिक्षा तथा पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया की गारंटी दे।



