उत्तर-प्रदेशनई दिल्लीबड़ी खबरलखनऊ

पूजा-उत्सव में फ़ासिस्ट और फ़ासिस्ट-विरोधी प्रतिरोध

मालिनी भट्टाचार्य, अनुवाद : संजय पराते

दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल की जनता का सबसे लोकप्रिय वार्षिक उत्सव है। वामपंथी दलों और उनके सहयोगी संगठनों द्वारा संचालित बुक स्टॉल लंबे समय से इस उत्सव की संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। पंडालों के दर्शन के लिए निकलने वाले लोग इन स्टॉलों पर भी जाते हैं और खाने-पीने के स्टॉल, खिलौने की दुकानों तथा छोटे उद्यमियों व कारीगरों द्वारा लगाए गए घरेलू सामान के स्टॉलों की तरह ही अक्सर यहाँ से भी किताबें खरीदते हैं। मेरा यह अनुमान शायद सही है कि ये बुक स्टॉल गीता प्रेस या टीएमसी के ‘जागो बांग्ला’ स्टॉल से बेहतर प्रदर्शन करते हैं, क्योंकि वे केवल पार्टी के प्रकाशन नहीं बेचते, बल्कि साहित्यिक ग्रंथ, कथा साहित्य और कथातेर अन्य साहित्य, विज्ञान और इतिहास की लोकप्रिय पुस्तकों और बच्चों की किताबों के विविध प्रकार, पुनर्मुद्रण और अनुवाद भी बेचते हैं। कई छोटे प्रकाशक अपनी पुस्तकें इन स्टालों पर भेजते हैं।

पिछले पंद्रह वर्षों में इन बुक स्टॉलों पर टीएमसी के गुंडों द्वारा कई बार हमले किए गए हैं, जिन्होंने इस प्रकार के सार्वजनिक स्थानों पर, बतौर सत्तारूढ़ दल, पूर्ण अधिकार जताने का प्रयास किया है। परंतु ज़मीनी स्तर पर वामपंथी कार्यकर्ताओं ने इन हमलों का मुकाबला किया है। बहरहाल, ये हमले किताबों के खिलाफ़ नहीं थे। यदि उन स्टॉलो पर झालमुरी (चटपटा तीखा मुर्रा) बिक रही होती, तब भी उन पर वैसे ही आक्रमण होता।

किन्तु इस वर्ष, सत्तासीन नई पार्टी को इन बुक स्टॉलों पर हमला करने का एक नया प्रपंच मिल गया है। अत्यधिक नैतिक आक्रोश में, उद्दंड मुख्यमंत्री सहित भाजपा के नेता इन स्टालों पर बेची जाने वाली किताबों को अनैतिक और राष्ट्र-विरोधी सामग्री बता रहे थे और अपना रोष व्यक्त करने की शपथ ले रहे थे, क्योंकि इन बुक स्टॉलों की उपस्थिति दुर्गापूजा की पवित्रता को दूषित कर देगी।

अतः पूजा के दिनों से पहले से ही, कोलकाता और अन्य नगरों में ऐसे बुक स्टॉल लगाने वाले व्यक्तियों को, पुलिस तथा नागरिक प्रशासन से अनुमति प्राप्त होने पर भी, अनेक स्थानों पर लाठी से लैस गुटखा चबाने वाले उपद्रवियों द्वारा धमकियों एवं मारपीट का सामना करना पड़ा है, जो कभी-कहीं स्टॉल तोड़ने में भी सफल रहे हैं। बिना किसी भय के, इनमें से कई जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं ने टूटे हुए स्टॉल पर लौटकर फिर से काम शुरू कर दिया है ; कई बार उन्होंने सड़क के किनारे ही अपना सामान लगा लिया है। कई बार वे तिपहिया वाहनों पर अपनी किताबें लादकर इलाके में किताबें बेचने निकल पड़ते हैं। दरअसल, किताबों पर इस फासीवादी हमले के प्रतिरोध ने लोगों का ध्यान खींचा है और यह किताबों तथा पठन-पाठन का एक बेहतरीन प्रचार साबित हुआ है।

इस युद्ध का अब तक का सबसे खतरनाक चरण सप्तमी के दिन आया, जब पूजा वास्तव में आरंभ होती है। कोलकाता की सड़कों पर उत्सव के इस अवसर पर परिवार और बच्चों के साथ भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी, वहीं शहर के कई क्षेत्रों में पुलिस (और यहां तक कि सशस्त्र बलों) की भारी तैनाती ‘अवैध’ वामपंथी किताबों के स्टॉल गिराने के लिए की गई, जबकि उन्हें पंडालों में जुट रही भीड़ को नियंत्रित करने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में व्यस्त होना चाहिए था।
कुछ स्टॉल ध्वस्त कर दिए गए। कुछ स्थानों पर भाजपा और एबीवीपी के हुड़दंगियों के साथ-साथ खुद राज्य प्रशासन द्वारा प्रायोजित हिंसा के आगे भी डटकर विरोध किया गया। जब जादवपुर विश्वविद्यालय के पास एक बाज़ार में पूजा के अवसर पर पिछले चालीस वर्षों से सजने वाली एक प्रसिद्ध बुक स्टॉल पर पुलिस ने बुलडोजर और नगरपालिका के ट्रकों से धावा बोला, तो विद्यार्थियों सहित बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों ने दुकान के इर्द-गिर्द घेरा बना दिया और पूरी रात मानव श्रृंखला बनाकर उसकी पहरेदारी की। सत्ता के गुर्गों को अंततः पीछे हटने के लिए विवश होना पड़ा।

लेकिन इस बीच, राज्य की सत्ता में बैठे फासीवादियों की पूरी तरह से गैर-जिम्मेदारी की वजह से एक दुखद घटना घटी। पुलिस को बुक स्टॉल गिराने की जल्दबाजी थी, लेकिन भीड़ प्रबंधन प्रणाली में कमी की ओर ध्यान नहीं था, जिसकी वजह से, उत्तर कोलकाता के चोरबागान पंडाल में भारी भगदड़ मच गई, जिसमें 18 लोगों की जान चली गई और कई लोग घायल हो गए। इस शहर के इतिहास में आई इस अभूतपूर्व आपदा ने बंगालियों के सबसे बड़े उत्सव पर ग्रहण लगा दिया है और फासीवादी शासन के पूर्ण पाखंड को उजागर कर दिया है।

हमने यूरोप में नाज़ियों द्वारा पुस्तकों को जलाए जाने के बारे में सुना है। पुस्तकों, ज्ञान और स्वतंत्र विचार के प्रति फासीवादियों की घृणा विवेक के विनाश पर समाप्त होती है। हमने इसके बारे में अब तक सुना था, अब हम इसे अपनी आँखों के सामने देख रहे हैं। यह आज हमारे राष्ट्रीय कलंक की कहानी है। लेकिन इन अस्वीकार्य, असहनीय मौतों पर शोक व्यक्त करते हुए भी, आइए हम उन लोगों के प्रति एकजुटता की घोषणा करें, जो उस रात सड़कों पर किताबें बचा रहे थे और ‘नो पसारन!’ का नारा लगा रहे थे। उन्हीं में हमारे भविष्य की आशा निहित है!

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button