उत्तर-प्रदेशनई दिल्लीबड़ी खबरलखनऊ

दीनदयाल का अंत्योदय और आज की राजनीति

दीनदयाल उपाध्याय जयंती (25 सितम्बर) पर विशेष :

डॉ. एस.के.गोपाल

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का अंत्योदय विचार शासन और विकास की ऐसी दृष्टि थी जिसमें समाज का अंतिम व्यक्ति केन्द्र में था। राष्ट्र की प्रगति का अर्थ तभी है जब विकास का लाभ सबसे पीछे खड़े व्यक्ति तक पहुँचे। विकास की कसौटी केवल बड़े उद्योग, एक्सप्रेसवे और स्मार्ट सिटी नहीं हो सकते। यह भी देखना होगा कि छोटे किसान, श्रमिक, महिला, युवा और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के जीवन में कितना बदलाव आया है।

दीनदयाल उपाध्याय और डॉ. राममनोहर लोहिया का राजनीतिक प्रसंग इस दृष्टि से उल्लेखनीय है। दोनों की विचारधाराएं अलग थीं और अनेक राजनीतिक प्रश्नों पर उनके मतभेद भी थे। 1963 के जौनपुर लोकसभा उपचुनाव में डॉ. लोहिया ने दीनदयाल उपाध्याय के समर्थन में चुनावी सभा को संबोधित किया। उसी दौर में दोनों के बीच राजनीतिक संवाद और सहयोग के प्रसंग सामने आए। जनसंघ और लोहिया की समाजवादी धारा ने 1963 के उपचुनावों में कुछ क्षेत्रों में साझा विपक्षी मंच पर काम किया। यह उस समय गैर कांग्रेसी विपक्ष के बीच सहयोग की कोशिश थी।

इस प्रसंग का संदेश आज भी महत्वपूर्ण है। विचारों की असहमति लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। असहमति के बावजूद संवाद और मुद्दा आधारित सहयोग बना रहना चाहिए। लोहिया और दीनदयाल अपने विचारों के प्रति स्पष्ट थे। फिर भी राजनीतिक परिस्थितियों में साथ काम किया। असहमति को व्यक्तिगत शत्रुता में बदलना लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है। राजनीतिक शुचिता में भ्रष्टाचार से दूरी के साथ वैचारिक स्पष्टता, सार्वजनिक मर्यादा, विरोधी विचार का सम्मान और जनहित को प्राथमिकता देना भी शामिल है।

केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार की अनेक योजनाओं में गरीब और वंचित वर्गों की बुनियादी जरूरतों को प्राथमिकता दी गई है। जनधन योजना ने लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा। प्रधानमंत्री आवास योजना ने गरीब परिवारों के लिए आवास को प्राथमिकता दी। आयुष्मान भारत ने पात्र परिवारों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा का विस्तार किया। उज्ज्वला योजना ने गरीब परिवारों की महिलाओं को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराया। जल जीवन मिशन ने ग्रामीण परिवारों तक पाइप से पेयजल पहुंचाने का प्रयास किया। केंद्र सरकार इन पहलों को अंत्योदय और गरीब कल्याण की व्यापक सोच से जोड़ती है। इन नीतियों का महत्व इसलिए है कि उन्होंने कल्याण को बुनियादी जरूरतों से जोड़ा है। घर, स्वास्थ्य, पानी और स्वच्छ ईंधन सम्मानजनक जीवन की जरूरतें हैं। अंत्योदय सुविधा पहुंचाने तक सीमित नहीं है। गरीब व्यक्ति को सक्षम बनाना भी जरूरी है। महिलाओं के स्वयं सहायता समूह, छोटे कारोबारियों को ऋण, कौशल विकास और रोजगार के अवसर इसी दिशा के कदम हैं। सहायता संकट से निकालती है। अवसर व्यक्ति को आगे बढ़ने की शक्ति देता है। गरीब को स्थायी रूप से सक्षम बनाना अंत्योदय की अधिक सार्थक दिशा है।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने भी कमजोर और जरूरतमंद वर्गों के लिए अनेक योजनाएँ आगे बढ़ाई हैं। मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना बालिकाओं के जन्म और शिक्षा के विभिन्न चरणों में सहायता देती है। मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना निर्धन परिवारों की बेटियों के विवाह में सहायता का माध्यम है। अनेक योजनाओं की घोषणा हुई फिर भी किसी योजना की घोषणा अपने आप में अंतिम उपलब्धि नहीं है। सफलता तब होगी जब पात्र व्यक्ति को उसका लाभ सरलता और सम्मान के साथ मिले। आवेदन की जटिलता, अनावश्यक कागजी औपचारिकताएं और विभागीय चक्कर योजना की मंशा को कमजोर करते हैं। डिजिटल व्यवस्था ने सेवाओं को सरल बनाने में मदद की है। तकनीक साधन है, लक्ष्य नहीं। गांव का बुजुर्ग या तकनीकी सुविधा से दूर परिवार प्रक्रिया की कठिनाई के कारण किसी अधिकार से वंचित न हो। यह शासन की जिम्मेदारी है।

अंत्योदय का वास्तविक लक्ष्य सशक्तीकरण है। मुफ्त सुविधाओं और सशक्तीकरण का अंतर समझना जरूरी है। संकट के समय सहायता आवश्यक है। लंबे समय में शिक्षा, रोजगार, कौशल, उद्यम और बाजार तक पहुंच अधिक महत्वपूर्ण हैं। गरीब परिवार की अगली पीढ़ी अपने श्रम और योग्यता के बल पर आगे बढ़ सके। यही अंत्योदय का व्यापक उद्देश्य है। विकास की प्राथमिकताओं में संतुलन भी जरूरी है। बड़े उद्योग और मजबूत आधारभूत ढांचा आवश्यक हैं। गांव का विद्यालय, स्वास्थ्य केंद्र, सिंचाई, स्थानीय रोजगार और छोटा कारोबारी भी विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

केंद्र और उत्तर प्रदेश की जनकल्याणकारी नीतियों को अंत्योदय की कसौटी पर लगातार परखा जाना चाहिए। जो नीति अंतिम व्यक्ति तक सुविधा और अवसर पहुंचाती है, उसका स्वागत होना चाहिए। जहां क्रियान्वयन में कमी दिखाई देती है, वहां सुधार की मांग भी उठनी चाहिए। उपलब्धियों की प्रशंसा और कमियों की रचनात्मक आलोचना लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। अंत्योदय किसी सरकार के पक्ष में स्थायी प्रमाणपत्र नहीं है। यह शासन को लगातार परखने की कसौटी है।

दीनदयाल उपाध्याय का अंत्योदय आज भी एक सरल प्रश्न सामने रखता है। विकास की अंतिम मंजिल कौन है? यदि उत्तर समाज का वह व्यक्ति है जो सबसे पीछे खड़ा है, तो विकास की दिशा सार्थक है। यात्रा तब पूरी होगी जब गरीब केवल किसी योजना का लाभार्थी न रहे। वह शिक्षा, रोजगार, उद्यम और सम्मान के साथ अपने भविष्य का निर्माता बने। लोहिया और दीनदयाल का राजनीतिक प्रसंग संवाद और लोकतांत्रिक मर्यादा की सीख देता है। अंत्योदय विकास की अंतिम कसौटी बताता है। अंतिम व्यक्ति तक सुविधा पहुँचाना जरूरी है। उसे अपने श्रम और सामर्थ्य से आगे बढ़ने योग्य बनाना उससे भी बड़ा लक्ष्य है।

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button