जादवपुर फिर लड़ाई के मैदान में — झुकेंगे नहीं

(आलेख : सृजन भट्टाचार्य, अनुवाद : संजय पराते)*
जादवपुर ने प्रतिरोध किया है।
एक बार फिर।
हम लोग अब तक भारत के सभी प्रमुख शिक्षण संस्थानों पर आरएसएस के हमलों से वाकिफ हो चुके हैं। इनमें से ज़्यादातर जगहों पर, छात्र संघ चुनावों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) को ज़्यादा लोकप्रिय समर्थन नहीं मिलता। फिर भी, आरएसएस-भाजपा बार-बार इन संस्थानों में घुसने की कोशिश करते हैं, यहां पढ़ने वाले छात्रों को ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताते हैं और ज़बरदस्ती अपनी फासीवादी विचारधारा इन संस्थानों पर थोपते हैं।
क्यों? क्योंकि ज़ाहिर है, भाजपा के लिए ‘इंस्टीट्यूट्स ऑफ़ एमिनेंस’ (बेहतरीन संस्थानों) पर कब्ज़ा करना बहुत ज़रूरी है। ये संस्थान सिर्फ़ एक शारीरिक ताकत नहीं हैं, उनके दिमाग में एक बौद्धिक एजेंडा भी होता है। और नई फ़ासीवादी सोच का यही मतलब होता है कि वे विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के अधोसंरचना का इस्तेमाल करके अकादमिक स्तर पर, नीतियां बनाने वाले स्तरों पर और पूरे समाज में, अपने विभाजनकारी एजेंडे को आगे बढ़ाना चाहते हैं। इसीलिए, किसी भी तरह से इन विश्वविद्यालयों पर कब्ज़ा करना उनके लिए ज़रूरी है, ताकि देश के सबसे अच्छे संस्थानों के ज़रिए उनके विचारों को बिना किसी सवाल के सही ठहराया जा सके।
और यहीं पर जाधवपुर विश्वविद्यालय जैसी जगहें उन्हें निराश करती हैं। ये विश्वविद्यालय परिसर दशकों से बहस, चर्चा, असहमति और विचार-विमर्श के केंद्र रहे हैं। इनमें से कई ने भारत की आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई थी। ऐसे संस्थानों में छात्र राजनीति का अखाड़ा हमेशा अलग-अलग विचारों और आदर्शों के टकराव पर आधारित रहा है। जाधवपुर विश्वविद्यालय जैसे संस्थान बहस और चर्चा की गहन प्रक्रियाओं के ज़रिए ज्ञान की विभिन्न धाराओं को जगह देने के लिए जाने जाते हैं। वे सत्ता में बैठे लोगों द्वारा थोपी गई बातों को आँख बंद करके नहीं मानते। यहाँ छात्रों को बातचीत के ज़रिए ही सहमत किया जा सकता है।
और बातचीत ही वह चीज़ है, जिससे आरएसएस-भाजपा सबसे ज़्यादा डरती हैं, क्योंकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि उनकी पूरी विचारधारा बेतुकी और तर्कहीन बातों पर टिकी है। उनकी सोच प्रतिगामी, अवैज्ञानिक, सांप्रदायिक, जातिवादी, पुरुष-प्रधान हैं और निश्चित रूप से इंसानियत के ख़िलाफ़ है। तो वे क्या करते हैं? एक मशहूर फ़्रेंच कहावत है : अगर किसी कुत्ते को मारना हो, तो उसे बदनाम कर दो। यह जानते हुए कि तार्किक बातचीत से वे छात्रों का दिल नहीं जीत पाएंगे, वे सबसे पहले विश्वविद्यालय को ऐसे केंद्रों के तौर पर निशाना बनाते हैं, जहाँ उनके अनुसार, “राष्ट्र-विरोधी” भावनाएं पनपती हैं।
इसके बाद, दुष्प्रचार फैलाने वाले मीडिया के ज़रिए आम लोगों की नज़र में ऐसे विश्वविद्यालयों की छवि खराब करने के लिए ज़हर उगलने के बाद, वे ऐसी जगहों और वहाँ के छात्रों पर शारीरिक हमले करते हैं। वे ऐसा इसलिए करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि समाज का एक हिस्सा उनके इन कामों को सही ठहराएगा, क्योंकि उस हिस्से को भी अब यह यकीन होने लगा है कि ये छात्र “टुकड़े-टुकड़े गैंग” हैं। इस प्रक्रिया में, वे असहमति जताने वालों को अलग-थलग कर देंगे, डर का माहौल बनाएंगे और धीरे-धीरे उन जगहों पर कब्ज़ा कर लेंगे, जिन्हें असहमति जताने वाले छोड़ देंगे। एक बार जब वे विश्वविद्यालयों पर कब्ज़ा कर लेते हैं, तो पहले से स्थापित और मान्यता प्राप्त संस्थानों के ज़रिए बिना ज़्यादा विरोध के अपने बेतुके और अतार्किक विचारों को फैलाना उनके लिए आसान हो जाता है।
लेकिन जाधवपुर ने प्रतिरोध किया है। जब भी कोई जाधवपुर को बदनाम करने और उसकी आत्मा पर हमला करने की कोशिश करता है, तो जाधवपुर विश्वविद्यालय बहादुरी से उसका सामना करती है। बंगाल में तृणमूल के शासन के दौरान, जाधवपुर विश्वविद्यालय में लगातार एसएफआई या किसी दूसरे सरकार-विरोधी गुट की जीत होती रही है। तृणमूल कांग्रेस ने भी जाधवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों और उनके कथित अव्यवस्थित और अराजक स्वभाव की काफी बुराई की है। कई बार ऐसा देखा गया कि जाधवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों की आलोचना करने के मामले में भाजपा और टीएमसी लगभग एक ही पायदान पर थे! फर्क बस इतना है कि टीएमसी ने जाधवपुर विश्वविद्यालय को अराजक कहा और उसे ‘काबू’ में करने की कोशिश की, लेकिन उसे “राष्ट्र-विरोधी” गतिविधियों का अड्डा नहीं बताया। जाधवपुर विश्वविद्यालय ने टीएमसी के अत्याचारों के खिलाफ बड़े विरोध-प्रदर्शन देखे थे। इस बार, बंगाल में भाजपा के सत्ता में आने के बाद, यह तय था कि सत्ता में बैठे लोग नए जोश के साथ कभी न कभी जाधवपुर पर हमला जरूर करेंगे।
खबर है कि 19 अगस्त की शाम को इंजीनियरिंग विभाग के छात्रों ने अपनी मांगों से जुड़े कुछ मुद्दों पर आपस में चर्चा करने के लिए एक सामान्य सभा (जीबी) बैठक बुलाई थी। टीएमसी के कार्यकाल के दौरान, पश्चिम बंगाल में स्टूडेंट यूनियन के नियमित चुनाव बंद कर दिए गए हैं। जादवपुर में भी कई सालों से स्टूडेंट यूनियन का चुनाव नहीं हुआ है। इसलिए, सभी स्टूडेंट यूनियन आधिकारिक तौर पर भंग कर दिए गए हैं। लेकिन यह छात्रों को आपस में जीबी मीटिंग करने से नहीं रोक सकता। जब छात्र जीबी मीटिंग कर रहे थे, तो एबीवीपी के कुछ गुंडे वहां पहुंचे और जीबी मीटिंग को गैर-कानूनी बताकर छात्रों के साथ बदसलूकी करने लगे। उन्होंने छात्रों को लाठियों से पीटने की धमकी दी। इस बेवजह उकसावे के बाद दोनों पक्षों के बीच कहा-सुनी हो गई। एबीवीपी, जिसकी अगुवाई एक शोध छात्र कर रहा था तथा जो पहले ही छेड़छाड़ के एक मामले में जेल जा चुका है, ने झूठा आरोप लगाया कि उसके लोगों को पीटा गया है और उन्हें पास के अस्पताल जाना पड़ा है।
असली हमले यहीं से शुरू हुए। स्थानीय भाजपा विधायक तुरंत अस्पताल पहुँचीं और जाधवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों के ख़िलाफ़ भड़काऊ बातें कहने लगीं। उन्होंने एसएफआई और सीपीआई(एम) नेताओं पर भी आरोप मढ़े, जिनका इस घटना से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था, और वे परिसर में “राष्ट्र-विरोधी” गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए वामपंथी गुटों को धमकाती रहीं। मीडिया के सामने उन्हें यह कहते हुए सुना गया, “आज रात भर तांडव होगा”। उनके बेपरवाह, गैर-ज़िम्मेदाराना और भड़काऊ भाषणों के बाद, आधी रात को आरएसएस-भाजपा के गुंडों का एक बड़ा समूह जादवपुर विश्वविद्यालय परिसर में घुसते और वहां तोड़-फोड़ करते देखा गया।

ये भाजपाई गुंडे बाहरी लोग थे। इनका जादवपुर परिसर से कभी कोई लेना-देना नहीं रहा। ये ऐसे बाहुबली हैं, जो भाजपा के कहने पर लोगों को डराते-धमकाते हैं। 20 अगस्त की आधी रात के बाद इन्हें जादवपुर विश्वविद्यालय परिसर में तोड़-फोड़ करने के लिए भेजा गया, ताकि छात्रों के मन में वास्तव में डर पैदा किया जा सके। उन्हें जो भी पोस्टर और फ्लेक्स मिले, उन्होंने उसे फाड़ दिया। विश्वविद्यालय की संपत्ति को काफी नुकसान पहुँचाया। एसएफआई समेत कई संगठनों के झंडे जला दिए गए। इस अफरातफरी में फँसे आम छात्रों को प्रशासनिक कार्यालय की तरफ धकेला गया और उन पर पत्थर फेंके गए। बेकाबू भीड़ ने कुछ बेकसूर छात्रों की बेरहमी से पिटाई की। बाद में पता चला कि इन गुंडों को अंदर के ही कुछ लोगों का साथ और बढ़ावा मिला था, जिनमें जादवपुर विश्वविद्यालय के एक पूर्व कुलपति भी शामिल थे, जो अब आरएसएस के नेतृत्व वाले शिक्षक संगठन के प्रमुख हैं।
यह एक भयानक अनुभव था। जाधवपुर ने पहले भी कई हमलों का सामना किया है। लेकिन क्रूरता के मामले में यह हमला शायद पिछले सभी हमलों से कहीं ज़्यादा बुरा था। भाजपा के गुंडों के पास उस संस्थान के लिए ज़रा भी सम्मान नहीं है, जिसने भारत को इतना कुछ दिया है। जाधवपुर विश्वविद्यालय की शुरुआत ब्रिटिश काल में स्वदेशी आंदोलन के दौरान एक कॉलेज के तौर पर हुई थी। 1900 के दशक की शुरुआत में कांग्रेस के अंदर नरमपंथी और गरमपंथी गुटों के बीच बहस के दौरान ‘गरमपंथी’ माने जाने वाले और संत बनने से पहले एक निडर स्वतंत्रता सेनानी रहे अरबिंदो घोष ने इस संस्थान का नेतृत्व किया था। अंग्रेज़-विरोधी दिनों में यह कॉलेज कई क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों का केंद्र रहा था। आज़ादी के बाद, कई दशकों में यह देश के बेहतरीन विश्वविद्यालयों में से एक बन गया, जहाँ विज्ञान, मानविकी और इंजीनियरिंग – तीनों ही विभागों में बड़े पैमाने पर अकादमिक काम हुआ।
अगली सुबह हर जगह विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। हज़ारों वामपंथी कार्यकर्ता और लोकतंत्र समर्थक लोग विरोध जताने के लिए जादवपुर विश्वविद्यालय के पास जमा हुए। भाजपा की पुलिस ने पूरी ताकत लगाकर भीड़ को रोका। वहीं दूसरी ओर, एबीवीपी की रैली को जादवपुर विश्वविद्यालय के गेट तक पहुँचने की इजाज़त दे दी गई। एसएफआई की अगुवाई में सैकड़ों छात्र कैंपस के अंदर जमा हो गए, ताकि वे अपने ‘दूसरे घर’ पर होने वाले एक और हमले का मुकाबला कर सकें। गेट के दूसरी तरफ मौजूद भाजपा-एबीवीपी के गुंडों ने ज़बरदस्ती अंदर घुसने की कोशिश की, लेकिन छात्रों की बड़ी संख्या को देखकर वे तुरंत पीछे हट गए। पीछे हटने से पहले, उन्होंने गेट के बाहरी हिस्से पर लगे जादवपुर यूनिवर्सिटी के ऐतिहासिक प्रतीक चिह्न को लात मारकर तोड़ दिया। यह लोगो मशहूर चित्रकार नंदलाल बोस ने डिज़ाइन किया था — वही नंदलाल बोस, जिन्होंने भारत के संविधान का मुख्य पृष्ठ (कवर) भी चित्रित किया था।
अजीब बात है कि पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुई मतदाता सूची की समीक्षा में नंदलाल के परिवार वालों और उनके वंशजों के नाम ही हटा दिए गए थे। नंदलाल बोस, रवींद्रनाथ टैगोर के बहुत करीबी थे। जो लोग संवैधानिक मूल्यों की परवाह नहीं करते, उनके लिए नंदलाल बोस जैसे व्यक्ति पर हमला करना बहुत स्वाभाविक है। बंगाल में सत्ता में आने के चार महीनों के भीतर ही, भाजपा ने बार-बार हमारे स्वतंत्रता संग्राम और प्रगतिशील सामाजिक आंदोलनों के महान नायकों — जिनमें सुभाष चंद्र बोस, टीटू मीर, सिधो-कान्हो और कवि सुकांत भट्टाचार्य शामिल हैं — का अपमान किया है और उन्हें कमतर दिखाने की कोशिश की है। जादवपुर विश्वविद्यालय में हुई तोड़-फोड़ को उनकी पिछली करनियों के क्रम में ही देखा जाना चाहिए। हमने भारत के गृह मंत्री को संसद के भीतर अंबेडकर का अपमान करते देखा है। हम देख रहे हैं कि कैसे भाजपा से जुड़े लोग धीरे-धीरे ‘जन गण मन’ की जगह भारत के राष्ट्रगान के तौर पर कुछ और लाने की कोशिश कर रहे हैं। जादवपुर विश्वविद्यालय पर हमला सिर्फ़ स्वतंत्र विचारों पर हमला नहीं है, बल्कि हमारी देशभक्तिपूर्ण परंपराओं की प्रगतिशील विरासत पर भी हमला है। आज़ादी की लड़ाई के दौरान अंग्रेजों की चापलूसी करने वालों से और क्या उम्मीद की जा सकती है!
लेकिन, जादवपुर पीछे नहीं हट रहा है। अलग-अलग सोच और राय रखने वाले छात्र और शिक्षक, फासीवादी आरएसएस से अपने कीमती संस्थान को बचाने के लिए एकजुट होकर सड़कों पर उतर रहे हैं। आरएसएस-भाजपा काफी समय से फंड रोककर और विश्वविद्यालय को अधोसंरचना के लिए ज़रूरी पैसे न देकर जादवपुर विश्वविद्यालय पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। संदेश साफ़ है : या तो झुक जाओ या खत्म हो जाओ। जादवपुर मज़बूती से कहता है, ‘नो पासारन’ (हम झुकेंगे नहीं)! सरकारी फंड से चलने वाले विश्वविद्यालय को अपना पाठ्यक्रम खुद तय करने की आज़ादी होती है। सरकार इतनी आसानी से जादवपुर की लोकतांत्रिक विरासत नहीं छीन सकती। जादवपुर अभी भी डटकर मुकाबला कर रहा है।
हम भारत के लोगों से अपील करते हैं कि वे जाधवपुर विश्वविद्यालय जैसी जगहों के साथ मज़बूती से खड़े हों। ज़रूरी नहीं कि यह कोई शैक्षणिक केंद्र ही हो। यह कोई बुक क्लब, कॉफ़ी हाउस या मज़दूरों की बैठक भी हो सकती है। कोई भी ऐसी जगह, जो विमर्श को बढ़ावा देती है और लोकतांत्रिक मूल्यों को मानती है, वह आज की तानाशाही सरकार के ख़िलाफ़ उम्मीद की किरण बन सकती है। देश की नई पीढ़ियों के बीच भाजपा का आधार कमज़ोर पड़ने लगा है। नफ़रत और भेदभाव की राजनीति का, रोज़ी-रोटी से जुड़ी मांगों के ज़रिए मज़बूती से विरोध किया जा रहा है। जल्द ही, उन्हें भारत के हर कोने में हार का सामना करना पड़ेगा।
और जाधवपुर जैसी जगहों की हमारे संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, लोकतांत्रिक गणराज्य को बचाने की यात्रा में लोगों को एकजुट करने में भूमिका होगी।



