पेंगुइन की दक्षिणपंथी बेशर्मी

(आलेख : सुधन्वा देशपांडे, अनुवाद : संजय पराते)
पेंगुइन रैंडम हाउस (पीआरएच) दुनिया के सबसे बड़े प्रकाशकों में से एक है। पीआरएच का एक मुद्रक अमेरिका में सोनिया गांधी की यादों की किताब प्रकाशित कर रहा है, जिसकी शुरुआती प्रिंट संख्या 100,000 है। हालांकि, पेंगुइन इंडिया ने भारत में यादों की किताब प्रकाशित करने से मना कर दिया है।
यह असाधारण बात है। अगर इस पर कोई विवाद भी नहीं होता, तो भी यह किताब बहुत बड़ी व्यावसायिक सफलता पाने वाली थी। पेंगुइन का इसे प्रकाशित करने से पीछे हटना व्यावसायिक रूप से बेतुकी बात थी। सोनिया गांधी एक बड़ी भारतीय राजनैतिक हस्ती हैं, लेकिन वे अपने सार्वजनिक बयानों में तीखी और भड़काऊ बातें करने के लिए नहीं जानी जाती हैं। पेंगुइन का ‘कानूनी’ सलाह के पीछे छिपना बेईमानी है। यह बिल्कुल साफ है कि प्रकाशक ने श्रीमती गांधी की यादों पर कैंची चलाने की कोशिश की थी, और लेखिका ने झुकने से मना कर दिया।
यह पहली बार नहीं है, जब पेंगुइन ने ऐसा किया है। हाल ही में, इस प्रकाशक ने अमेरिकी पत्रकार जो सैको की ग्राफिक बुक, ‘द वन्स एंड फ्यूचर रायट’ को प्रकाशित करने से हाथ खींच लिए थे। यह किताब 2013 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों पर आधारित है। इन दंगों का इस्तेमाल 2014 के चुनावों से पहले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज करने के लिए किया गया था, और उस चुनाव में भाजपा की सफलता में इस दंगे की भी एक अहम भूमिका थी। फिर एक पूर्व सेना प्रमुख की किताब का मामला है, जिसे भी पेंगुइन प्रकाशित करने वाला था, लेकिन उससे पीछे हट गया।
इनमें से दो मामलों में, अच्छी बात यह है कि किताबों को दूसरे प्रकाशक मिल गए हैं। श्रीमती गांधी की यादें हार्पर कॉलिन्स, जो एक और बड़ा प्रकाशक है, प्रकाशित कर रहा है, और जो सैको की किताब लेफ्टवर्ड बुक्स प्रकाशित कर रहा है।
यहां एक परेशान करने वाली प्रवृत्ति साफ़-साफ़ दिख रही है – पेंगुइन उन किताबों को प्रकाशित नहीं कर रहा है, जो किसी भी रूप में भाजपा, आरएसएस, मौजूदा सरकार और प्रधानमंत्री की आलोचना करती हैं। यह प्रवृत्ति मई 2014 के चुनावों में भाजपा के सत्ता में आने से पहले ही शुरू हो गई थी। उस साल की शुरुआत में, पेंगुइन ने इतिहासकार वेंडी डोनिगर की एक किताब वापस ले ली थी और उसे हटा दिया था, जब आरएसएस के एक खांटी कार्यकर्ता दीनानाथ बत्रा ने उस पर कानूनी मामला दायर किया था। (श्री बत्रा की मृत्यु को अब दो साल से ज़्यादा हो गए हैं, इसलिए पेंगुइन अपने हाल के कारनामों के लिए उन्हें दोषी भी नहीं ठहरा सकता।) प्रो. डोनिगर की किताब को बाद में स्पीकिंग टाइगर ने बिना किसी बदलाव के प्रकाशित किया।
सोनिया गांधी की किताब को लेकर हुए विवाद के बाद, दूसरे लेखकों ने भी पेंगुइन के साथ अपने अनुभव सार्वजनिक किए हैं। उनमें से एक हैं धीरेंद्र के. झा, जिन्होंने पेंगुइन के साथ दो किताबों के लिए अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे। उनकी पहली किताब, ‘गांधीज़ असैसिन’ (गांधी की शहादत) 2022 में प्रकाशित हुई, लेकिन दूसरी किताब, जो दिवंगत आरएसएस प्रमुख एम.एस. गोलवलकर की जीवनी थी, प्रकाशक के साथ खटाई में पड़ गई। पेंगुइन ने नाज़ी शासन के सभी संदर्भ हटाने पर ज़ोर दिया, जिसके गोलवलकर जाने-माने प्रशंसक थे ; गोलवलकर की अपनी 1939 की किताब ‘वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड’ के आलोचनात्मक संदर्भ ; और 1942 के आरएसएस शिविर के विवरण, जिसके बारे में लेखक के पास दस्तावेजी सबूत थे। लेखक ने ये बदलाव करने से मना कर दिया, और बाद में यह किताब साइमन एंड शूस्टर इंडिया ने प्रकाशित की।
हिंदू दक्षिणपंथ की आलोचना करने वाली किताबों को दबाने और सेंसर करने के मामले में पेंगुइन सबसे बड़ा अपराधी है, वहीं दूसरे भी कभी-कभार पीछे हट जाते हैं। उदाहरण के लिए, 16 मई, 2014 को, जिस दिन लोकसभा चुनाव के नतीजे आने वाले थे और जिस दिन भाजपा सत्ता में आई, ओरिएंट ब्लैकस्वान ने गुजरात में सांप्रदायिक और यौनिक हिंसा पर एक किताब को ‘अलग’ कर दिया। उस साल की शुरुआत में वेंडी डोनिगर की किताब की तरह, इस मामले में भी दोषी आरएसएस के दीनानाथ बत्रा थे, जिन्होंने प्रकाशक पर मुकदमा करने की धमकी दी थी।
इनमें से कई मामलों में, प्रकाशन ‘फैक्ट-चेकिंग’ और ‘एडिटोरियल ड्यू डिलिजेंस’ (संपादकीय उचित परिश्रम) के तर्क के पीछे छिप गया है। ये तर्क मामले को उलझाने की कोशिश हैं। कोई भी प्रकाशक, जो खुद को गंभीरता से लेता है, वह एडिटोरियल ड्यू डिलिजेंस के अपने अंदरूनी मानकों का पालन करता है और वास्तविक घटनाओं (नॉन-फिक्शन) के मामले में, फैक्ट-चेकिंग करता है। बहरहाल, जैसा कि गोलवलकर की जीवनी और सोनिया गांधी की यादों के उदाहरण दिखाते हैं, पेंगुइन ने बार-बार ड्यू डिलिजेंस और सेंसरशिप के बीच की लाइन को पूरी तरह से पार किया है। लेखक से गोलवलकर पर किताब से नाज़ी शासन के संदर्भ हटाने के लिए कहने का कोई कारण नहीं हो सकता, जब यह एक जानी-मानी बात है, जिसका ज़िक्र पहले भी कई लेखकों ने किया है, कि गोलवलकर ने नाज़ियों और यहूदियों को खत्म करने के उनके अभियान के बारे में तारीफ़ करते हुए लिखा था। इसलिए इस निष्कर्ष से बचा नहीं जा सकता है कि पेंगुइन के शीर्ष पर कोई या तो बहुत ज़्यादा डरपोक व्यक्ति है, या दक्षिणपंथी कट्टर व्यक्ति है – या दोनों।
कुछ लोग तर्क देते हैं कि पेंगुइन जैसे प्रकाशकों के पास खोने के लिए बहुत कुछ होता है, क्योंकि वे बहुत बड़े प्रकाशक हैं, और अपने कर्मचारियों की भलाई और नौकरियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उनकी है। यह एक मज़ेदार तर्क है। वास्तविकता यह है कि लेफ्टवर्ड जैसे छोटे प्रकाशकों के पास खोने के लिए बहुत कुछ होता है। बड़े प्रकाशकों के पास न सिर्फ़ मोटी जेब होती है और कानूनी संसाधनों तक उनकी पहुँच होती है, बल्कि बाज़ार और समाज में उनका रुतबा और इज़्ज़त भी होती है। अगर उन पर हमला होता है, तो कई जाने-माने लेखक, नागरिक, राय बनाने वाले उनके बचाव में आगे आएंगे। छोटे प्रकाशकों के पास ऐसे संसाधन बहुत कम होते है। अगर सरकार किसी छोटे प्रकाशक के पीछे पड़ने का फ़ैसला करती है, तो उस प्रकाशन के बंद होने तक का खतरा हो सकता है।
छोटे प्रकाशकों के पास खोने के लिए बहुत कुछ होता है, और फिर भी, वे ही ज़्यादा हिम्मत दिखाने वाले लगते हैं। जब कोई पेंगुइन आलोचना करने वाली आवाज़ों को दबाने की कोशिश करता है, तो इसके कई दीर्घकालीन खतरनाक नतीजे होते हैं। इससे सेंसरशिप का विचार सामान्य लगता है। इससे यह बात और मज़बूत होती है कि किताबें ‘खतरनाक’ होती हैं। इससे डर का माहौल और बढ़ता है। इससे दूसरों को जोखिम उठाने से रोका जाता है।
प्रकाशन व्यवसाय कई मायनों में दूसरे व्यवसाय से अलग होता है। इसमें सिर्फ़ सामान बनाना और मुनाफ़ा कमाना शामिल नहीं होता। एक प्रकाशक जो ‘सामान’ बनाता है, वह किताबें हैं, और किताबें विचारों की वाहक होती हैं। विचार कोई ‘उत्पाद’ नहीं हैं। वे समाज में सभी सामाजिक अंतर्क्रिया का आधार बनते हैं। किसी भी स्वस्थ समाज के आगे बढ़ने के लिए, आपको अलग-अलग तरह के विचारों को प्रसारित करने की ज़रूरत होती है। इनमें ऐसे विचार भी शामिल हैं, जो मौजूदा हालात को चुनौती देते हैं। कोई भी समाज तब तक तरक्की नहीं कर सकता, जब तक चुनौती देने वाले विचार, अलग-अलग तरह के विचार स्वतंत्रता से प्रसारित न हों।
विचारों की स्वतंत्रता को दबाने की अपने हाल की कारगुजारियों से, पेंगुइन ने प्रकाशकीय पारिस्थितिकी तंत्र और लोकतंत्र के विचार को ही नुकसान पहुंचाया है।
(सुधन्वा देशपांडे रंगमंच अभिनेता, निर्देशक, संपादक और लेखक हैं। जन नाट्य मंच से जुड़े हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)



