उत्तर-प्रदेशनई दिल्लीबड़ी खबरलखनऊ

अनुसूचित जाति की भूमिहीन महिलाओं के लिए पृथक कल्याणकारी प्रकोष्ठ का गठन हो : श्याम प्रसाद

भूमिहीन महिला श्रमिकों के लिए योजनाएं बनाए सरकार : डॉ. चंद्रकांता

लखनऊ । उत्तर प्रदेश की करोड़ों भूमिहीन किसान महिलाओं का पसीना खेतों को हरा-भरा रखता है, लेकिन भूमि, मजदूरी और निर्णय-अधिकार में उनकी हिस्सेदारी आज भी नगण्य है। इस संबंध में सामाजिक समरसता मंच अवध प्रान्त द्वारा शुक्रवार को विश्व संवाद केन्द्र जियामऊ लखनऊ में आयोजित प्रेसवार्ता के दोरान एक शोध-प्रतिवेदन जारी किया गया। यह शोध दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र की प्रोफेसर डा.चन्द्रकान्ता के.माथुर ने सामाजिक समरसता गतिविधि,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय संयोजक के. श्याम प्रसाद के मार्गदर्शन में किया है।

शोधकर्ता डॉ. चंद्रकांता के. माथुर ने प्रेसवार्ता में कहा, “जब तक भूमिहीन किसान महिला को ‘अन्नदाता’ के रूप में मान्यता, भूमि, मजदूरी और निर्णय में उसका वाजिब हक नहीं मिलता, तब तक ग्रामीण भारत का सशक्तिकरण अधूरा रहेगा। नया भारत वह होगा जिसमें खेत की मेड़ पर खड़ी वह महिला भी, जिसके नाम एक इंच ज़मीन नहीं है, उतने ही आत्मविश्वास से नीति-निर्धारण की मेज़ पर अपनी बात रख सके।”

चौंकाने वाले आंकड़े: श्रम और अधिकारों की खाई
भूमि स्वामित्व में कमी: उत्तर प्रदेश में केवल 7.6% महिलाओं के नाम पर कृषि भूमि दर्ज है। शेष सभी महिलाएं अपने ही परिवार की जमीन पर ‘बेगानी’ बनी हुई हैं।
अवैतनिक श्रम: राज्य की 85% महिला श्रमशक्ति खेतों में जुटी है, लेकिन इनमें से अधिकांश के श्रम को आज भी ‘अवैतनिक’ (बिना वेतन का) माना जाता है।
मजदूरी का अभाव: पिछले एक वर्ष में काम करने वाली महिलाओं में से 18% से कम को ही नकद मजदूरी मिल पाई है। शेष को अनाज या वस्तु के बदले संतोष करना पड़ता है।
अत्यधिक निर्धनता: मध्य, पूर्वी और दक्षिणी उत्तर प्रदेश के भूमिहीन कृषि श्रमिक परिवारों में निर्धनता की दर 73.4% से 89.8% तक है, जो देश के कई राज्यों से कहीं अधिक है। इसमें बुंदेलखंड क्षेत्र और अनुसूचित जाति समुदाय की महिलाएं सबसे बड़ी शिकार हैं।
स्वास्थ्य और साक्षरता का संकट: महिला साक्षरता पुरुषों की तुलना में बहुत पीछे (66% बनाम 82%) है। इसके अलावा, 50% और 40% प्रदेश की आधी महिलाएं एनीमिया (रक्तअल्पता) से जूझ रही हैं, जबकि 5 वर्ष से कम आयु के 40% बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। केवल 16% भूमिहीन परिवारों के पास स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध है।
मुख्य वक्ताओं ने क्या कहा?

सरकार और समाज से प्रमुख मांगें
अनुसूचित जाति एवं वंचित वर्गों की भूमिहीन महिलाओं के लिए पृथक कल्याणकारी प्रकोष्ठ का गठन हो।
मनरेगा के अन्तर्गत भूमिहीन महिला श्रमिकों को प्राथमिकता के आधार पर वर्षभर रोजगार मिले।
महिलाओं के लिए समान काम के बदले समान मजदूरी और तत्काल नकद भुगतान अनिवार्य हो।
“खेतमजदूर कार्ड”: इसके माध्यम से महिलाओं की पहचान कर उन्हें प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) दिया जाए।
भूमिहीन किसानों के लिए बिना भूमि गिरवी रखे विशेष ऋण और बीमा सुविधाएं दी जाएं।

सामाजिक समरसता गतिविधि के राष्ट्रीय संयोजक के. श्याम प्रसाद ने कहा, “किसान परिवार की महिला हो या भूमिहीन खेत मजदूर परिवार की महिला—दोनों एक ही खेत, एक ही परिश्रम और एक ही सपने की साझेदार हैं। जब तक ग्रामीण भारत की ये दोनों महिला-शक्तियां एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि सहयात्री मानकर आगे नहीं बढ़ेंगी, तब तक सामाजिक समरसता का सपना अधूरा रहेगा।”

सामाजिक समरसता का अर्थ यही है कि गांव की हर महिला—चाहे वह भूमि की मालकिन हो या भूमिहीन खेत मजदूर एक दूसरे को प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि सहयात्री माने। समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलने का यही मार्ग है, और यही हमारा संकल्प भी है।
सामाजिक समरसता मंच ने इस प्रतिवेदन को सरकार,शासन प्रशासन तथा समाज के हर वर्ग के समक्ष रखते हुए स्पष्ट किया है कि यह लड़ाई किसी एक विभाग या योजना की मोहताज नहीं— यह हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। सरकार भूमिहीन महिला श्रमिकों के लिए नीति बनाए प्रशासन उसे जमीन तक पहुंचाए।
प्रेसवार्ता में सामाजिक समरसता गतिविधि के प्रान्त प्रमुख राजकिशोर,शोध सहयोगी अविशा रवि व सामाजिक समरसता गतिविधि के प्रान्तीय टोली के सदस्य बृजनन्दन राजू प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button